भारतकोश
नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

Niti Shataka of Bhartrihari Hindi

महाराज भर्तृहरि द्वारा

स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished194 पृष्ठ

पृष्ठ 148, कुल 194 में से

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पृष्ठ 148
१२६श्रीभर्तृहरिविरचितम्

अनुवाद- बृहस्पति जिसका नेता (था), वज्र शस्त्र (था), देवता सैनिक (थे), स्वर्ग दुर्ग (था), विष्णु की कृपा भी (थी), ऐरावत (हाथी) वाहन था, इस प्रकार ऐश्वर्य और बल से युक्त (होता हुआ) भी इन्द्र युद्ध में शत्रुओं द्वारा हरा दिया गया। तो स्पष्ट है कि भाग्य की शरण ही उचित है, व्यर्थ के पुरुषार्थ को धिक्कार है।

व्याख्या- इस संसार में भाग्य ही प्रबल है, पुरुषार्थ, परिश्रम आदि सब व्यर्थ हैं, इसकी पुष्टि के लिए इन्द्र का उदाहरण देते हुए कवि कहता है कि बृहस्पति जैसा नीतिनिपुण एवं विद्वान् देवता जिसका मार्गदर्शक रहा, वज्र के समान अत्यन्त प्रभावशाली हथियार जिसका शस्त्र था, अत्यन्त सामर्थ्यवान् देवता जिसके सैनिक के रूप में थे, स्वर्ग जैसा सुरक्षित एवं दुर्गम स्थान जिसका दुर्ग था, सम्पूर्ण संसार का पालन करने वाले परमपिता परमेश्वर की जिस पर कृपा थी, ऐरावत जैसा शक्तिशाली हाथी जिसका वाहन था, ऐसे बल नामक राक्षस का विनाश करने वाले इन्द्र को, इतने सहयोग और सामर्थ्य के उपरान्त भी उसके शत्रु राक्षसों ने युद्ध भूमि में हरा दिया।

तो इस सब घटनाक्रम को देखकर निश्चयपूर्वक यही कहा जा सकता है कि पुरुषार्थ पूर्णतया व्यर्थ एवं निरर्थक है, उसे बार-बार धिक्कार है। वस्तुतः एकमात्र भाग्य ही प्रबल होता है। अतः व्यक्ति को पुरुषार्थ करके अपने मन, मस्तिष्क एवं शरीर को व्यर्थ ही कष्ट नहीं देना चाहिए।

विशेष- १. भाग्य की प्रमुखता सोदाहरण अत्यन्त सुन्दर शैली में सप्रमाण प्रस्तुत की है।
२. बलभित् का प्रयोग स्वयं इन्द्र को भी शक्तिशाली बताने के लिए किया गया है।
३. युद्ध विजय के लिए जितने भी साधनों की आवश्यकता होती है, वे सब इन्द्र के पास होते हुए भी उसकी पराजय में एकमात्र भाग्य की प्रबलता ही कारण थी।
४. जब देवताओं के राजा की भी भाग्य के समक्ष एक भी नहीं चली, तब मनुष्य की तो बात ही क्या है।
५. प्रस्तुत श्लोक में प्रयुक्त सभी विशेषण अभिप्राययुक्त प्रयुक्त हुए हैं' अतः परिकर अलंकार का प्रयोग हुआ है-

विशेषणैर्यत् साकूतैरुक्तिः परिकरस्तु सः

६. शार्दूलविक्रीडित छन्द प्रयुक्त हुआ है, लक्षण इस प्रकार है-

सूर्याश्वैर्मसजास्ततः सगुरवः शार्दूलविक्रीडितम्।

७. ‘धिक्’ के योग में ‘पौरुषम्’ में द्वितीया विभक्ति का प्रयोग हुआ है।

व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. √नी + तृच् = नेतृ (प्रथमा विभक्ति, एकवचन) नेता
२. बृहतां पतिः, बृहस्पतिः (षष्ठी तत्पुरुष)