नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)
Niti Shataka of Bhartrihari Hindi
महाराज भर्तृहरि द्वारा
स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)
पृष्ठ 135, कुल 194 में से
संदर्भ में पढ़ेंनीतिशतकम् ११३
प्रारभ्यते न खलु विघ्नभयेन नीचैः,
प्रारभ्य विघ्नविहता विरमन्ति मध्याः।
विघ्नैः पुनः पुनरपि प्रतिहन्यमानाः,
प्रारभ्य चोत्तमजना¹ न परित्यजन्ति॥८६॥
अन्वय- नीचैः विघ्नभयेन खलु (कार्यम्) न प्रारभ्यते। मध्याः (कार्यम्) प्रारभ्य विघ्नविहताः विरमन्ति, उत्तमजनाः च (कार्यम्) प्रारभ्य, विघ्नैः पुनः पुनः प्रतिहन्यमानाः अपि न परित्यजन्ति।
अनुवाद- निम्न (श्रेणी के व्यक्ति) विघ्नों के भय से निश्चय ही (कार्य को) प्रारम्भ नहीं करते हैं। मध्यम (स्वभाव वाले) (कार्य) प्रारम्भ करके विघ्नों से आहत होने पर रुक जाते हैं और उत्तम लोग (कार्य) प्रारम्भ करके विघ्नों से बार-बार आहत होते हुए भी नहीं छोड़ते हैं।
व्याख्या- प्रस्तुत श्लोक के अनुसार इस संसार में तीन प्रकार के लोग होते हैं, 'उत्तम, मध्यम और अधम। इनमें अधम अर्थात् निम्न श्रेणी के लोग किसी काम को केवल विघ्नों से डरकर शुरु ही नहीं करते हैं, इसके अतिरिक्त कुछ मध्यम श्रेणी के लोग काम को उत्साहवश प्रारम्भ तो कर देते हैं, किन्तु विघ्नों के आने पर घबराकर उनका धैर्य जवाब दे देता है और वे कार्य को बीच में ही छोड़ देते हैं।
इन दोनों प्रकार के व्यक्तियों के विपरीत उत्तम श्रेणी के लोग जब किसी कार्य को हाथ में लेते हैं तो चाहे उनके मार्ग में कितनी ही विघ्नबाधाएँ क्यों न आएँ, वे तनिक भी विचलित नहीं होते और अपने द्वारा प्रारम्भ किए कार्य को समाप्त करके ही छोड़ते हैं।
विशेष-
१. वास्तव में प्रथम दो प्रकार के लोगों की अपेक्षा उत्तम श्रेणी के लोग ही प्रशंसनीय होते हैं।
२. सम्पूर्ण जन समूह को उक्त दृष्टि से तीन श्रेणियों में अत्यन्त सुन्दर ढंग से विभाजित किया गया है।
३. वसन्ततिलका छन्द का प्रयोग हुआ है। लक्षण इस प्रकार है—
‘‘उक्ता वसन्ततिलका तभजा जगौ गः।’’
४. अनुप्रास अलंकार का प्रयोग हुआ है।
व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. प्र + आ + √रभ् + ल्यप् = प्रारभ्य
२. विघ्नैः विहताः , विघ्नविहताः (तृतीया तत्पुरुष)
३. वि + √हन् + क = विघ्न। वि + √हन् + क्त = विहतः
१. प्रारब्धं उत्तमजनाः।(आरम्भ को उत्तम लोग)