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नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

Niti Shataka of Bhartrihari Hindi

महाराज भर्तृहरि द्वारा

स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished194 पृष्ठ

११२ श्रीभर्तृहरिविरचितम्

इसी क्रम में भयानक हलाहल विष भी निकला, किन्तु उससे भी वे विचलित नहीं हुए और अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए निरन्तर प्रयास करते रहे और अन्त में उन्होंने अमृत प्राप्त करके ही विराम लिया।

इसी प्रकार जो धैर्यवान् लोग होते हैं वे एक बार निश्चय किए गए अपने लक्ष्य को प्राप्त किए बिना संतुष्ट नहीं होते हैं और अपने प्रयासों को रोकते नहीं हैं।

विशेष– १. धैर्यशाली लोगों के स्वभाव का उल्लेख किया है।

२. पौराणिक कथा है कि देवों और दैत्यों ने मिलकर अमृत-प्राप्ति के लिए मन्दराचल को मथानी और नागराज वासुकि को रस्सी बना कर समुद्र मंथन किया था। जिससे उन्हें १४ रत्नों की प्राप्ति हुई थी।

३. इसी क्रम में भयानक हलाहल भी प्राप्त हुआ, जिसे बाद में भगवान् शिव ने अपने कण्ठ में धारण किया। इसी से वे नीलकण्ठ कहलाए।

४. अर्थान्तरन्यास अलंकार का प्रयोग हुआ है।

५. 'विना' के योग में 'सुधाम्' में द्वितीया विभक्ति का प्रयोग हुआ है।

६. उपसर्ग का प्रयोग होने से आत्मनेपदी 'रम्' धातु परस्मैपद के रूप में प्रयुक्त हुई है।

७. उपजाति छन्द का प्रयोग हुआ है।

८. लिट् लकार का प्रयोग ऐतिहासिक तथ्य का कथन करने के लिए किया जाता है। इसीलिए तुतुषुः, भेजिरे, प्रययुः में लिट् लकार का प्रयोग हुआ है।

व्याकरणात्मक टिप्पणी–

१. महान्ति अर्हाणि महार्हाणि तैः, महार्हैः (कर्मधारय)

२. √तुष् + झि (लिट् लकार, प्रथम पुरुष, बहुवचन) तुतुषुः

३. √भी + क्तिन् (स्त्रीलिंग, द्वितीया विभक्ति, एकवचन) भीतिम्

४. √भज् + झि (लिट् लकार, प्रथम पुरुष, बहुवचन) भेजिरे

५. वि + √रम् + घञ् (पुल्लिंग, द्वितीया विभक्ति, एकवचन) विरामम्

६. प्र + √या + झि (लिट् लकार, प्रथम पुरुष, बहुवचन) प्रययुः

७. निश्चितात् अर्थात् निश्चितार्थात् (अव्ययीभाव)

८. वि + √रम् + झि (लट् लकार, प्रथम पुरुष, बहुवचन) विरमन्ति

९. भीमं विषम् भीमविषम्, तेन (कर्मधारय) भीमविषेण

१०. रत्नैः + महा + अर्हैः + तुतुषुः + न + देवाः + न (ससजुषो रुः, अकः सवर्णे दीर्घः, ससजुषो रुः)

११. √दिव् + अच् = देवः (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) देवाः

नीतिशतकम् ११३

प्रारभ्यते न खलु विघ्नभयेन नीचैः,
प्रारभ्य विघ्नविहता विरमन्ति मध्याः।
विघ्नैः पुनः पुनरपि प्रतिहन्यमानाः,
प्रारभ्य चोत्तमजना¹ न परित्यजन्ति॥८६॥

अन्वय- नीचैः विघ्नभयेन खलु (कार्यम्) न प्रारभ्यते। मध्याः (कार्यम्) प्रारभ्य विघ्नविहताः विरमन्ति, उत्तमजनाः च (कार्यम्) प्रारभ्य, विघ्नैः पुनः पुनः प्रतिहन्यमानाः अपि न परित्यजन्ति।

अनुवाद- निम्न (श्रेणी के व्यक्ति) विघ्नों के भय से निश्चय ही (कार्य को) प्रारम्भ नहीं करते हैं। मध्यम (स्वभाव वाले) (कार्य) प्रारम्भ करके विघ्नों से आहत होने पर रुक जाते हैं और उत्तम लोग (कार्य) प्रारम्भ करके विघ्नों से बार-बार आहत होते हुए भी नहीं छोड़ते हैं।

व्याख्या- प्रस्तुत श्लोक के अनुसार इस संसार में तीन प्रकार के लोग होते हैं, 'उत्तम, मध्यम और अधम। इनमें अधम अर्थात् निम्न श्रेणी के लोग किसी काम को केवल विघ्नों से डरकर शुरु ही नहीं करते हैं, इसके अतिरिक्त कुछ मध्यम श्रेणी के लोग काम को उत्साहवश प्रारम्भ तो कर देते हैं, किन्तु विघ्नों के आने पर घबराकर उनका धैर्य जवाब दे देता है और वे कार्य को बीच में ही छोड़ देते हैं।

इन दोनों प्रकार के व्यक्तियों के विपरीत उत्तम श्रेणी के लोग जब किसी कार्य को हाथ में लेते हैं तो चाहे उनके मार्ग में कितनी ही विघ्नबाधाएँ क्यों न आएँ, वे तनिक भी विचलित नहीं होते और अपने द्वारा प्रारम्भ किए कार्य को समाप्त करके ही छोड़ते हैं।

विशेष- १. वास्तव में प्रथम दो प्रकार के लोगों की अपेक्षा उत्तम श्रेणी के लोग ही प्रशंसनीय होते हैं।
२. सम्पूर्ण जन समूह को उक्त दृष्टि से तीन श्रेणियों में अत्यन्त सुन्दर ढंग से विभाजित किया गया है।
३. वसन्ततिलका छन्द का प्रयोग हुआ है। लक्षण इस प्रकार है—

‘‘उक्ता वसन्ततिलका तभजा जगौ गः।’’
४. अनुप्रास अलंकार का प्रयोग हुआ है।

व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. प्र + आ + √रभ् + ल्यप् = प्रारभ्य
२. विघ्नैः विहताः , विघ्नविहताः (तृतीया तत्पुरुष)
३. वि + √हन् + क = विघ्न। वि + √हन् + क्त = विहतः


१. प्रारब्धं उत्तमजनाः।(आरम्भ को उत्तम लोग)

११४श्रीभर्तृहरिविरचितम्

४. वि + √रम् + झि (लट् लकार, प्रथम पुरुष, बहुवचन) विरमन्ति
५. प्रति + √हन् + शानच् (पुंल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) प्रतिहन्यमानाः
६. परि + √त्यज् + झि (लट् लकार, प्रथम पुरुष, बहुवचन) परित्यजन्ति
७. च + उत्तमजनाः (गुण, आद् गुणः)
८. प्र + आ + √रभ् + क्त (नपुं., द्वितीया विभक्ति, एकवचन) प्रारब्धम्
९. विघ्नानां भयेन विघ्नभयेन (षष्ठी तत्पुरुष)
१०. √भी + अच् = भयम्
११. उत्तमाः जनाः उत्तमजनाः (कर्मधारय समास)
१२. प्र + आ + √रभ् + त (आत्मने, प्रथम पुरुष, एकवचनं)
१३. मुहुः + अपि = मुहुरपि (विसर्ग)

कान्ताकटाक्षविशिखाः न लुनन्ति² यस्य,
चित्तं न निर्दहति कोपकृशानुतापः।
कर्षन्ति भूरि विषयाश्च न लोभपाशैः,
लोकत्रयं जयति कृत्स्नमिदं स धीरः॥८७॥

अन्वय- यस्य चित्तम् कान्ता-कटाक्ष-विशिखाः न लुनन्ति, कोपकृशानुतापः न निर्दहति, भूरिविषयाः लोभ-पाशैः च न कर्षन्ति, सः धीरः इदम् कृत्स्नम् लोकत्रयम् जयति।

अनुवाद- जिसके मन को स्त्रियों के कटाक्ष रूपी बाण छेदते नहीं हैं, क्रोध रूपी अग्नि का संताप जलाता नहीं है और अनेक विषय रूपी लोभ के पाश (अपनी ओर) खींचते नहीं हैं। वह धीर (पुरुष) इन सम्पूर्ण तीनों लोकों को जीत लेता है।

व्याख्या- धीर गम्भीर व्यक्ति ही तीनों लोकों को जीतने में समर्थ होते हैं, किन्तु उसके लिए कवि कहता है कि जिनके मन के ऊपर सुन्दर स्त्रियों की दृष्टि प्रभावशाली नहीं होती अर्थात् जो कामदेव द्वारा प्रभावित नहीं होते, जिन्हें कभी क्रोध रूपी अग्नि संतप्त नहीं करता, जो कभी क्रोध के वशीभूत नहीं होते, तथा जिन्हें इन्द्रियों के विषय-भोग प्रभावित नहीं करते अर्थात् जो जितेन्द्रिय होते हैं, वे ही मनस्वी और धैर्यशाली लोग तीनों लोकों को जीतने में समर्थ हैं।

विशेष- १. तीनों लोकों पर विजय प्राप्त करने के लिए आवश्यक है कि व्यक्ति काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि से पूर्णतया मुक्त हो जाए।
२. कटाक्ष रूपी बाण, विषय भोग रूपी पाश, कोप रूपी अग्नि स्थलों पर उपमान और उपमेय में अभेद का आरोप करने से रूपक अलंकार— लक्षण—


२. दहन्ति

नीतिशतकम् ११५

'तद्रूपकमभेदो य उपमानोपमेययोः'।
३. वसन्ततिलका छन्द प्रयोग हुआ है, लक्षण इस प्रकार है—
उक्ता वसन्ततिलका तभजाः जगौ गः।
४. प्रथम चरण में दहन्ति पाठ भी मिलता है, जो अर्थ की दृष्टि से उचित प्रतीत नहीं होता।

व्याकरणात्मक टिप्पणी—
१. √दह् + झि (लट् लकार, प्रथम पुरुष, बहुवचन) = दहन्ति
२. √कुप् + घञ् = कोपः। √तप् + घञ् = तापः। √लुभ् + घञ् = लोभः
३. लोकानाम् त्रयम् लोकत्रयम् (षष्ठी तत्पुरुष)

क्वचित् भूमौ शय्या१, क्वचिदपि च पर्यङ्कशयनः१,
क्वचिच्छाकाहारी२ क्वचिदपि च शाल्योदनरुचिः।
क्वचित्कन्थाधारी क्वचिदपि च दिव्याम्बरधरो,
मनस्वी कार्यार्थी न गणयति दुःखं न च सुखम्॥८८॥

अन्वय— कार्यार्थी मनस्वी क्वचित् भूमौ शय्या, क्वचित् अपि च पर्यङ्कशयनः क्वचित् शाकाहारी, क्वचित्, अपि च शाल्योदन रुचिः, क्वचित् कन्थाधारी, क्वचित् अपि च दिव्याम्बरधरः, न दुःखम्, न च सुखम् गणयति।

अनुवाद— कार्य करने का इच्छुक मनस्वी (व्यक्ति) कहीं भूमि पर शय्या वाला और कहीं पलंग पर भी सोने वाला, कहीं शाक खाने वाला और कहीं (उत्तम) शाली भात को भी (खाने की) रुचि वाला, कहीं गूदड़ी धारण करने वाला और कहीं सुन्दर वस्त्रों को भी धारण करने वाला, न (तो) दुःख को और न सुख को (ही) गिनता है।

व्याख्या— जो स्वाभिमानी, मनस्वी लोग कार्य करने को ही महत्त्व प्रदान करते हैं, उन्हें भले ही कहीं भूमि पर ही सोना पड़े अथवा कहीं संयोगवश सोने के लिए आरामदायक पलंग मिल जाए, कहीं पत्ते खाकर ही अपनी उदरपूर्ति करनी पड़े, या फिर भाग्यवश कहीं शाली नामक उत्तम धान निर्मित स्वादिष्ट भात भी मिल जाए, कहीं जीर्णशीर्ण वस्त्रों को सीं कर बनाई गई गूदड़ी से ही अपने शरीर को ढकना पड़े या फिर दिव्य वस्त्रों से प्रतिस्पर्धा करने वाले सुन्दर वस्त्र ही कहीं पहनने को क्यों न मिल जाए।

कार्य की सम्पन्नता के क्रम में उनके लिए इन वस्तुओं से प्राप्त होने वाले सुख


१. पृथिवी शय्यः (पृथ्वी पर शय्या)
१. शाकहरः (शाक खाने वाला)
२. पर्यङ्कशयनम् (पलंग पर सोना)

११६ | श्रीभर्तृहरिविरचितम्

अथवा दुःख का महत्त्व नहीं होता, क्योंकि उनका पूरा ध्यान कार्य की पूर्णता पर रहता है। शरीर के सुख अथवा कष्ट उनके लिए कोई महत्त्व नहीं रखते हैं।

विशेष- १. कार्यसिद्धि मनस्वी लोगों का प्रमुख लक्ष्य होता है। उस क्रम में आने वाले सुख, दुःखों की वे परवाह नहीं करते हैं।

२. व्यक्ति का कर्तव्य है कि चिड़िया की आँख पर स्थित अर्जुन के लक्ष्य के समान, अपने लक्ष्य पर ही अपनी ध्यान पूर्णतया एकाग्र करके कार्य करे, तभी उसे सिद्धि प्राप्त होती है।

३. शिखरिणी छन्द का प्रयोग हुआ है, लक्षण इस प्रकार है— रसैः रुद्रैश्छिन्ना यमन सभलागः शिखरिणी।

४. समुच्चय अलंकार का प्रयोग हुआ है।

व्याकरणात्मक टिप्पणी-

१. √शीङ् + क्यप् + टाप् (प्रथमा विभक्ति, एकवचन) शय्या २. पर्यङ्कं शयनं यस्य सः (बहुव्रीहि) पर्यंकशयनः ३. पर्यङ्के शयनम् (सप्तमी तत्पुरुष) पर्यंकशयनम् ४. √शीङ् + ल्युट् = शयनम्। आ + √हृ + घञ् = आहारः ५. शाकस्य आहारः = शाकाहरः। शाल्याः ओदनः शाल्योदनः (षष्ठी तत्पुरुष) ६. शाल्योदने रुचिः यस्य सः (बहुव्रीहि) शाल्योदनरुचिः ७. कन्था + √धृ + णिनि (पुंल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) कन्थाधारी ८. कन्थम् धारयति इति = कन्थाधारी ९. दिव्यम् अम्बरम् दिव्याम्बरं, तं धरति इति दिव्याम्बरधरः १०. √धृ + अच् = धरः। कार्य + अर्थ + इनि = कार्यार्थिन् ११. कार्यस्य अर्थी, कार्यार्थी (षष्ठी तत्पुरुष) १२. मनस् + विनि = मनस्विन् (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) मनस्वी १३. √गण् + णिच् + तिप् (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) गणयति १४. शाक + आ + √हृ + णिनि = शाकाहारिन् (प्रथम विभक्ति, एकवचन) शाकाहारी

निन्दन्तु नीतिनिपुणा यदि वा स्तुवन्तु,
लक्ष्मीः समाविशतु गच्छतु वा यथेष्टम्।
अद्यैव वा मरणमस्तु युगान्तरे वा,
न्याय्यात्पथः प्रविचलन्ति पदं न धीराः॥८९॥

नीतिशतकम् ११७

अन्वय- यदि नीतिनिपुणाः निन्दन्तु वा स्तुवन्तु, लक्ष्मीः समाविशतु वा यथेष्टम् गच्छतु, अद्य एव मरणम् अस्तु, वा युगान्तरे (मरणम् अस्तु) धीराः पदम् न्यायात् पथः न प्रविचलन्ति।

अनुवाद- भले ही नीति में निपुण (लोग) निन्दा करें या स्तुति, लक्ष्मी आ जाए या इच्छानुसार चली जाए, आज ही मरण हो या युगों के बाद (मरें), धैर्यशाली (लोगों) के पैर न्याय के मार्ग से विचलित नहीं होते हैं।

व्याख्या- धैर्यवान् लोग किसी भी परिस्थिति में न्यायोचित मार्ग से हटते नहीं हैं, इसी बात का अत्यन्त सुन्दर ढंग से प्रतिपादन करते हुए कवि कहता है कि—

नीतिज्ञ लोग भले ही उनके कार्यों की आलोचना करें अथवा प्रशंसा करें, वे संयोगवश धनवान् हो जाए अथवा पूर्णतया दरिद्र ही क्यों न हो जाएँ, अल्पायु में ही उनकी मृत्यु भी क्यों न हो जाए अथवा भले ही बहुत वर्षों तक जीवित क्यों न रहें। धैर्य को धारण करने वाले व्यक्ति न्याय के मार्ग का परित्याग किसी भी परिस्थिति में नहीं करते हैं।

कहने का तात्पर्य है कि धैर्यवान् लोगों की विशेषता है कि न्याय के मार्ग का एक बार अवलम्बन करने के बाद लोगों की निन्दा अथवा प्रशंसा का, धन की हानि अथवा लाभ का, जीवन अथवा मृत्यु का उनके ऊपर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है, वे बेझिझक निडर होकर अपने द्वारा भली प्रकार विचार कर स्वीकार की गई न्यायोचित कार्य प्रणाली एवं सिद्धान्तों का परित्याग नहीं करते हैं। स्थिर चित्तता ही उनकी विशेषता है।

विशेष- १. धैर्यवान् लोगों की विशेषता का कथन किया गया है। २. उदात्त अलंकार का प्रयोग हुआ है। ३. वसन्ततिलका छन्द का प्रयोग हुआ है— लक्षण—

उक्ता वसन्ततिलका तभजा जगौ गः।

४. यदि पद का प्रयोग यहाँ ‘भले ही’ अर्थ की अभिव्यक्ति के लिए हुआ है।

व्याकरणात्मक टिप्पणी- १. नीतिषु निपुणः = नीतिनिपुणः २. √निन्द् + झि (लोट् लकार, प्रथम पुरुष, बहुवचन) निन्दन्तु ३. √स्तु + झि (लोट् लकार, प्रथम पुरुष, बहुवचन) स्तुवन्तु ४. सम् + आ + √विश् + झि (लोट् लकार, प्रथम पुरुष, बहुवचन) समाविशतु ५. यथा + √इष् + क्त = यथेष्टम् ६. अन्यत् युगं इति युगान्तरम् तस्मिन् युगान्तरे ७. न्याय + यत् (पुल्लिंग, पञ्चमी विभक्ति, एकवचन) न्यायात् ८. प्र + वि + √चल् + झि (लट् लकार, प्रथम पुरुष, बहुवचन) प्रविचलन्ति

११८ श्रीभर्तृहरिविरचितम्

९. √मृ + ल्युट् = मरणम्
१०. अद्य + एव (वृद्धिरेचि— अ + ए = ऐ)
११. √अस् + तिप् (लोट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) अस्तु

कदर्थितस्यापि हि धैर्यवृत्ते-
र्न शक्यते धैर्यगुणाः प्रमाष्टुम्।
अधोमुखस्यापि कृतस्य वह्ने-
र्नाधःशिखा याति कदाचिदेव॥९०॥

अन्वय- कदर्थितस्य अपि धैर्यवृत्तेः, धैर्यगुणाः प्रमाष्टुम् न हि शक्यते। अधः मुखस्य कृतस्य अपि वह्नेः शिखा कदाचित् एव अधः न याति।

अनुवाद- पीड़ित किए जाते हुए भी धैर्यशाली (व्यक्ति) के धैर्य के गुणों को नष्ट नहीं किया जा सकता है। नीचे की ओर मुख की गई भी अग्नि की ज्वाला भी कभी नीचे की ओर नहीं जाती है।

व्याख्या- धैर्य को धारण करने वाले व्यक्तियों को कितना भी कष्ट क्यों न दिया जाए वे अपने प्रशंसनीय धैर्य के गुणों का परित्याग नहीं करते हैं। इसी कथन को कवि अग्नि के उदाहरण द्वारा समझते हुए कहते हैं कि धैर्यशाली लोग अग्नि के समान होते हैं, अग्नि की ज्वालाओं को भी कितना ही नीचे की ओर गति वाला क्यों न किया जाए वे ऊपर की ओर ही उठती हैं। ठीक इसी प्रकार धैर्यवान् अपने धैर्य का परित्याग नहीं करते, भले ही उन्हें कितना ही पीड़ित क्यों न किया जाए।

विशेष- १. धैर्यशाली लोगों का स्वभाव अग्नि के समान तेजस्वी और स्वाभिमानी, कभी न झुकने वाला होता है।
२. अग्नि शिखा की विशेषता होती है कि वह सदैव ऊपर की ओर ही जाती है।
३. दृष्टान्त अलंकार का प्रयोग हुआ है।
४. उपजाति छन्द का प्रयोग हुआ है।

व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. कदर्थ + इतच् (पुल्लिंग, षष्ठी विभक्ति, एकवचन) कदर्थितस्य
२. धीर + ण्यत् = धैर्य। √वृत् + क्तिन् = वृत्तिः
३. प्र + √मृज् + तुमुन् = प्रमाष्टुम्
४. अधः मुखं यस्य सः, अधोमुखः, तस्य अधोमुखस्य (बहुव्रीहि)
५. √शक् + त (आत्मने, लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) शक्यते

वरं शृङ्गोत्सङ्गाद् गुरुशिखरिणः क्वापि विषमे,
पतित्वाय कायः कठिनदृषदन्ते विगलितः।

नीतिशतकम् १११९

वरं न्यस्तो हस्तः फणिपतिमुखे तीक्ष्ण दशने.
वरं वह्नौ पातस्तदपि न कृतः शीलविलयः॥१९१॥

अन्वय- गुरुशिखरिणः शृङ्गोत्सङ्गात् क्व अपि विषमे कठिनदृषदन्ते पतित्वा अयम् कायः विगलितः वरम्।

तीक्ष्णदशने फणपतिमुखे हस्तः न्यस्तः वरम्। वह्नौ पातः (अपि) वरम्। तदपि शीलविलयः कृतः वरम् न।

अनुवाद- विशाल पर्वत की चोटी के अग्रभाग से कहीं भी विषम और कठोर पत्थरों के बीच में गिरकर यह शरीर नष्ट हो जाए (तो) अच्छा है। तीखे दांतों वाले नागराज के मुख में हाथ रख दें (वह भी) अच्छा है। आग में गिर पड़ना (भी) अच्छा है। तो भी श्रेष्ठ स्वभाव का त्याग करना अच्छा नहीं है।

व्याख्या- विकटतम परिस्थितियों में भी मनुष्य को शील का परित्याग नहीं करना चाहिए, इसका प्रतिपादन करते हुए कवि ने सर्वाधिक ऊँचे पर्वत की चोटी से उबड़-खाबड़ तथा कठोर पत्थरों पर गिरकर शरीर का टुकड़े-टुकड़े हो जाना ठीक माना। इसके अतिरिक्त अत्यन्त विषैले महासर्प के मुख में स्थित तीक्ष्ण दाढ़ों में भले ही हाथ भी क्यों न रखना पड़े। वह भी बुरी बात नहीं है। इतना ही नहीं, यदि किन्हीं परिस्थितियों में अपने शरीर को आग में भी क्यों न जलाना पड़े, तो भी मनुष्य को अपने शील का परित्याग नहीं करना चाहिए।

कहने का तात्पर्य है कि शरीर के कष्टों की परवाह न करते हुए, प्राणों की भी उपेक्षा करते हुए व्यक्ति का कर्तव्य है कि अपने शील की अत्यन्त सचेष्ट होकर रक्षा करे।

विशेष- १. प्राणों का परित्याग करके भी अपने शील की रक्षा करनी चाहिए।
२. इसी प्रकार के भाव अन्यत्र भी अभिव्यक्त हुए हैं—

वृत्तं यत्नेन संरक्षेद् वित्तमेति च याति च।
अक्षीणो वित्ततः क्षीणो वृत्तस्तु हतो हतः॥
३. शिखरिणी छन्द का प्रयोग हुआ है लक्षण इस प्रकार है—
रसैः रुद्रैश्छिन्ना यमन सभलागः शिखरिणी।
४. नीतिशतकम् की सभी प्रतियों में यह श्लोक उपलब्ध नहीं होता।

व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. वि + √गल् + क्त = विगलितः
२. तीक्ष्णानि दशनानि यस्य सः, तीक्ष्णदशनः तस्मिन्, तीक्ष्णदशने
३. नि + √अस् + क्त = न्यस्तः
४. √पत् + घञ् = पातः
५. √पत् + क्त्वा = पतित्वा

१२०श्रीभर्तृहरिविरचितम्

६. फणिनां पतिः, फणिपतिः, तस्य मुखे, फणिपतिमुखे
७. शीलस्य विलयः (षष्ठी तत्पुरुष) शीलविलयः
८. √कृ + क्त = कृतः
९. शृंगस्य उत्संगः, शृंगोत्संगः तस्मात् = शृंगोत्संगात्

वह्निस्तस्य जलायते जलनिधिः कुल्यायते तत्क्षणान्
मेरुः स्वल्पशिलायते मृगपतिः सद्य कुरङ्गायते।
व्यालः माल्यगुणायते विषरसः पीयूष वर्षायते,
यस्याङ्गेऽखिललोकवल्लभतमं शीलं समुन्मीलति॥९२॥

अन्वय- यस्य अङ्गे अखिललोकवल्लभतमम् शीलम् समुन्मीलति, तस्य वह्नि जलायते, जलनिधिः तत्क्षणात् कुल्यायते, मेरुः स्वल्पशिलायते, मृगपतिः सद्यः कुरङ्गायते, व्यालः माल्यगुणायते, विषरसः पीयूष वर्षायते।

अनुवाद- जिसके अङ्ग में सम्पूर्ण संसार का सर्वाधिक प्रिय चरित्र प्रकट होता है, उसके (लिए) अग्नि जल बन जाती है, समुद्र उसी क्षण छोटी सी नदी बन जाता है, मेरु (पर्वत) छोटी सी शिला बन जाता है, शेर तुरन्त (ही) हिरण बन जाता है, सर्प पुष्पमाला बन जाता है (और) विष का रस (भी) अमृत वर्षा करने वाला हो जाता है।

व्याख्या- जिस व्यक्ति के शरीर में, इस संसार में सभी लोगों को अच्छा लगने वाला सत् स्वभाव, सदाचार विद्यमान है, उसके लिए अग्नि के समान विनाशकारी एवं पीड़ा पहुँचाने वाले लोग भी जल के समान शीतल स्वभाव वाले हो जाते हैं। समुद्र के समान गम्भीर समस्याएँ भी छिछली नदी के समान सुगम हो जाती हैं, मेरुपर्वत के समान विशालाकार वाली कठिनाइयाँ भी शिला के समान छोटे आकार को धारण कर लेती हैं। शेर जैसा भयावह शक्तिशाली शत्रु भी हिरण के समान सीधा और विनम्र हो जाता है; सर्प के समान अहित करने वाले भयंकर दुष्ट पुष्पमाला के समान उनकी शोभा बनकर अनुकूल आचरण करने वाले हो जाते हैं। गरल जैसे भयानक विष का रस भी अमृत की बूँदों की वर्षा करने वाला हो जाता है।

विशेष- १. सच्चरित्र की अत्यधिक प्रशंसा की गई है। अतः व्यक्ति को अपने जीवन में शील का सदैव संरक्षण करना चाहिए।
२. अन्यत्र भी कहा गया है- "वृत्तं यत्नेन संरक्षेत्" शील की यत्नपूर्वक रक्षा करनी चाहिए।
३. 'जलायते' आदि क्रिया पदों में क्यङ् प्रत्यय का प्रयोग 'इव आचरति' अर्थ की अभिव्यक्ति के लिए हुआ है।
४. यहाँ सर्वत्र अन्योक्तिपरक अर्थ करना उचित है जैसे- सर्प यहाँ जहर उगलने वाले दुष्ट लोगों का प्रतीक है, इसी प्रकार शेर शक्ति के कारण अहंकारी लोगों का।

नीतिशतकम् १२१

५. शीलवान् व्यक्ति के लिए इस संसार में कुछ भी दुःसाध्य नहीं है। ६. शार्दूलविक्रीडित छन्द का प्रयोग हुआ है लक्षण इस प्रकार है—
सूर्याश्वैर्मसजास्ततः सगुरवः शार्दूलविक्रीडितम्। ७. काव्यलिंग अलंकार का प्रयोग दर्शनीय है।

व्याकरणात्मक टिप्पणी— १. अखिलाः लोकाः, अखिललोकाः (कर्मधारय) तेषां बल्लभतमम् अखिल-लोकबल्लभतमम् (षष्ठी तत्पुरुष) बल्लभ + तमप्
२. कुल्या + क्यङ् + त (आत्मने, लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) कुल्यायते
३. जल + क्यङ् + त (आत्मने, लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) जलायते
४. कुरङ्ग + क्यङ् + त (आत्मने, लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) कुरङ्गायते
५. माल्यगुण + क्यङ् + त (आत्मने, लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) माल्यगुणायते
६. स्वल्पशिला + क्यङ् + त (आत्मने, लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) स्वल्पशिलायते
७. पीयूषवर्षा + क्यङ् + त (आत्मने, लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) पीयूषवर्षायते
८. पीयूषस्य वर्षा (षष्ठी तत्पुरुष) पीयूषवर्षा
९. विषस्य रसः (षष्ठी तत्पुरुष) विषरसः
१०. जलानां निधिः (षष्ठी तत्पुरुष) जलनिधिः
११. कुल्यायते-कुल्या इव आचरति, जलमिव आचरति, जलायते, कुरङ्ग इव आचरति = कुरङ्गायते, माल्यगुणमिव आचरति, माल्यगुणायते, पीयूष वर्षा इव आचरति, पीयूष वर्षायते
१२. सम् + उत् + √मील् + तिप् (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) समुन्मीलति
१३. मृगाणां पतिः, मृगपतिः (षष्ठी तत्पुरुष)
१४. यस्य + अङ्गे (अकः सवर्णे दीर्घः) (अ + अ = आ)

छिन्नोऽपि रोहति तरुः, क्षीणोऽप्युपचीयते पुनश्चन्द्रः।
इति विमृशन्तः सन्तः, सन्तप्यन्ते न ते विपदा¹॥९३॥

अन्वय- तरुः छिन्नः अपि रोहति, चन्द्रः क्षीणः अपि पुनः उपचीयते, इति विमृशन्तः ते सन्तः विपदा न सन्तप्यन्ते।


१. विश्लथेषु लोकेषु (संसार में स्फूर्तिहीन होने पर)

१२२ श्रीभर्तृहरिविरचितम्

अनुवाद- वृक्ष, कटा हुआ भी बढ़ जाता है, चन्द्रमा, क्षीण हुआ भी वृद्धि को प्राप्त हो जाता है, ऐसा सोचते हुए वे सज्जन विपत्ति से संतप्त नहीं होते हैं।

व्याख्या- मनुष्य को कभी भी विपत्तियों के आने पर दुःखी नहीं होना चाहिए, क्योंकि प्रकृति का शाश्वत् नियम है कि कभी भी एक जैसी स्थिति नहीं रहती। आप ही देखिए पेड़ को काटने का बाद भी वह फिर से उग आता है। ठीक इसी प्रकार चाँद भी एक बार धीरे-धीरे क्षीण होता है, किन्तु फिर से बढ़ जाता है, हमेशा एक सा नहीं रहता है। अतः सम्पत्ति और विपत्ति प्रकृति का नियम है।

विशेष- १. सुख और दुःख संसार का नियम है, अतः दुःख से व्यक्ति को घबराना नहीं चाहिए। २. व्यक्ति को धैर्य का आचरण करना चाहिए। ३. अन्यत्र भी कहा गया है- 'चक्रवत् परिवर्तन्ते सुखानि च दुःखानि च' ४. आर्या छन्द का प्रयोग हुआ है- लक्षण इस प्रकार है— यस्याः पादे प्रथमे, द्वादश मात्रास्तथा तृतीयेऽपि। अष्टादश द्वितीये, चतुर्थके पञ्चदश सार्या॥ ५. काव्यलिंग अलंकार का प्रयोग हुआ है।

व्याकरणात्मक टिप्पणी- १. √सम् + √तप् + झ (आत्मने, लट् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) सन्तप्यन्ते २. √छिद् + क्त (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) छिन्नः ३. √रुह् + तिप् (लट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) रोहति ४. √क्षै + क्त (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) क्षीणः ५. उप + √ची + त (लट् लकार, आत्मने पद, प्रथम पुरुष, एकवचन) उपचीयते ६. वि + √मृश् + शतृ (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) विमृशन्तः ७. वि + √पद् + क्विप् (स्त्रीलिंग, तृतीया विभक्ति, एकवचन) विपदा

ऐश्वर्यस्य विभूषणं सुजनता शौर्यस्य वाक् संयमो,
ज्ञानस्योपशमः श्रुतस्य विनयो वित्तस्य पात्रे व्ययः।
अक्रोधस्तपसः क्षमा प्रभवितुर्धर्मस्य निर्व्याजता,
सर्वेषामपि सर्वकारणमिदं शीलं परं भूषणम्॥९४॥

अन्वय- सुजनता ऐश्वर्यस्य, वाक्-संयमः शौर्यस्य, उपशमः ज्ञानस्य, विनयः श्रुतस्य, पात्रे व्ययः वित्तस्य, अक्रोधः तपसः, क्षमा प्रभवितुः, निर्व्याजता धर्मस्य भूषणम् (अस्ति)। (किन्तु) सर्वकारणम् अपि इदम् शीलम् सर्वेषाम् परम् भूषणम् (अस्ति)।

नीतिशतकम् १२३

अनुवाद- सज्जनता ऐश्वर्य का, वाणी पर नियन्त्रण वीरता का, शान्ति ज्ञान का, विनम्रता शास्त्र (ज्ञान) का, सत्पात्र में खर्च धन का, क्रोध न करना तप का, क्षमा प्रभावशाली का, निश्छलता धर्म का आभूषण (हैं), (किन्तु) सभी का कारण यह सत्स्वभाव (शील) सर्वश्रेष्ठ आभूषण (है)।

व्याख्या- व्यक्ति के अन्यान्य गुणों की चर्चा करते हुए कवि श्रेष्ठ स्वभाव की सर्वोत्कृष्टता प्रतिपादित करते हुए कहता है कि, यदि व्यक्ति ऐश्वर्य सम्पन्न है और साथ ही सज्जन भी है तो यह गुण आभूषण के समान है।

इसी प्रकार यदि व्यक्ति शूरवीर है साथ ही अपनी वाणी पर नियन्त्रण रखने वाला भी है तो यह गुण उसके लिए आभूषण के समान है। व्यक्ति ज्ञानवान् भी है साथ ही शान्त प्रकृति भी है तो यह उसके लिए अलंकरण ही है।

ठीक इसी प्रकार व्यक्ति अपने धन का खर्च सत्पात्र पर करता है, व्यर्थ ही लुटाता नहीं है तो यह बात उसकी शोभा को बढ़ाने वाली है। तपस्वी होते हुए भी व्यक्ति यदि क्रोधी नहीं है तो यह उसके लिए आभूषण ही है।

प्रभावशाली होते हुए भी यदि व्यक्ति क्षमा धारण करता है तो यह उसकी शोभा में वृद्धि करने वाला है। धार्मिक प्रवृत्ति वाला होते हुए भी व्यक्ति का निष्कपट होना, उसके लिए आभूषण है।

किन्तु इन सभी बातों से अलग और सभी का कारण रूप एवं सर्वोत्कृष्ट गुण, शील अर्थात् श्रेष्ठ स्वभाव व्यक्ति का सबसे बड़ा आभूषण है। कहने का तात्पर्य है कि यदि व्यक्ति का श्रेष्ठ स्वभाव है तो समझना चाहिए कि उसके पास सबसे बड़ा आभूषण है।

विशेष- १. शील की सर्वोत्कृष्टता प्रतिपादित की है। २. व्यक्ति को अच्छे गुणों के लिए किन-किन बातों का ध्यान रखना चाहिए, इसका अत्यन्त प्रभावशाली ढंग से प्रतिपादन किया गया है। ३. स्वर्णादि से निर्मित आभूषणों की निस्सारता का प्रतिपादन किया गया है। ४. मनुष्य के सर्वश्रेष्ठ आभूषण तो उसके गुण हैं। ५. अन्यत्र कवि ने एकमात्र मधुर वाणी को ही सर्वश्रेष्ठ आभूषण प्रतिपादित किया है— ‘‘वाग्भूषणं भूषणम्’’। ६. शार्दूलविक्रीडित छन्द— सूर्याश्वैर्मसजास्ततः सगुरवः शार्दूलविक्रीडितम्।

व्याकरणात्मक टिप्पणी- १. सुजन + तल् + टाप् (प्रथमा विभक्ति, एकवचन) सुजनता २. ईश्वरस्य भावः ऐश्वर्यः, तस्य ऐश्वर्यस्य ३. ईश + वरच् = ईश्वर + ष्यञ् = ऐश्वर्यः, तस्य ईश्वरस्य ४. वि + √भूष् + ल्युट् = विभूषणम्

१२४ श्रीभर्तृहरिविरचितम्

५. वाचाम् संयमः, वाक् संयमः (षष्ठी तत्पुरुष) सम् + √यम् + अप् = संयमः ६. शूरस्यभावः, शौर्यः, तस्य, शूर + ष्यञ् (नपुं., षष्ठी विभक्ति, एकवचन) ७. उप + √शम् + घञ् (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) उपशमः ८. वि + √नी + अच् (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) विनयः ९. √श्रु + क्त = श्रुतः, तस्य श्रुतस्य १०. प्र + √भू + तृच् = प्रभवितृ - तस्य, प्रभवितुः (पुल्लिंग, षष्ठी विभक्ति, एकवचन) ११. निर् + व्याज + तल् + टाप् = निर्व्याजता १२. सर्वेषाम् कारणम्, सर्वकारणम् (षष्ठी तत्पुरुष) १३. ज्ञानस्य + उपशमः (गुण् - आद् गुणः) (अ + उ = ओ) १४. विनयः + वित्तस्य (विसर्ग - हशि च) (:— उ— ओ)

रे रे चातक! सावधानमनसा मित्र! क्षणं श्रूयतां, अम्भोदा बहवो हि सन्ति गगने सर्वेऽपि नैतादृशाः। केचिद् वृष्टिभिरार्द्रयन्ति वसुधां गर्जन्ति केचिद् वृथा, यं यं पश्यसि तस्य तस्य पुरतो मा ब्रूहि दीनं वचः॥९५॥

अन्वय- रे रे मित्र चातक! सावधान मनसा क्षणम् श्रूयताम्। गगने बहवः अम्भोदाः सन्ति, हि सर्वे अपि एतादृशाः न। केचित् वृष्टिभिः वसुधाम् आर्द्रयन्ति, केचित् वृथा गर्जन्ति (इत्यर्थम् त्वम्) यम् यम् पश्यसि, तस्य तस्य पुरतः दीनम् वचः मा ब्रूहि।

अनुवाद- हे मित्र चातक! सावधान मन से क्षण भर के लिए सुनो। आकाश में बहुत से बादल हैं, किन्तु सभी एक जैसे नहीं (हैं)। कुछ वर्षा के द्वारा पृथिवी को गीला करते हैं, (परन्तु) कुछ व्यर्थ (ही) गरजते हैं। (इसलिए तुम) जिस-जिसको देखते हो, उस-उस के सामने दीन वचन मत कहो।

व्याख्या- चातक को सम्बोधित करके कवि कहता है कि हे चातक, तुम मेरी बात जरा ध्यान लगाकर क्षणभर के लिए सुनो, आकाश में तुम्हें अनेक बादल दिखाई दे रहे हैं, किन्तु वे सभी एक जैसे नहीं हैं। उनमें कुछ तो जल-वर्षा करके पृथिवी की प्यास बुझाते हैं, किन्तु कुछ तो व्यर्थ ही गर्जन करते हैं अर्थात् बरसते नहीं हैं।

इसलिए तुम जिसे भी देखते हो अपनी दीनवाणी को उस-उसके सामने मत कहो। प्रत्येक के सामने अपनी दीनता प्रकट करना उचित नहीं है।

यहाँ चातक, याचक का प्रतीक है तथा बादल धनवानों का। सभी धनवान् दानदाता नहीं होते, उदार हृदय नहीं होते। अतः याचकों को प्रत्येक के सामने स्वयं की दीनता प्रकट नहीं करनी चाहिए। जो धनवान् वस्तुतः दान देने वाले, दयालु हृदय हैं, उन्हीं के सामने याचना करना उचित है।

नीतिशतकम् १२५

विशेष- १. चातक के विषय में प्रसिद्ध है कि वह केवल वर्षा के जल को ही पीता है।
२. प्रत्येक धनवान् के सामने दीनतापूर्ण व्यवहार याचक के लिए उचित नहीं है।
३. प्रसिद्धि है, 'जो गरजते हैं, बरसते नहीं हैं'।
४. प्रस्तुत श्लोक में अन्योक्ति के माध्यम से धनवानों की मानसिकता का प्रतिपादन किया गया है।
५. शार्दूलविक्रीडित छन्द का प्रयोग है लक्षण इस प्रकार है—
सूर्याश्वैर्मसजस्तताः सगुरवः शार्दूलविक्रीडितम्।
६. काव्यलिंग अलंकार का प्रयोग हुआ है।

व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. अवधानेन सहितम् सावधानम्, सावधानम् मनः सावधानमनः, तेन - सावधानमनसा
२. अम्भस् + √दा + क, अम्भांसि ददति इति अम्भोदाः
३. वसु + √धा + क + टाप्, वसुधा, ताम् वसुधाम्
४. √आर्द्र + णिच् + झि (लट् लकार, प्रथम पुरुष, बहुवचन) आर्द्रयन्ति
५. पुर + तस् = पुरतः
६. न + एतादृशाः (वृद्धि, वृद्धिरेचि) नैतादृशाः
७. पुरतः + मा (विसर्ग, हशि च) पुरतो मा
८. केचित् + वृष्टिभिः + आर्द्रयन्ति (झलां जशोऽन्ते, ससजुषो रुः)
९. केचित् + वृथा (व्यञ्जन - झलां जशोऽन्ते)
१०. √दृश् + सिप् (लट् लकार, मध्यम पुरुष, एकवचन) पश्यसि
११. √अस् + झि (लट् लकार, प्रथम पुरुष, बहुवचन) सन्ति

दैव-पद्धतिः

नेता यस्य बृहस्पतिः प्रहरणं वज्रं सुराः सैनिकाः,
स्वर्गो दुर्गमनुग्रहः किल हरेरैरावतो वारणः।
इत्यैश्वर्यबलान्वितोऽपि बलभिद् भग्नः परैः सङ्गरे,
तद् व्यक्तं वरमेव दैवशरणं धिग् धिग् वृथा पौरुषम्॥९६॥

अन्वय- बृहस्पति यस्य नेता, वज्रम् प्रहरणम्, सुराः सैनिकाः, स्वर्गः दुर्गम्, हरेः अनुग्रहः, ऐरावतः वारणः इति, ऐश्वर्यबलान्वितः अपि बलभित् संगरे परैः भग्नः। तत् व्यक्तम्, दैवशरणम् एव वरम्, धिक् धिक् वृथा पौरुषम्।

१२६श्रीभर्तृहरिविरचितम्

अनुवाद- बृहस्पति जिसका नेता (था), वज्र शस्त्र (था), देवता सैनिक (थे), स्वर्ग दुर्ग (था), विष्णु की कृपा भी (थी), ऐरावत (हाथी) वाहन था, इस प्रकार ऐश्वर्य और बल से युक्त (होता हुआ) भी इन्द्र युद्ध में शत्रुओं द्वारा हरा दिया गया। तो स्पष्ट है कि भाग्य की शरण ही उचित है, व्यर्थ के पुरुषार्थ को धिक्कार है।

व्याख्या- इस संसार में भाग्य ही प्रबल है, पुरुषार्थ, परिश्रम आदि सब व्यर्थ हैं, इसकी पुष्टि के लिए इन्द्र का उदाहरण देते हुए कवि कहता है कि बृहस्पति जैसा नीतिनिपुण एवं विद्वान् देवता जिसका मार्गदर्शक रहा, वज्र के समान अत्यन्त प्रभावशाली हथियार जिसका शस्त्र था, अत्यन्त सामर्थ्यवान् देवता जिसके सैनिक के रूप में थे, स्वर्ग जैसा सुरक्षित एवं दुर्गम स्थान जिसका दुर्ग था, सम्पूर्ण संसार का पालन करने वाले परमपिता परमेश्वर की जिस पर कृपा थी, ऐरावत जैसा शक्तिशाली हाथी जिसका वाहन था, ऐसे बल नामक राक्षस का विनाश करने वाले इन्द्र को, इतने सहयोग और सामर्थ्य के उपरान्त भी उसके शत्रु राक्षसों ने युद्ध भूमि में हरा दिया।

तो इस सब घटनाक्रम को देखकर निश्चयपूर्वक यही कहा जा सकता है कि पुरुषार्थ पूर्णतया व्यर्थ एवं निरर्थक है, उसे बार-बार धिक्कार है। वस्तुतः एकमात्र भाग्य ही प्रबल होता है। अतः व्यक्ति को पुरुषार्थ करके अपने मन, मस्तिष्क एवं शरीर को व्यर्थ ही कष्ट नहीं देना चाहिए।

विशेष- १. भाग्य की प्रमुखता सोदाहरण अत्यन्त सुन्दर शैली में सप्रमाण प्रस्तुत की है।
२. बलभित् का प्रयोग स्वयं इन्द्र को भी शक्तिशाली बताने के लिए किया गया है।
३. युद्ध विजय के लिए जितने भी साधनों की आवश्यकता होती है, वे सब इन्द्र के पास होते हुए भी उसकी पराजय में एकमात्र भाग्य की प्रबलता ही कारण थी।
४. जब देवताओं के राजा की भी भाग्य के समक्ष एक भी नहीं चली, तब मनुष्य की तो बात ही क्या है।
५. प्रस्तुत श्लोक में प्रयुक्त सभी विशेषण अभिप्राययुक्त प्रयुक्त हुए हैं' अतः परिकर अलंकार का प्रयोग हुआ है-

विशेषणैर्यत् साकूतैरुक्तिः परिकरस्तु सः

६. शार्दूलविक्रीडित छन्द प्रयुक्त हुआ है, लक्षण इस प्रकार है-

सूर्याश्वैर्मसजास्ततः सगुरवः शार्दूलविक्रीडितम्।

७. ‘धिक्’ के योग में ‘पौरुषम्’ में द्वितीया विभक्ति का प्रयोग हुआ है।

व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. √नी + तृच् = नेतृ (प्रथमा विभक्ति, एकवचन) नेता
२. बृहतां पतिः, बृहस्पतिः (षष्ठी तत्पुरुष)

नीतिशतकम् १२७

३. प्र + √हृ + ल्युट् (नपुं., प्रथमा विभक्ति, एकवचन) प्रहरणम्
४. √वृ + णिच् + ल्युट् (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) वारणः
५. ऐश्वर्यञ्च बलञ्च तेन अन्वितः ऐश्वर्यबलान्वितः (द्वन्द्व समास)
६. बलं भिन्ति इति बलभिद्
७. बल + √भिद् + क्विप् (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) बलभित्
८. √भञ्ज् + क्त (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) भग्नः
९. इरा + मतुप् + अण् = ऐरावत
१०. दैवम् एव शरणम् देवस्यशरणम् वा (षष्ठी तत्पुरुष)
११. √श्रृ + ल्युट् = शरणम्
१२. अनु + √ग्रह् + अप् = अनुग्रहः
१३. इति + ऐश्वर्यबलान्वितः + अपि (इकोयणचि, अतोरोरप्लुतादप्लुते, एड्ः पदान्तादति)
१४. तत् + व्यक्तम् (झलांजशोऽन्ते) (त्— द्)

भग्नाशस्य करण्डपीडित¹ तनोर्म्लानेन्द्रियस्य क्षुधा,
कृत्वाखुर्विवरं स्वयं निपतितो नक्तं मुखे भोगिनः।
तृप्तस्तत्पिशितेन सत्वरमसौ तेनैव यातः पथा,
लोकाः पश्यत² दैवमेव हि नृणां³ वृद्धौ क्षये कारणम्॥९७॥

अन्वय- करण्डपीडिततनोः, क्षुधा म्लानेन्द्रियस्य, भग्नाशस्य भोगिनः मुखे नक्तम् आखुः विवरम् कृत्वा स्वयम् निपतितः। तत् पिशितेन तृप्तः असौ (सर्पः) सत्वरम् तेन एव पथा यातः। लोकाः पश्यत, नृणाम् वृद्धौ, क्षये हि दैवम् एव कारणम् (अस्ति)।

अनुवाद- पिटारी में दबे हुए शरीर वाले, भूख से शिथिल इन्द्रियों वाले, नष्ट हुई (जीवन की) आशा वाले साँप के मुँह में, रात्रि में (एक) चूहा छेद करके स्वयं गिर पड़ा। उस मांस से संतुष्ट हुआ वह (साँप) शीघ्र ही उसी मार्ग से (बाहर) चला गया, लोगों देखो, मनुष्यों की समृद्धि और हानि में भाग्य ही (एकमात्र) कारण (है)।

व्याख्या- इस संसार में किसी भी प्राणी की लाभ-हानि, जीवन-मरण, सुख-दुःख सभी भाग्य से नियन्त्रित हैं, इसी बात को एक सर्प के उदाहरण द्वारा प्रतिपादित करते हुए कवि कहता है कि—
एक साँप को सपेरे ने पिटारी में बन्द कर दिया वहाँ भूख और प्यास के कारण


१. पिण्डित (कुण्डली बनाकर)
२. स्वस्थस्तिष्ठति
३. परंवृद्धौ

१२८ || श्रीभर्तृहरिविरचितम्

उसका अंग-अंग ढीला हो गया था अर्थात् उसमें तनिक भी शक्ति नहीं रही थी, अपने जीवन से भी वह पूरी तरह निराश हो चुका था अर्थात् उसे अपने जीवन की तनिक भी आशा नहीं रही थी।

किन्तु भाग्य की प्रबलता देखिए रात्रि में कोई चूहा उसकी पिटारी में छेद बनाकर स्वयं ही उसके ऊपर गिर पड़ा। तुरन्त सर्प ने उस चूहे को धर दबोचा और खा गया। उसके मांस को खाने से उसकी भूख शान्त हुई और उसके शरीर में बल का सञ्चार हुआ, जिससे वह उसी छेद से, जिससे चूहा अंदर आया था, निकलकर बाहर चला गया अर्थात् उसके प्राण जाते-जाते बच गए तथा वह स्वतन्त्र भी हो गया।

इस समस्त घटना का वर्णन करने का बाद कवि जनसामान्य को सम्बोधित करते हुए कहता है कि हे मनुष्यो ! इस सबको देखकर इतना तो निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि इस संसार के सभी प्राणियों के जीवन-मरण, हानि-लाभ अदि सभी क्रियाओं के पीछे भाग्य की प्रबलता को ही स्वीकार करना पड़ता है।

विशेष— १. भाग्यवान् यहाँ असम्भव सम्भव सब कुछ प्राप्त करता है। भाग्यहीन को कुछ प्राप्त नहीं होता।
२. भाग्य का निर्माण पूर्वजन्म के कर्मों से होता है।
३. भाग्य की प्रबलता अत्यन्त सुन्दर ढंग से प्रतिपादित की गई है। मनुष्य की उन्नति और अवनति का कारण एकमात्र भाग्य ही है।
४. अप्रत्यक्ष रूप से पुरुषार्थ की निरर्थकता प्रतिपादित की गई है।
५. शार्दूलविक्रीडित छन्द, लक्षण—
सूर्य्याश्वैर्मसजास्ततः सगुरवः शार्दूलविक्रीडितम्।
६. दृष्टान्त अलंकार, लक्षण—
दृष्टान्तस्तु सधर्मस्य वस्तुनः प्रतिबिम्बनम्।

व्याकरणात्मक टिप्पणी—
१. भग्ना आशा यस्य तस्य (बहुव्रीहि) भग्नाशस्य
२. √भञ्ज् + क्त = भग्नः
३. करण्डेन पीडितः करण्डपीडितः, करण्डे पीडिता तनुः यस्य, तस्य
४. म्लानानि इन्द्रियाणि यस्य सः, तस्य (बहुव्रीहि) म्लानेन्द्रियस्य
५. √म्लै + क्त = म्लान। √भुज् +घञ् = भोग + इनि = भोगिन्
६. भोगः अस्ति अस्य इति, तस्य - भोगिनः (षष्ठी विभक्ति, एकवचन, पुल्लिंग)
७. नि + √पत् + क्त = निपतितः
८. √दृश् + थ (लोट् लकार, मध्यम पुरुष, बहुवचन) पश्यत
९. √वृध् + क्तिन् = वृद्धिः (सप्तमी विभक्ति, एकवचन) वृद्धौ
१०. √क्षि + अच् (पुल्लिंग, सप्तमी विभक्ति, एकवचन) क्षये

नीतिशतकम् १२९

११. कृत्वा + आखुः (अकः सवर्णे दीर्घः - आ + आ = आ)
१२. तेन + एव (वृद्धिरेचि— अ + ए = ऐ)

यथा कन्दुक पातेनोत्पतत्यार्यः पतन्नपि।
तथा त्वनार्यः पतति मृत्पिण्डपतनं यथा॥९८॥

अन्वय- यथा कन्दुक पातेन उत्पतति तथा आर्यः पतन् अपि (उत्पतति) तु यथा मृत्पिण्डपतनं (तथा) अनार्यः पतति।

अनुवाद- जिस प्रकार गेंद गिराने से ऊपर उठती है वैसे ही सज्जन (व्यक्ति) गिरते हुए भी ऊपर उठता है, किन्तु मिट्टी के ढेले पर गिरने के समान दुष्ट का पतन होता है।

व्याख्या- सज्जन व्यक्ति का पतन गेंद के गिराने के समान होता है, जिस प्रकार गेंद गिरकर भी पुनः उठती है वैसे ही सज्जन व्यक्ति की अवनति के बाद उन्नति सुनिश्चित है। इसके विपरीत दुर्जन व्यक्ति का पतन मिट्टी के ढेले के समान शाश्वत होता है। वह एक बार पतित होने के बाद पुनः उन्नति को प्राप्त नहीं होता।

विशेष- १. सज्जन व्यक्ति के पतन की तुलना गेंद के पतन से तथा दुष्ट व्यक्ति के पतन की मिट्टी के लोंधे के गिरने से की गई है।
२. दुष्ट व्यक्ति का पतन शाश्वत होता है, जबकि सज्जन व्यक्ति अवनति को प्राप्त करके भी उठता अवश्य है।
३. अनुष्टुप् छन्द का प्रयोग हुआ है। लक्षण इस प्रकार है—

श्लोके षष्ठं गुरुज्ञेयं सर्वत्र लघु पञ्चमम्।
द्विः चतुष्पादयोर्ह्रस्वं सप्तमं दीर्घमन्ययोः॥

४. दृष्टान्त अलंकार, लक्षण—

दृष्टान्तस्तु सधर्मस्य वस्तुनः प्रतिबिम्बनम्।

५. नीतिशतकम् की सभी पाण्डुलिपियों में यह श्लोक नहीं है।

व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. उत् + √पत् + तिप् (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) उत्पतति
२. √पत् + शतृ = पतन्
३. न आर्यः इति (नञ् समास) = अनार्यः
४. मृतस्य पिण्डं मृतपिण्डं (षष्ठी तत्पुरुष) तस्य पतनं = मृत्पिण्डपतनं
५. कन्दुकमिव पातः, कन्दुकपातः (कर्मधारय) तेन कन्दुकपातेन
६. पातेन + उत्पतति + आर्यः (आद् गुणः, इकोयणचि)
७. पतन् + अपि = पतन्नपि (ङमो ह्रस्वादचि ङमुण् नित्यम्)

१३० श्रीभर्तृहरिविरचितम्

खल्वाटो दिवसेश्वरस्य किरणैः सन्तापितो १ मस्तके,
वाञ्छन् २ देशमनातपं विधिवशात्ता ३ लस्य मूलं गतः।
तत्राप्यस्य महाफलेन पतता भग्नं सशब्दं शिरः,
प्रायो गच्छति यत्र भाग्यरहित ४ स्तत्रैव यान्त्यापदः ॥९९॥

अन्वय- दिवसेश्वरस्य किरणैः मस्तके सन्तापितः खल्वाटः अनातपम् देशम् वाञ्छन् विधिवशात् तालस्य मूलम् गतः। तत्र अपि पतता महाफलेन अस्य शिरः सशब्दम् भग्नम् (जातम्) भाग्यरहितः यत्र गच्छति, तत्रैव प्रायः आपदः यान्ति।

अनुवाद- सूर्य की किरणों से मस्तक पर अत्यन्त तपा हुआ गंजा धूपरहित प्रदेश को चाहता हुआ, भाग्यवश ताड़ (वृक्ष) के नीचे गया। वहाँ भी गिरते हुए बहुत बड़े (ताड़ के) फल से इसका सिर आवाज के साथ विदीर्ण (हो गया)। भाग्यहीन जहाँ जाता है, वहीं प्रायः आपत्तियाँ जाती हैं।

व्याख्या- दुर्भाग्य, व्यक्ति का पीछा कहीं भी नहीं छोड़ता है इसी का प्रतिपादन कवि ने अत्यन्त सुन्दर ढंग से उदाहरण देते हुए किया है। कोई गंजा व्यक्ति सूर्य की तीक्ष्ण किरणों से अत्यन्त पीड़ित होकर छाया की तलाश में जब एक ताड़ के पेड़ के नीचे पहुँचा ही था कि पेड़ से एक बड़ा सा ताड़ का फल उसके गंजे सिर पर धड़ाम से गिरा और उसका सिर एक दर्दनाक आवाज के साथ फट गया तथा वह व्यक्ति वहीं ढेर हो गया।

इस प्रकार भाग्यहीन व्यक्ति जहाँ भी जाता है, आपत्तियाँ उसके पीछे वहाँ-वहाँ जाती हैं अर्थात् कहीं भी उसका पीछा नहीं छोड़ती हैं।

विशेष- १. भाग्य की प्रबलता का सुन्दर उदाहरण प्रस्तुत किया है।
२. अच्छा या बुरा जैसा भी व्यक्ति का भाग्य होता है, वह कहीं भी क्यों न चला जाए, उसे भोगना ही पड़ेगा।
३. भाग्य पर विश्वास न करने वाले इसे मात्र संयोग की ही संज्ञा देते हैं।
४. शार्दूलविक्रीडित छन्द का प्रयोग हुआ है, लक्षण—
सूर्याश्वैर्मसजास्ततः सगुरवः शार्दूलविक्रीडितम्।
५. अर्थान्तरन्यास अलंकार का प्रयोग हुआ है।

व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. दिवसस्य ईश्वरः दिवसेश्वरः (षष्ठी तत्पुरुष) तस्य दिवसेश्वरस्य


१. संतापिते
२. गच्छन्
३. द्रुतगतिः
४. दैवहतकस्तत्रैव

नीतिशतकम् १३१

२. सम् + √तप् + णिच् + क्त (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) सन्तापितः ३. न अस्ति आतपं यस्मिन्, तम्, अनातपम् ४. √वाञ्छ् + शतृ = वाञ्छन् (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) ५. √पत् + शतृ (नपुं. तृतीया विभक्ति, एकवचन) पतता ६. शब्देन सहितम्, सशब्दम् (अव्ययीभाव) ७. आ + √पद् + क्विप् (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) आपदः ८. √इण् (गतौ) + झि (लट् लकार, प्रथम पुरुष, बहुवचन) यान्ति ९. √भञ्ज् + क्त = भग्नम् १०. भाग्येन रहितः, भाग्यरहितः (तृतीया तत्पुरुष) ११. खल्वाटः + दिवस + ईश्वरस्य (हशि च, आद् गुणः) १२. तत्र + अपि + अस्य (अकः सवर्णे दीर्घः, इकोयणचि) १३. तत्र + एव (वृद्धिरेचि— अ + ए = ऐ) १४. यान्ति + आपदः (इकोयणचि)

सृजति तावदशेषगुणाकरं,
पुरुषरत्नमलङ्करणं भुवः।
तदपि तत्क्षणभङ्गि करोति चेद्,
अहह! कष्टमपण्डितता विधेः॥१००॥

अन्वय- चेत् अशेषगुणाकरम् भुवः अलङ्करणम् पुरुषरत्नम् (विधिः) सृजति तावत्, तदपि तत्क्षणभङ्गिकरोति, अहह, विधेः अपण्डितता कष्टम् (अस्ति)

अनुवाद- यद्यपि सभी गुणों की खान, पृथ्वी के आभूषण (स्वरूप) पुरुष रूपी रत्न को (विधाता) रचता तो है, (किन्तु) उसे भी तो क्षणभंगुर कर देता है, अहो, विधाता की मूर्खता (अत्यन्त) कष्टकर (है)।

व्याख्या- कवि को इस बात का अत्यन्त कष्ट है कि ब्रह्मा अनेक गुणों का निधान, पृथ्वी के आभूषण रूप पुरुष का पहले तो प्रयत्नपूर्वक निर्माण करता है, किन्तु निर्माण करने के बाद स्वयं ही उसे विनाशवान् भी बना देता है।

सामान्यतः होता यह है कि कोई भी व्यक्ति अपनी निर्मिति को तोड़ता नहीं है, क्योंकि उसका परिश्रम, उसकी भावना उस निर्मिति में निहित रहती है, किन्तु कवि की दृष्टि में यह ब्रह्मा की मूर्खता ही कही जायेगी कि वह स्वयं ही मानव रूप कृति का निर्माण अत्यन्त परिश्रम के साथ करता है और यह मानव भी कोई साधारण वस्तु नहीं है, अपितु इस सम्पूर्ण पृथ्वी का आभूषण स्वरूप, अनेक गुणों की खान, मानो रत्न स्वरूप ही है। फिर इतने उत्तम निर्माण को स्वयं ही वह विनाशवान् बना देता है; अतः