निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( १९२ ) ८ अ० ३ पा० ७ खं० हितः पृथिव्याम्” (अ०२ अ०५ व २२-) यह चतुर्थ आप्री सूक्त है ॥ (५) विश्वामित्र गोत्रों का “समित्समित्सुमनाः” (अ०२ अ०८ व२२) यह ५वां आप्री सूक्त है ॥ (६) आत्रेय वसुश्रुत गोत्रों का सुसमिद्धाय शोचिषे” (अ०३ अ०८ व१०) यह ६ठा आप्री सूक्त है ॥ [७] वसिष्ठ गोत्रों का “जुषस्वनःसमिधमग्नेअद्य” (अ०५ अ०१ व१ ) यह सातवां आप्री सूक्त है ॥ [८] काश्यप सित गोत्रों का “समिद्धोविश्वतस्पतिः” (अ०६ अ०७ व२४) यह आठवां आप्री सूक्त है ॥ (९) वाध्यश्व सुमित्र गोत्रों का “इमा॑मे अग्ने जुष- स्वेति” (अ०२ अ०२ व२१) यह ९वां आप्री सूक्त है ॥ (१०) शुनकों और वाध्यश्वों को छोड़ कर अन्य सबभृगु गोत्रों का “समिद्धो अद्य मनुषो दुरोणे” [अ०८ अ०६ व८) यह १० वा आप्रीसूक्त है ॥ ३ यकल्प विषय विशेष में । “प्राजापत्ये तु जामदग्न्यः सर्वेषाम्” (आश्वश्रौ०-३-२) १- प्रजापति देवता के पशु में सभी गोत्रों के लिये “समिद्धो अद्यमनुषो दुरोणे” (अ०८ अ०६- व.) यही एक आप्री सूक्त होता है । इस पक्षमें प्रथम और द्विती- य कल्प की विधियें बाधक नहीं होती हैं । इससे वसिष्ठ और शुनक आदि के लिये भी पूर्वोक्त आप्री सूक्तों की कोई आपत्ति न उठानी चाहिये ॥