भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 964, कुल 1282 में से

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पृष्ठ 964

हिन्दी निरुक्त ( १६८ ) ८ अ० ३ पा० ७ खं० (१) नराशंस का \ “होता यक्षन्नराशंसं नृशंसं नॄंः प्रैषमन्त्र { प्रणेतं । गोभिर्वैपावान्त्स्याद्वारैः { शक्तीवान्प्रथैः प्रथमयावा हिरण्यै- { श्रन्द्री वेत्वाज्यस्य होतर्यज” ।३। (२) काण्व मेधा- \ “नराशंसमिह प्रियमस्मिन्यज्ञऽ तिथि उभययाजी { उपह्वये । मधुजिह्वं हविष्कृतम्” । की नाराशंसी { (अ०१अ०१व२४) आप्री / (३) औचथ्य दीर्घ- \ “शुचिः पावकोऽअद्भुतो मध्वायज्ञं तमा उभययाजी { मिमिक्षति। नराशंस स्त्रिरादिवो की नाराशंसी { देवो देवेषु यज्ञियः।(अ०२अ०२व१०) आप्री / (४) गृत्समद शु- \ नराशंसः प्रतिधा मान्यंजन्र्तिस्रो नक नराशंस याजी { दिवः प्रतिमन्हा स्वर्त्तिः। घृतप्रुषा की आप्री { मनसा हव्यमुंदन्मूर्धन्यज्ञस्य समनक्तु देवान्। (अ०२अ०५व२२) (५) आत्रेय वसु- \ नराशंसः सुषूदतीमं यज्ञमदाभ्यः श्रुत नराशंस- { कवि र्हिं मधुहस्त्यः ॥ (अ० ३ याजी की आप्री / अ० ८ व २० ) (६) मैत्रावरुणि \ नराशंसस्य महिमानमेषा मुपस्तो- वसिष्ठ नराशंस- { षाम यजतस्ययज्ञैः। ये सुक्रतवः याजी की आप्री { शुचयो धियंधाः स्वदन्ति देवाऽ / उभयानिहव्या। (अ०५अ०२व१)

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