निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( १७८ ) ८ अ० ३ पा० खं० ७ (क) आग्नेयाः-इत्येके ॥६(२१)॥ अर्थः-“सद्योजातः०” ( यः अयम् ) जो यह 'अग्निः' अग्नि 'सद्यः' तत्काल 'जातः' ( जायमानः ) उत्पन्न होता हुआ ही 'यज्ञम्' यज्ञ को 'व्यमिमीत' ( निरमिमीत ) नि- र्वर्त्तन करता है-सिद्ध करता है। और जो उत्पन्न होता ही 'देवानाम्' देवताओं का 'पुरोगाः' ( पुरोगामी ) आगे चलने वाला ( प्रधानता के कारण ) 'अभवत्' हुआ या होता है । 'अस्य' इस 'होतुः' देवताओं के बुलाने वाले 'प्रदिशि' (प्राच्यां दिशि पूर्व दिशा में (-उत्तर वेदि आदि में ) 'ऋतस्य' ( गत- स्य ) गए हुए अग्नि के 'वाचि' ( आस्ये ) मुख में 'स्वाहा- कृतम्' स्वाहाकार मन्त्र से डाले हुए 'हविः' हविः को 'देवाः' देवता 'अदन्तु' खावें ॥ “इति इमाः” ये आप्रीदेवता अनुक्रमण किये गए— 'इध्म' से आरम्भ करके 'स्वाहाकृति' तक क्रम पूर्वक आप्री देवता कहे गए ॥ “अथ किं०” अब यह विचार चलता है-कि-प्रयाज और अनुयाज होमों का कौन देवता है ? “आग्नेयाः” कोई आचार्य मानते हैं कि इनका अग्नि देवता है- ॥६(२१)॥ [ खं० ७ ] (निघ०-) “प्रयाजान्मे अनुयाजांश्च केवलानूर्ज- स्वन्तं हविषो दत्तभागम् । घृतं चापां पुरुषं चौ- षधीनामग्नेश्च दीर्घमायुरस्तु देवाः॥” (८,१,११,३)