भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 965, कुल 1282 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 965

हिन्दी निरुक्त ( १६६ ) ८ अ० ३ पा० ७ खं० $(७) वाध्यश्व सु- मित्र नराशंस- याजी की आप्री$ $आ देवानां मन्मथा वोह्य१स्तु नरा- शंसो विश्वरूपेभिरश्वैः। ऋतस्य पथा नमसामियेधो देवेभ्यो देवतमः सुषदत् ॥ (अ०८अ०२व२१)$ (२) 'त्वष्टा' १० वां आप्री देवता है। उसके निर्वचन में जामदग्न्य सूक्त की "यहमे०" (अ० ८ अ० ६ व० ६) जो यह ऋचा दी है। उसमें त्वष्टा का नामोल्लेख यद्यपि है तथापि उसके स्वरूप का निरुपण कुछ भी नहीं, है अतः उसके स्वरूप बोधन के लिये दूसरी ऋचा (अ० १ अ० ७ व० १) का उल्लेख आचार्य को आवश्यक हुआ। इस ऋचा में प्रकाशन और ऊर्ध्वज्वलन पार्थिव अग्नि के स्पष्ट बोधक हैं। (३) वनस्पति आप्री देवता का दूसरा, तीसरा और चौथा निगम। क्यों कि- वनस्पति कात्थक्य के मत से यूप और शाकपूर्णि के मत में अग्नि है, तथा जामदग्न्य आप्री सूक्त की ऋचा जो प्रथम निगम के स्थान में दी है, वह किसी एक मत को भी पुष्ट नहीं करती अतः दूसरा निगम यूप रूप को और तीसरा तथा चौथा निगम अग्नि रूप का बोधन करने के लिये दिया गया है॥ भाष्यकार की एक पङ्क्ति। भाष्यकार यास्क मुनि इस अध्याय के अन्त में "इति इमानि एकादश आप्रीसूक्तानि" ऐसा लिखते हैं जिससे यह प्रतीत होता है जैसे वे ग्यारहों आप्रीसूक्तों का यहां उपप्रदर्शन करा चुके हैं और उनकी कोई विशेष व्य-