भारतकोश
नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

Niti Shataka of Bhartrihari Hindi

महाराज भर्तृहरि द्वारा

स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished194 पृष्ठ

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१२०श्रीभर्तृहरिविरचितम्

६. फणिनां पतिः, फणिपतिः, तस्य मुखे, फणिपतिमुखे
७. शीलस्य विलयः (षष्ठी तत्पुरुष) शीलविलयः
८. √कृ + क्त = कृतः
९. शृंगस्य उत्संगः, शृंगोत्संगः तस्मात् = शृंगोत्संगात्

वह्निस्तस्य जलायते जलनिधिः कुल्यायते तत्क्षणान्
मेरुः स्वल्पशिलायते मृगपतिः सद्य कुरङ्गायते।
व्यालः माल्यगुणायते विषरसः पीयूष वर्षायते,
यस्याङ्गेऽखिललोकवल्लभतमं शीलं समुन्मीलति॥९२॥

अन्वय- यस्य अङ्गे अखिललोकवल्लभतमम् शीलम् समुन्मीलति, तस्य वह्नि जलायते, जलनिधिः तत्क्षणात् कुल्यायते, मेरुः स्वल्पशिलायते, मृगपतिः सद्यः कुरङ्गायते, व्यालः माल्यगुणायते, विषरसः पीयूष वर्षायते।

अनुवाद- जिसके अङ्ग में सम्पूर्ण संसार का सर्वाधिक प्रिय चरित्र प्रकट होता है, उसके (लिए) अग्नि जल बन जाती है, समुद्र उसी क्षण छोटी सी नदी बन जाता है, मेरु (पर्वत) छोटी सी शिला बन जाता है, शेर तुरन्त (ही) हिरण बन जाता है, सर्प पुष्पमाला बन जाता है (और) विष का रस (भी) अमृत वर्षा करने वाला हो जाता है।

व्याख्या- जिस व्यक्ति के शरीर में, इस संसार में सभी लोगों को अच्छा लगने वाला सत् स्वभाव, सदाचार विद्यमान है, उसके लिए अग्नि के समान विनाशकारी एवं पीड़ा पहुँचाने वाले लोग भी जल के समान शीतल स्वभाव वाले हो जाते हैं। समुद्र के समान गम्भीर समस्याएँ भी छिछली नदी के समान सुगम हो जाती हैं, मेरुपर्वत के समान विशालाकार वाली कठिनाइयाँ भी शिला के समान छोटे आकार को धारण कर लेती हैं। शेर जैसा भयावह शक्तिशाली शत्रु भी हिरण के समान सीधा और विनम्र हो जाता है; सर्प के समान अहित करने वाले भयंकर दुष्ट पुष्पमाला के समान उनकी शोभा बनकर अनुकूल आचरण करने वाले हो जाते हैं। गरल जैसे भयानक विष का रस भी अमृत की बूँदों की वर्षा करने वाला हो जाता है।

विशेष- १. सच्चरित्र की अत्यधिक प्रशंसा की गई है। अतः व्यक्ति को अपने जीवन में शील का सदैव संरक्षण करना चाहिए।
२. अन्यत्र भी कहा गया है- "वृत्तं यत्नेन संरक्षेत्" शील की यत्नपूर्वक रक्षा करनी चाहिए।
३. 'जलायते' आदि क्रिया पदों में क्यङ् प्रत्यय का प्रयोग 'इव आचरति' अर्थ की अभिव्यक्ति के लिए हुआ है।
४. यहाँ सर्वत्र अन्योक्तिपरक अर्थ करना उचित है जैसे- सर्प यहाँ जहर उगलने वाले दुष्ट लोगों का प्रतीक है, इसी प्रकार शेर शक्ति के कारण अहंकारी लोगों का।