नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)
Niti Shataka of Bhartrihari Hindi
महाराज भर्तृहरि द्वारा
स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)
पृष्ठ 139, कुल 194 में से
संदर्भ में पढ़ेंनीतिशतकम् ११७
अन्वय- यदि नीतिनिपुणाः निन्दन्तु वा स्तुवन्तु, लक्ष्मीः समाविशतु वा यथेष्टम् गच्छतु, अद्य एव मरणम् अस्तु, वा युगान्तरे (मरणम् अस्तु) धीराः पदम् न्यायात् पथः न प्रविचलन्ति।
अनुवाद- भले ही नीति में निपुण (लोग) निन्दा करें या स्तुति, लक्ष्मी आ जाए या इच्छानुसार चली जाए, आज ही मरण हो या युगों के बाद (मरें), धैर्यशाली (लोगों) के पैर न्याय के मार्ग से विचलित नहीं होते हैं।
व्याख्या- धैर्यवान् लोग किसी भी परिस्थिति में न्यायोचित मार्ग से हटते नहीं हैं, इसी बात का अत्यन्त सुन्दर ढंग से प्रतिपादन करते हुए कवि कहता है कि—
नीतिज्ञ लोग भले ही उनके कार्यों की आलोचना करें अथवा प्रशंसा करें, वे संयोगवश धनवान् हो जाए अथवा पूर्णतया दरिद्र ही क्यों न हो जाएँ, अल्पायु में ही उनकी मृत्यु भी क्यों न हो जाए अथवा भले ही बहुत वर्षों तक जीवित क्यों न रहें। धैर्य को धारण करने वाले व्यक्ति न्याय के मार्ग का परित्याग किसी भी परिस्थिति में नहीं करते हैं।
कहने का तात्पर्य है कि धैर्यवान् लोगों की विशेषता है कि न्याय के मार्ग का एक बार अवलम्बन करने के बाद लोगों की निन्दा अथवा प्रशंसा का, धन की हानि अथवा लाभ का, जीवन अथवा मृत्यु का उनके ऊपर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है, वे बेझिझक निडर होकर अपने द्वारा भली प्रकार विचार कर स्वीकार की गई न्यायोचित कार्य प्रणाली एवं सिद्धान्तों का परित्याग नहीं करते हैं। स्थिर चित्तता ही उनकी विशेषता है।
विशेष- १. धैर्यवान् लोगों की विशेषता का कथन किया गया है। २. उदात्त अलंकार का प्रयोग हुआ है। ३. वसन्ततिलका छन्द का प्रयोग हुआ है— लक्षण—
उक्ता वसन्ततिलका तभजा जगौ गः।
४. यदि पद का प्रयोग यहाँ ‘भले ही’ अर्थ की अभिव्यक्ति के लिए हुआ है।
व्याकरणात्मक टिप्पणी- १. नीतिषु निपुणः = नीतिनिपुणः २. √निन्द् + झि (लोट् लकार, प्रथम पुरुष, बहुवचन) निन्दन्तु ३. √स्तु + झि (लोट् लकार, प्रथम पुरुष, बहुवचन) स्तुवन्तु ४. सम् + आ + √विश् + झि (लोट् लकार, प्रथम पुरुष, बहुवचन) समाविशतु ५. यथा + √इष् + क्त = यथेष्टम् ६. अन्यत् युगं इति युगान्तरम् तस्मिन् युगान्तरे ७. न्याय + यत् (पुल्लिंग, पञ्चमी विभक्ति, एकवचन) न्यायात् ८. प्र + वि + √चल् + झि (लट् लकार, प्रथम पुरुष, बहुवचन) प्रविचलन्ति