निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( १६७ ) ८ अ० ३ पा० ७ खं० कार “होता यजत्याप्रीभिः प्रैषसलिङ्गाभिः” (आश्व० ३, २) इस सूत्र में कहते हैं कि— होता को यजन में ऐसी आप्री ऋचाएं लेनी चाहिये, जो मैत्रावरुण के प्रैष मन्त्रों के समानलिङ्ग हों— “होता यक्षद् ०” इत्यादि मन्त्र जिस क्रमसे जिस २ देवता के मैत्रा वरुण के द्वारा पठित हों, उसी क्रम से उस २ देवता की आप्री संज्ञकयाज्याकोवह पढे। नारायण समझते हैं कि- व्याकरण में जिस प्रकार “स्थानेऽन्तरतमः” (पा० सू ) सूत्र में जितना ही स्थानी और आदेशका सादृश्य मिले, उतना ही लेना चाहिये, उसी प्रकार जहां तक हो, आप्री मन्त्र प्रैष मन्त्र के सदृश हों ।अभिप्राय केअनुसार अन्य नारा- शंसी ऋचाओं की अपेक्षा वासिष्ठी नाराशंसी ऋचा में नराशंस के प्रैष मन्त्र का अधिक सादृश्य है, इससे वासिष्ठीनाराशंसी काही आवाप (समावेश) करना चाहिये । इस अर्थ में नारायण वृत्तिकार के अभिमत के सहायक यास्क मुनि भीबनते हैं, क्यों कि— उन्हों ने भी जामदग्न्य आप्री सूक्त में वासि- ष्ठी नाराशंसी ऋचा का आहरण किया है । यद्यपि “प्रैष सलिङ्गाभिः” (आ० ३, २) इसमें देवता और पाठ क्रम दोका सादृश्य तो स्थूलतर है ही, जिसके अनुसार प्रैष मन्त्रों और आप्री मन्त्रों का क्रम अनुष्ठान में समान रहता है । किन्तु ये दो सादृश्य वासिष्ठी नाराशंसी के समान अन्य २ आप्री नाराशंसियों में भी हैं । वासिष्ठी में जो अन्य ऋचाओं की अपेक्षा अधिक सादृश्य है, उसके लक्षित करने के लिये हम नीचे प्रैष मन्त्र तथा सब नाराशंसी आप्री ऋचाओं को स्वरूपतः उद्धृत करदेते हैं, प्रज्ञाता पुरुष उन्हें प्रत्यक्ष करके सादृश्या कनिरूपणभी करसकेंगे—