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नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

Niti Shataka of Bhartrihari Hindi

महाराज भर्तृहरि द्वारा

स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished194 पृष्ठ

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११२ श्रीभर्तृहरिविरचितम्

इसी क्रम में भयानक हलाहल विष भी निकला, किन्तु उससे भी वे विचलित नहीं हुए और अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए निरन्तर प्रयास करते रहे और अन्त में उन्होंने अमृत प्राप्त करके ही विराम लिया।

इसी प्रकार जो धैर्यवान् लोग होते हैं वे एक बार निश्चय किए गए अपने लक्ष्य को प्राप्त किए बिना संतुष्ट नहीं होते हैं और अपने प्रयासों को रोकते नहीं हैं।

विशेष– १. धैर्यशाली लोगों के स्वभाव का उल्लेख किया है।

२. पौराणिक कथा है कि देवों और दैत्यों ने मिलकर अमृत-प्राप्ति के लिए मन्दराचल को मथानी और नागराज वासुकि को रस्सी बना कर समुद्र मंथन किया था। जिससे उन्हें १४ रत्नों की प्राप्ति हुई थी।

३. इसी क्रम में भयानक हलाहल भी प्राप्त हुआ, जिसे बाद में भगवान् शिव ने अपने कण्ठ में धारण किया। इसी से वे नीलकण्ठ कहलाए।

४. अर्थान्तरन्यास अलंकार का प्रयोग हुआ है।

५. 'विना' के योग में 'सुधाम्' में द्वितीया विभक्ति का प्रयोग हुआ है।

६. उपसर्ग का प्रयोग होने से आत्मनेपदी 'रम्' धातु परस्मैपद के रूप में प्रयुक्त हुई है।

७. उपजाति छन्द का प्रयोग हुआ है।

८. लिट् लकार का प्रयोग ऐतिहासिक तथ्य का कथन करने के लिए किया जाता है। इसीलिए तुतुषुः, भेजिरे, प्रययुः में लिट् लकार का प्रयोग हुआ है।

व्याकरणात्मक टिप्पणी–

१. महान्ति अर्हाणि महार्हाणि तैः, महार्हैः (कर्मधारय)

२. √तुष् + झि (लिट् लकार, प्रथम पुरुष, बहुवचन) तुतुषुः

३. √भी + क्तिन् (स्त्रीलिंग, द्वितीया विभक्ति, एकवचन) भीतिम्

४. √भज् + झि (लिट् लकार, प्रथम पुरुष, बहुवचन) भेजिरे

५. वि + √रम् + घञ् (पुल्लिंग, द्वितीया विभक्ति, एकवचन) विरामम्

६. प्र + √या + झि (लिट् लकार, प्रथम पुरुष, बहुवचन) प्रययुः

७. निश्चितात् अर्थात् निश्चितार्थात् (अव्ययीभाव)

८. वि + √रम् + झि (लट् लकार, प्रथम पुरुष, बहुवचन) विरमन्ति

९. भीमं विषम् भीमविषम्, तेन (कर्मधारय) भीमविषेण

१०. रत्नैः + महा + अर्हैः + तुतुषुः + न + देवाः + न (ससजुषो रुः, अकः सवर्णे दीर्घः, ससजुषो रुः)

११. √दिव् + अच् = देवः (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) देवाः