नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)
Niti Shataka of Bhartrihari Hindi
महाराज भर्तृहरि द्वारा
स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)
पृष्ठ 141, कुल 194 में से
संदर्भ में पढ़ेंनीतिशतकम् १११९
वरं न्यस्तो हस्तः फणिपतिमुखे तीक्ष्ण दशने.
वरं वह्नौ पातस्तदपि न कृतः शीलविलयः॥१९१॥
अन्वय- गुरुशिखरिणः शृङ्गोत्सङ्गात् क्व अपि विषमे कठिनदृषदन्ते पतित्वा अयम् कायः विगलितः वरम्।
तीक्ष्णदशने फणपतिमुखे हस्तः न्यस्तः वरम्। वह्नौ पातः (अपि) वरम्। तदपि शीलविलयः कृतः वरम् न।
अनुवाद- विशाल पर्वत की चोटी के अग्रभाग से कहीं भी विषम और कठोर पत्थरों के बीच में गिरकर यह शरीर नष्ट हो जाए (तो) अच्छा है। तीखे दांतों वाले नागराज के मुख में हाथ रख दें (वह भी) अच्छा है। आग में गिर पड़ना (भी) अच्छा है। तो भी श्रेष्ठ स्वभाव का त्याग करना अच्छा नहीं है।
व्याख्या- विकटतम परिस्थितियों में भी मनुष्य को शील का परित्याग नहीं करना चाहिए, इसका प्रतिपादन करते हुए कवि ने सर्वाधिक ऊँचे पर्वत की चोटी से उबड़-खाबड़ तथा कठोर पत्थरों पर गिरकर शरीर का टुकड़े-टुकड़े हो जाना ठीक माना। इसके अतिरिक्त अत्यन्त विषैले महासर्प के मुख में स्थित तीक्ष्ण दाढ़ों में भले ही हाथ भी क्यों न रखना पड़े। वह भी बुरी बात नहीं है। इतना ही नहीं, यदि किन्हीं परिस्थितियों में अपने शरीर को आग में भी क्यों न जलाना पड़े, तो भी मनुष्य को अपने शील का परित्याग नहीं करना चाहिए।
कहने का तात्पर्य है कि शरीर के कष्टों की परवाह न करते हुए, प्राणों की भी उपेक्षा करते हुए व्यक्ति का कर्तव्य है कि अपने शील की अत्यन्त सचेष्ट होकर रक्षा करे।
विशेष-
१. प्राणों का परित्याग करके भी अपने शील की रक्षा करनी चाहिए।
२. इसी प्रकार के भाव अन्यत्र भी अभिव्यक्त हुए हैं—
वृत्तं यत्नेन संरक्षेद् वित्तमेति च याति च।
अक्षीणो वित्ततः क्षीणो वृत्तस्तु हतो हतः॥
३. शिखरिणी छन्द का प्रयोग हुआ है लक्षण इस प्रकार है—
रसैः रुद्रैश्छिन्ना यमन सभलागः शिखरिणी।
४. नीतिशतकम् की सभी प्रतियों में यह श्लोक उपलब्ध नहीं होता।
व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. वि + √गल् + क्त = विगलितः
२. तीक्ष्णानि दशनानि यस्य सः, तीक्ष्णदशनः तस्मिन्, तीक्ष्णदशने
३. नि + √अस् + क्त = न्यस्तः
४. √पत् + घञ् = पातः
५. √पत् + क्त्वा = पतित्वा