निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
पृष्ठ 957, कुल 1282 में से
संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( १६७ ) ८ अ० ३. पा० ७ खं०
अर्थात् शुनक गोत्र यजमानों के पशु कर्म में एकादश प्रयाज देवताओं के यजन में होता- ऋत्विज् इस सूक्त की ग्यारह (११) ऋचाओं को याज्या करेगा । एक २ देवता के लिये एक २ ऋचा को क्रम से पढेगा । यह सूक्त पूर्वोक्त आप्री सूक्तों में ४ था है ॥ (२) “जुषस्वनः समिधम्” (ऋ० ३ अ० ८ व २०) यह सूक्त वसिष्ठगोत्रों का पशु कर्म में आप्री सूक्त होगा । यह दश आप्री सूक्तों में ७ वां है ॥ (३) “समिधो अद्य मनुषोदुरोणे” (ऋ०८ अ०६ व ८) यह सूक्त शुनकों और वसिष्ठों के अतिरिक्त सभी गोत्रों के लिये पशु कर्म में आप्री सूक्त होगा। दश आप्री सूक्तों में यह १० म है ॥ इस कल्प (विधान) में प्रयाज देवताओं के यजन में पूर्वो- क्त ऋग्वेद मन्त्र संहिता के दश (१०) आप्री सूक्तोंमें से तीन (३) आप्री सूक्तों का ही उपयोग होता है और सात (७) आप्री सूक्त रह जाते हैं, तथा इन तीन ही सूक्तों से सकल गोत्रों के,अनुष्ठान का निर्वाह होजाता है। क्यों कि- शुनकों के लिये चौथा सूक्त है; वसिष्ठों के लिये (७) सातवां सूक्त है । और सभी गोत्रों के लिये दशम सूक्त विहित हुआ है । अतः कोई गोत्र भी आप्री सूक्त से,रहित नहीं रहता है । किन्तु- जो यह दशम सूक्त अन्य सब गोत्रों के लिये विहित हुआ है उसमें तनूनपात् देवता की ऋचा है । नरा- शंस देवता की नहीं । इससे जो गोत्र नराशंस याजी हैं, अथवा उभययाजी हैं