निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( १७५ ) ८ अ० ३ पा० ४ खं० तस्य एषा अपरा भवति- ॥४(१९)॥ अर्थः- "देवेभ्यो वनस्पते०" इस ऋचा का वसिष्ठ ऋषि और पुरोरुक् संज्ञा है । हे 'वनस्पते!' अग्नि देव ! 'हिरण्यपर्णा' (ऋतपर्णा) यज्ञरूप वृक्ष के पत्र (पान) रूप ! [ अपिवा उपमार्थेस्यात् ] अथवा उपमा अर्थ में होसकता है- (हिरण्यवर्णपर्णा इति) हिरण्य = सुवर्ण रंग के पत्ते वाले! जलते हुए! देव! 'देवेभ्यः' देवताओं के लिये 'हवींषि' हविओं को 'वक्षि' (वह) लेजा । कैसे? 'प्रदक्षिणिद्' प्रदक्षिण मार्ग से- देवताओं के हविः ले- जाने के पथ से- पितरों के मार्ग से भिन्न मार्ग के द्वारा । कैसे लेजाना? 'रशनया' रस्सी से 'नियूय' भले प्रकार बांधकर जिस प्रकार कि- धूम धुंवांसे में न सम्हाला गया हविः कुछ भी नगिरे कैसे मार्गों से! 'ऋतस्य (यज्ञस्य) यज्ञ के 'रजिष्ठैः' (ऋजुतमैः) बहुत सीधे 'पथिभिः' मार्गों से-यज्ञ के उनमार्गों से जो देवताओं के प्रति सीधे से भी सीधे मार्ग हैं, जिन के द्वारा कोल बहुत न लगे उन मार्गों से, अथवा (रजस्वलतमैः) जल युक्त मार्गों से [क्यों कि- वे पथिकों के लिये सुखकारी होते हैं] अथवा (प्रपिष्टतमैः) बड़े सुरूप अन्धकार से रहित = जिनमें किसी प्रकार का मोह नहो, ऐसेमार्गों से । "प्रदिवःते- अर्थम्" (पुराणः ते सः अर्थः) वह पुराना तुम्हारा अर्थ है, (यं ते प्रब्रूमः) जिसको तुम्हारे लिये हम कहरहे हैं (किन्तु तुम्हारे अदिदित कर्म में तुम्हें नहीं लगाते हैं] ॥ इस प्रकार यहां हविर्वहन = हविके लेजाने के संयोग से 'वनस्पति' शब्द का अग्नि अभिधेय = अर्थ है ।