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नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

Niti Shataka of Bhartrihari Hindi

महाराज भर्तृहरि द्वारा

स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished194 पृष्ठ

पृष्ठ 138, कुल 194 में से

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११६ | श्रीभर्तृहरिविरचितम्

अथवा दुःख का महत्त्व नहीं होता, क्योंकि उनका पूरा ध्यान कार्य की पूर्णता पर रहता है। शरीर के सुख अथवा कष्ट उनके लिए कोई महत्त्व नहीं रखते हैं।

विशेष- १. कार्यसिद्धि मनस्वी लोगों का प्रमुख लक्ष्य होता है। उस क्रम में आने वाले सुख, दुःखों की वे परवाह नहीं करते हैं।

२. व्यक्ति का कर्तव्य है कि चिड़िया की आँख पर स्थित अर्जुन के लक्ष्य के समान, अपने लक्ष्य पर ही अपनी ध्यान पूर्णतया एकाग्र करके कार्य करे, तभी उसे सिद्धि प्राप्त होती है।

३. शिखरिणी छन्द का प्रयोग हुआ है, लक्षण इस प्रकार है— रसैः रुद्रैश्छिन्ना यमन सभलागः शिखरिणी।

४. समुच्चय अलंकार का प्रयोग हुआ है।

व्याकरणात्मक टिप्पणी-

१. √शीङ् + क्यप् + टाप् (प्रथमा विभक्ति, एकवचन) शय्या २. पर्यङ्कं शयनं यस्य सः (बहुव्रीहि) पर्यंकशयनः ३. पर्यङ्के शयनम् (सप्तमी तत्पुरुष) पर्यंकशयनम् ४. √शीङ् + ल्युट् = शयनम्। आ + √हृ + घञ् = आहारः ५. शाकस्य आहारः = शाकाहरः। शाल्याः ओदनः शाल्योदनः (षष्ठी तत्पुरुष) ६. शाल्योदने रुचिः यस्य सः (बहुव्रीहि) शाल्योदनरुचिः ७. कन्था + √धृ + णिनि (पुंल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) कन्थाधारी ८. कन्थम् धारयति इति = कन्थाधारी ९. दिव्यम् अम्बरम् दिव्याम्बरं, तं धरति इति दिव्याम्बरधरः १०. √धृ + अच् = धरः। कार्य + अर्थ + इनि = कार्यार्थिन् ११. कार्यस्य अर्थी, कार्यार्थी (षष्ठी तत्पुरुष) १२. मनस् + विनि = मनस्विन् (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) मनस्वी १३. √गण् + णिच् + तिप् (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) गणयति १४. शाक + आ + √हृ + णिनि = शाकाहारिन् (प्रथम विभक्ति, एकवचन) शाकाहारी

निन्दन्तु नीतिनिपुणा यदि वा स्तुवन्तु,
लक्ष्मीः समाविशतु गच्छतु वा यथेष्टम्।
अद्यैव वा मरणमस्तु युगान्तरे वा,
न्याय्यात्पथः प्रविचलन्ति पदं न धीराः॥८९॥

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