नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)
Niti Shataka of Bhartrihari Hindi
महाराज भर्तृहरि द्वारा
स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)
पृष्ठ 140, कुल 194 में से
संदर्भ में पढ़ें११८ श्रीभर्तृहरिविरचितम्
९. √मृ + ल्युट् = मरणम्
१०. अद्य + एव (वृद्धिरेचि— अ + ए = ऐ)
११. √अस् + तिप् (लोट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) अस्तु
कदर्थितस्यापि हि धैर्यवृत्ते-
र्न शक्यते धैर्यगुणाः प्रमाष्टुम्।
अधोमुखस्यापि कृतस्य वह्ने-
र्नाधःशिखा याति कदाचिदेव॥९०॥
अन्वय- कदर्थितस्य अपि धैर्यवृत्तेः, धैर्यगुणाः प्रमाष्टुम् न हि शक्यते। अधः मुखस्य कृतस्य अपि वह्नेः शिखा कदाचित् एव अधः न याति।
अनुवाद- पीड़ित किए जाते हुए भी धैर्यशाली (व्यक्ति) के धैर्य के गुणों को नष्ट नहीं किया जा सकता है। नीचे की ओर मुख की गई भी अग्नि की ज्वाला भी कभी नीचे की ओर नहीं जाती है।
व्याख्या- धैर्य को धारण करने वाले व्यक्तियों को कितना भी कष्ट क्यों न दिया जाए वे अपने प्रशंसनीय धैर्य के गुणों का परित्याग नहीं करते हैं। इसी कथन को कवि अग्नि के उदाहरण द्वारा समझते हुए कहते हैं कि धैर्यशाली लोग अग्नि के समान होते हैं, अग्नि की ज्वालाओं को भी कितना ही नीचे की ओर गति वाला क्यों न किया जाए वे ऊपर की ओर ही उठती हैं। ठीक इसी प्रकार धैर्यवान् अपने धैर्य का परित्याग नहीं करते, भले ही उन्हें कितना ही पीड़ित क्यों न किया जाए।
विशेष-
१. धैर्यशाली लोगों का स्वभाव अग्नि के समान तेजस्वी और स्वाभिमानी, कभी न झुकने वाला होता है।
२. अग्नि शिखा की विशेषता होती है कि वह सदैव ऊपर की ओर ही जाती है।
३. दृष्टान्त अलंकार का प्रयोग हुआ है।
४. उपजाति छन्द का प्रयोग हुआ है।
व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. कदर्थ + इतच् (पुल्लिंग, षष्ठी विभक्ति, एकवचन) कदर्थितस्य
२. धीर + ण्यत् = धैर्य। √वृत् + क्तिन् = वृत्तिः
३. प्र + √मृज् + तुमुन् = प्रमाष्टुम्
४. अधः मुखं यस्य सः, अधोमुखः, तस्य अधोमुखस्य (बहुव्रीहि)
५. √शक् + त (आत्मने, लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) शक्यते
वरं शृङ्गोत्सङ्गाद् गुरुशिखरिणः क्वापि विषमे,
पतित्वाय कायः कठिनदृषदन्ते विगलितः।