निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( १६६ ) ८ अ० ३ पा० ७ खं० का अभाव है, इससे उन्होंने वसिष्ठगोत्रों के “जुषस्वनः” (अ० ५ क्र० २ व १ ) आप्री सूक्त से उक्त देवता की ऋचा का यहां पर समावेश किया । यहां पर आचार्य के इस नारा- शंसी ऋचा के चुनाव का यह और भी महत्त्व है कि अन्य पांच सूक्तों में अन्य २ पांच नाराशंसी ऋचाओं के होने पर भी आप वासिष्ठी नाराशंसी ऋचा का ही आहरण करते हैं इस में विधि का अनुग्रह भी होता है। अर्थात्- जब नराशंस- याजी कोई गोत्र जामदग्न्य सूक्त की आप्री सूक्त करते हैं, तब उन्हें विधि के अनुसार वासिष्ठी नाराशंसी ही लेनी पड़ती है, किन्तु अन्य नाराशंसी नहीं। यद्यपि यहां निर्व- चन के प्रयोजन से वासिष्ठी तथा अन्य नाराशंसी में कोई फल भेद नहीं, तथापि एक कार्य के साथ एक ही यत्न से आवश्यक कार्योन्तर की सिद्धि भी की गई है, यह आचार्य के विचार कौशल का महत्त्व ही है। इस वासिष्ठी नाराशंसी ऋचा को यहां समावेश करने के सम्बन्ध में नारायण वृत्ति- कार खण्डसूत्र ( ३, २ ) पर यों कहते हैं, कि- “तत्रात्र्यादीनां नाराशंस्थेव वासिष्ठ्या हर्तव्या, प्रैष सालिङ्गाभिरित्युक्तत्वात्” अर्थात्- अत्रि आदिकों को जब प्रथम कल्प या तृतीय कल्प के अनुसार जामदग्न्य आप्री सूक्त लेना होगा, तब वे नाराशंस याजी होने के कारण नाराशंसी ऋचाकी अपेक्षा करेंगे, तथा प्रकृत सूक्त में वह ऋचा है नहीं, अतः उन्हें और कहीं से नाराशंसी ऋक् लानी होगी, उस अवस्था में नारायण कहते हैं कि उन्हें वासिष्ठी (वसिष्ठ सूक्त अ० ५- अ० २ व १ से) नाराशंसी ही लानी चाहिये, क्यों कि- सूत्र-