भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 99, कुल 1282 में से

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पृष्ठ 99

अथ द्वितीय-तृतीय-पादयोः ————— प्रासङ्गिकाः शब्दाः। (द्वितीयः पादः) २-यः खण्डः। (चित्) (१) आचार्य्यः = (१) आचारं ग्राहयति (२) आचिनोत्यर्थान् (३) आचिनोति बुद्धिम्। (२) कुल्माषाः = कुलेषु सीदन्ति ” ३-यः खण्डः। (नु) (१) वयाः = शाखाः वेतेः-वातायना भवन्ति (२) शाखाः = खशयाः शक्नोतेर्वा (चादि) कर्मोपसङ्ग्रहः = यस्यागमात् अर्थ पृथक्त्वमह विज्ञा- यते नत्वौद्देशिकमिव विग्रहेण पृथक्त्वात् स कर्मोपसङ्ग्रहः ॥ ———— ( ३-यः पादः ) १-मः खण्डः। (क) (नूनम्) (१) न नूनमस्ति- विनश्यति = अगस्त्य इन्द्राय ━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━ कल्याणके प्रति सब प्राणियोंके उद्यत होने पर, हमें भी जप होम आदिका अधिकार न रहनेसे अपने कल्याणके अर्थ पतियोंकी सेवा करना चाहिये, जो कि स्त्रियोंके लिये एकमात्र उपाय है। यदि हम उसे भी न करें, या उनसे भो छल करें तो हमें नरक ही मिलेगा। भाव यह है कि स्त्रियोंके लिये पतिसेवासे अन्य और कोई धर्म नहीं है॥

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