भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 998

हिन्दी निरुक्त ( २३२ ) ६ अ ०२ पा० ४ खं० 'हस्तघ्नः' हस्ते हन्यतेः । तस्य एषा भवति- ॥४ [१४] ॥ अर्थः- “बह्वीनामू०” जो यह तूण 'बह्वीनां (बहूनाम्) पिता बहुत बाणों का पिता = पालन करने वाला है, और 'अस्य' इसको (जिसका) 'बहुः' बहुत बाण समूह 'पुत्रः' पुत्र = बहुत का त्राण करने वाला रक्षा करने वाला [पुत्र] है (सः) सो यह 'चिश्चा कृणोति' (प्रस्मयते इव) (अपाव्रियमाणः) खोला जाता हुआ मुसकिराता जैसा है। क्यों कि-चित्र विचित्र रंग के बाणों के मुठिये होते हैं, जो कि-तूण के मुख की ओर होते हैं और खोलते ही चमकते हैं, उन्हीं से तूण की ऐसी शोभा वर्णन की गई है । इस पक्ष में 'चिश्चाति' धातु नया कल्पित करना पड़ता है । क्यों कि- “विकारपक्षेष्वेतद- र्थान्यधातूपादानम्” अर्थात्- 'शब्दों के अनित्यत्व पक्ष में शब्द के अर्थ में और २ धातुओं का ग्रहण भी होता है' यह आचार्यों की परिभाषा है । अथवा यह शब्द का अनु- करण लेकर क्रिया पद है । 'चिश्चाकृणोति' 'चिश्चित्' शब्द करता है' । कब ? 'समना' संग्राम में 'अवगत्य' जाकर (सः) सो ऐसा 'इषुधिः' तूण 'पृष्ठे' पीठ में 'निनद्धः' बंधा हुआ 'प्रसूतः' धनुष् के धारण करने वाले से फेंका गया 'सर्वाः' सब 'सङ्गाः' संग्रामों को 'पृतनाश्च' और सब शत्रुओं की सेना- ओं को 'जयति' जीत लेता है ॥ 'हस्तघ्न' (१०) = कलापीपट्टक = हाथ की रक्षा के अर्थ कलाई में बांधने का पट्टा = गोधा होता है। क्यों ? 'हस्ते