भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 968

हिन्दी निरुक्त ( २७२ ) ६ अ० १ पा० १ खं० इनकी भी मन्त्रों में स्तुति आती है, इस लिये इनकी समाम्नाय में गणना की गई है । पृथिवी में रहने वाले हैं, इस लिये पृथिव्यायतन देवता- ओं के गणमें इनका पाठ है । पृथिवी स्थान के सादृश्य से इन्हीं के भीतर सर्प लाङ्गल और कुषुम्भक आदि भी समझने चाहिएं । क्यों कि- इनकी भी मन्त्रों में स्तुति आती है । यहां पर शब्दों के पाठ का क्रम अर्थस्वभाव = वस्तु- स्वभाव से अङ्गीकार किया हुआ है । क्रम की व्यवस्था होने पर मुख्य का परित्याग न्याय- सङ्गत नहीं है । इसी से आचार्य कहता है- “तेषामश्वः प्रथमागामी०” । 'अश्व' क्यों प्रथम है ? पुरुष के बाद इसका जन्म है- “तस्या आहुत्याः पुरुषोऽजायत, द्वितीयामजु- होत् ततोऽश्वोऽजायत” अर्थात्- 'उस आहुति से पुरुष हुआ, दूसरी का होम किया उससे अश्व हुआ' यह ब्रा० वा- क्य है । और विशेष प्रकार के "अश्वमेध" कर्म में इसका विशेष अङ्गभाव = उपयोग है । इस कारण भी औरों की अपेक्षा यह मुख्य है । “अश्वो व्याख्यातः” वहां पर अश्नुते अध्वानम्” मार्ग को व्यापन करता है, “महाशनो भवतीतिवा” अथवा बड़ा भोजन करने वाला है, इससे यह 'अश्व' है । ऐसी व्याख्या की गई है ॥१॥