भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 944

यज्ञ में दाता को 'अमृतेषु' (देवेषु) देवताओं में 'प्रवोचः' (हवींषि प्रब्रूहि) कहो कि- उस यजमान ने ये हवि दिये हैं॥ इस प्रकार यहां अग्नि वनस्पति है। 'स्वाहाकृतयः' (१३) यह देवता पद है। इसमें 'स्वाहा' क्या है? 'स्वाहा' यह 'सु-आह' (सुन्दर कहता है) इन दो पदों के योग से है। अथवा 'स्वा वाग् आह' (अपनी वाणी कहती है) इन तीन पदों का संक्षेप है। अथवा 'स्वं प्राह' [अपने को कहता है] इन तीन पदों का संक्षेप है। अथवा 'स्वाहुतं हविर्जुहोति (सुन्दर होम करने योग्य हविः को होम करता है) इस वाक्य का संक्षेप [कम किया हुआ] शब्द है। “तासा०” उनकी यह ऋचा है-॥ ५ [२०]॥ (सं०६) (निरु०) “सद्यो जातो व्यमिमीत यज्ञमग्निर्- देवानांमभवत्पुरोगाः । अस्य होतुः प्रदिश्यृतस्य वाचि स्वाहा कृतं हविरदन्तु देवाः ॥” (ऋ०सं० ८,६,९,६) सद्यो जायमानो निरमिमीत यज्ञम्, अग्निः देवानाम् अभवत् पुरोगामी, “अस्य होतुः प्रदि- शि ऋतस्य” 'वाचि' आस्ये “स्वाहाकृतं हविः- अदन्तु देवाः ॥” इति-इमा आप्रीदेवता अनुक्रान्ताः ॥ अथ किं देवताः प्रयाजानुयाजाः ?