निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त (१६१) ८ अ० ३ पा० ७ खं० उनके लिये नराशंस दैवत की ऋचा ;अपेक्षित' होती है। वह कहां से लीजाय ' इस प्रश्न के उत्तर में आश्वलायन सूत्र के वृत्तिकार नारायण वासिष्ठी नाराशंसी ऋचा के ग्रहण को बताते हैं। वसिष्ठ का "जुषस्वनः" (अ०५ अ० २-व १ ) यह पूर्वोक्त सातवां सूक्त है, उसी से वह ऋचा लेनी चाहिये। २ यकल्प । "यथ ऋषि वा" (आश्व०३-२) जो जिस यजमान का ऋषि हो उसी ऋषि का उसको आप्री सूक्त लेना चाहिये। इसी पक्षमें भगवान् शौनक आप्री विवेक के लिए ही यह श्लोक देते हैं। कण्वोऽङ्गिरोगस्त्यशुनका विश्वामित्रोऽत्रिरेवच। वसिष्ठः कश्यपोवाध्युर्वा जमदग्नि रथोत्तमः” अर्थात् दश सूक्तों में- (१) कण्व गोत्रों का "सुसमिद्धो न आवह" [अ०१ अ०१- व २४) यह प्रथम आप्री सूक्त है ॥ [२] कण्ववर्जित अङ्गिरस् गोत्रों का "समिद्धो- अग्न आवह" (अ०२ अ०२ व १०) यह दूसरा आप्री सूक्त है ॥ (३) अगस्त्य गोत्रों का "समिद्धो अद्य राजसि" (अ०२ अ०५ व ८) यह तीसरा आप्री सूक्त है ॥ (४) गृत्समद या शुनकों का 'समिद्धो अग्निर्न'