निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त (२००) ८ अ० ३पा० ७खं वस्था दिखाने के अर्थ उनका उपादान करते हैं । किन्तु यहाँ एक ही जामदग्न्य सूक्त है। क्यों कि- “इमानि” यह 'इदम्' शब्द है । इस शब्द का प्रयोग संमुख प्रत्यक्ष वर्त्तमान वस्तु के अङ्गुलि निर्देश पूर्वक दिखाने के लिये होता है । अतः यहां पर यह मानना चाहिये कि- क्या तो यहां से वह ग्रन्थ त्रुटित होगया; या किसी ने भ्रान्तिवश 'इत्यादीनि' पदके स्थान में “इतीमानि” कर दिया । दोनों ही संभव हैं तथापि द्वितीय पक्ष का अधिक संभव है । कारण प्रथम पक्ष में एक प्रकरण का लोप प्राप्त होता है, जिसका द्वितीय पक्षकी अपेक्षा होना बहुत कठिन है ॥ निरुक्त के अष्टम अध्याय का खण्ड सूत्र— (१मपा०-) द्रविणोदाः कस्मात् (१) द्रविणोदा द्रविणोदसः (अयमेवाग्निः) (२) मेद्यन्तुते (३) (२य पा०-) अथात आप्रियः (४) समिधो अद्य (५) तनूनपात् (६) नराशंसस्य (७) आजुह्वानः (८) प्राचीनं बर्हिः (६) व्यचस्वती (१०) आसुष्वयन्ती (११) दैव्याहोतारा (१२) आनोयज्ञम् (१३) यह्मे (१४) आविष्ठद्यः (१५) [३य पा०-] वनस्पतिः (१६) उपावसृज (१७) आज्जन्ति- त्वा (१८) देवेभ्यः (१९) वनस्पते रशनया (२०) सद्योजातः (२१) प्रयाजान्मे (२२) इति निरुक्ते (उत्तर षट्के ) अष्टमोऽध्यायः ॥८, ३॥ इति हिन्दी निरुक्ते (उत्तरषट्के) अष्टमोऽध्यायः समाप्तः॥८,३॥ —:ॐ:—