भारतकोश
नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

Niti Shataka of Bhartrihari Hindi

महाराज भर्तृहरि द्वारा

स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished194 पृष्ठ

पृष्ठ 149, कुल 194 में से

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पृष्ठ 149

नीतिशतकम् १२७

३. प्र + √हृ + ल्युट् (नपुं., प्रथमा विभक्ति, एकवचन) प्रहरणम्
४. √वृ + णिच् + ल्युट् (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) वारणः
५. ऐश्वर्यञ्च बलञ्च तेन अन्वितः ऐश्वर्यबलान्वितः (द्वन्द्व समास)
६. बलं भिन्ति इति बलभिद्
७. बल + √भिद् + क्विप् (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) बलभित्
८. √भञ्ज् + क्त (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) भग्नः
९. इरा + मतुप् + अण् = ऐरावत
१०. दैवम् एव शरणम् देवस्यशरणम् वा (षष्ठी तत्पुरुष)
११. √श्रृ + ल्युट् = शरणम्
१२. अनु + √ग्रह् + अप् = अनुग्रहः
१३. इति + ऐश्वर्यबलान्वितः + अपि (इकोयणचि, अतोरोरप्लुतादप्लुते, एड्ः पदान्तादति)
१४. तत् + व्यक्तम् (झलांजशोऽन्ते) (त्— द्)

भग्नाशस्य करण्डपीडित¹ तनोर्म्लानेन्द्रियस्य क्षुधा,
कृत्वाखुर्विवरं स्वयं निपतितो नक्तं मुखे भोगिनः।
तृप्तस्तत्पिशितेन सत्वरमसौ तेनैव यातः पथा,
लोकाः पश्यत² दैवमेव हि नृणां³ वृद्धौ क्षये कारणम्॥९७॥

अन्वय- करण्डपीडिततनोः, क्षुधा म्लानेन्द्रियस्य, भग्नाशस्य भोगिनः मुखे नक्तम् आखुः विवरम् कृत्वा स्वयम् निपतितः। तत् पिशितेन तृप्तः असौ (सर्पः) सत्वरम् तेन एव पथा यातः। लोकाः पश्यत, नृणाम् वृद्धौ, क्षये हि दैवम् एव कारणम् (अस्ति)।

अनुवाद- पिटारी में दबे हुए शरीर वाले, भूख से शिथिल इन्द्रियों वाले, नष्ट हुई (जीवन की) आशा वाले साँप के मुँह में, रात्रि में (एक) चूहा छेद करके स्वयं गिर पड़ा। उस मांस से संतुष्ट हुआ वह (साँप) शीघ्र ही उसी मार्ग से (बाहर) चला गया, लोगों देखो, मनुष्यों की समृद्धि और हानि में भाग्य ही (एकमात्र) कारण (है)।

व्याख्या- इस संसार में किसी भी प्राणी की लाभ-हानि, जीवन-मरण, सुख-दुःख सभी भाग्य से नियन्त्रित हैं, इसी बात को एक सर्प के उदाहरण द्वारा प्रतिपादित करते हुए कवि कहता है कि—
एक साँप को सपेरे ने पिटारी में बन्द कर दिया वहाँ भूख और प्यास के कारण


१. पिण्डित (कुण्डली बनाकर)
२. स्वस्थस्तिष्ठति
३. परंवृद्धौ