नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)
Niti Shataka of Bhartrihari Hindi
महाराज भर्तृहरि द्वारा
स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)
पृष्ठ 137, कुल 194 में से
संदर्भ में पढ़ेंनीतिशतकम् ११५
'तद्रूपकमभेदो य उपमानोपमेययोः'।
३. वसन्ततिलका छन्द प्रयोग हुआ है, लक्षण इस प्रकार है—
उक्ता वसन्ततिलका तभजाः जगौ गः।
४. प्रथम चरण में दहन्ति पाठ भी मिलता है, जो अर्थ की दृष्टि से उचित प्रतीत नहीं होता।
व्याकरणात्मक टिप्पणी—
१. √दह् + झि (लट् लकार, प्रथम पुरुष, बहुवचन) = दहन्ति
२. √कुप् + घञ् = कोपः। √तप् + घञ् = तापः। √लुभ् + घञ् = लोभः
३. लोकानाम् त्रयम् लोकत्रयम् (षष्ठी तत्पुरुष)
क्वचित् भूमौ शय्या१, क्वचिदपि च पर्यङ्कशयनः१,
क्वचिच्छाकाहारी२ क्वचिदपि च शाल्योदनरुचिः।
क्वचित्कन्थाधारी क्वचिदपि च दिव्याम्बरधरो,
मनस्वी कार्यार्थी न गणयति दुःखं न च सुखम्॥८८॥
अन्वय— कार्यार्थी मनस्वी क्वचित् भूमौ शय्या, क्वचित् अपि च पर्यङ्कशयनः क्वचित् शाकाहारी, क्वचित्, अपि च शाल्योदन रुचिः, क्वचित् कन्थाधारी, क्वचित् अपि च दिव्याम्बरधरः, न दुःखम्, न च सुखम् गणयति।
अनुवाद— कार्य करने का इच्छुक मनस्वी (व्यक्ति) कहीं भूमि पर शय्या वाला और कहीं पलंग पर भी सोने वाला, कहीं शाक खाने वाला और कहीं (उत्तम) शाली भात को भी (खाने की) रुचि वाला, कहीं गूदड़ी धारण करने वाला और कहीं सुन्दर वस्त्रों को भी धारण करने वाला, न (तो) दुःख को और न सुख को (ही) गिनता है।
व्याख्या— जो स्वाभिमानी, मनस्वी लोग कार्य करने को ही महत्त्व प्रदान करते हैं, उन्हें भले ही कहीं भूमि पर ही सोना पड़े अथवा कहीं संयोगवश सोने के लिए आरामदायक पलंग मिल जाए, कहीं पत्ते खाकर ही अपनी उदरपूर्ति करनी पड़े, या फिर भाग्यवश कहीं शाली नामक उत्तम धान निर्मित स्वादिष्ट भात भी मिल जाए, कहीं जीर्णशीर्ण वस्त्रों को सीं कर बनाई गई गूदड़ी से ही अपने शरीर को ढकना पड़े या फिर दिव्य वस्त्रों से प्रतिस्पर्धा करने वाले सुन्दर वस्त्र ही कहीं पहनने को क्यों न मिल जाए।
कार्य की सम्पन्नता के क्रम में उनके लिए इन वस्तुओं से प्राप्त होने वाले सुख
१. पृथिवी शय्यः (पृथ्वी पर शय्या)
१. शाकहरः (शाक खाने वाला)
२. पर्यङ्कशयनम् (पलंग पर सोना)