नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)
Niti Shataka of Bhartrihari Hindi
महाराज भर्तृहरि द्वारा
स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)
पृष्ठ 136, कुल 194 में से
संदर्भ में पढ़ें| ११४ | श्रीभर्तृहरिविरचितम् |
|---|
४. वि + √रम् + झि (लट् लकार, प्रथम पुरुष, बहुवचन) विरमन्ति
५. प्रति + √हन् + शानच् (पुंल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) प्रतिहन्यमानाः
६. परि + √त्यज् + झि (लट् लकार, प्रथम पुरुष, बहुवचन) परित्यजन्ति
७. च + उत्तमजनाः (गुण, आद् गुणः)
८. प्र + आ + √रभ् + क्त (नपुं., द्वितीया विभक्ति, एकवचन) प्रारब्धम्
९. विघ्नानां भयेन विघ्नभयेन (षष्ठी तत्पुरुष)
१०. √भी + अच् = भयम्
११. उत्तमाः जनाः उत्तमजनाः (कर्मधारय समास)
१२. प्र + आ + √रभ् + त (आत्मने, प्रथम पुरुष, एकवचनं)
१३. मुहुः + अपि = मुहुरपि (विसर्ग)
कान्ताकटाक्षविशिखाः न लुनन्ति² यस्य,
चित्तं न निर्दहति कोपकृशानुतापः।
कर्षन्ति भूरि विषयाश्च न लोभपाशैः,
लोकत्रयं जयति कृत्स्नमिदं स धीरः॥८७॥
अन्वय- यस्य चित्तम् कान्ता-कटाक्ष-विशिखाः न लुनन्ति, कोपकृशानुतापः न निर्दहति, भूरिविषयाः लोभ-पाशैः च न कर्षन्ति, सः धीरः इदम् कृत्स्नम् लोकत्रयम् जयति।
अनुवाद- जिसके मन को स्त्रियों के कटाक्ष रूपी बाण छेदते नहीं हैं, क्रोध रूपी अग्नि का संताप जलाता नहीं है और अनेक विषय रूपी लोभ के पाश (अपनी ओर) खींचते नहीं हैं। वह धीर (पुरुष) इन सम्पूर्ण तीनों लोकों को जीत लेता है।
व्याख्या- धीर गम्भीर व्यक्ति ही तीनों लोकों को जीतने में समर्थ होते हैं, किन्तु उसके लिए कवि कहता है कि जिनके मन के ऊपर सुन्दर स्त्रियों की दृष्टि प्रभावशाली नहीं होती अर्थात् जो कामदेव द्वारा प्रभावित नहीं होते, जिन्हें कभी क्रोध रूपी अग्नि संतप्त नहीं करता, जो कभी क्रोध के वशीभूत नहीं होते, तथा जिन्हें इन्द्रियों के विषय-भोग प्रभावित नहीं करते अर्थात् जो जितेन्द्रिय होते हैं, वे ही मनस्वी और धैर्यशाली लोग तीनों लोकों को जीतने में समर्थ हैं।
विशेष-
१. तीनों लोकों पर विजय प्राप्त करने के लिए आवश्यक है कि व्यक्ति काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि से पूर्णतया मुक्त हो जाए।
२. कटाक्ष रूपी बाण, विषय भोग रूपी पाश, कोप रूपी अग्नि स्थलों पर उपमान और उपमेय में अभेद का आरोप करने से रूपक अलंकार— लक्षण—
२. दहन्ति