नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)
Niti Shataka of Bhartrihari Hindi
महाराज भर्तृहरि द्वारा
स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)
पृष्ठ 146, कुल 194 में से
संदर्भ में पढ़ें१२४ श्रीभर्तृहरिविरचितम्
५. वाचाम् संयमः, वाक् संयमः (षष्ठी तत्पुरुष) सम् + √यम् + अप् = संयमः ६. शूरस्यभावः, शौर्यः, तस्य, शूर + ष्यञ् (नपुं., षष्ठी विभक्ति, एकवचन) ७. उप + √शम् + घञ् (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) उपशमः ८. वि + √नी + अच् (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) विनयः ९. √श्रु + क्त = श्रुतः, तस्य श्रुतस्य १०. प्र + √भू + तृच् = प्रभवितृ - तस्य, प्रभवितुः (पुल्लिंग, षष्ठी विभक्ति, एकवचन) ११. निर् + व्याज + तल् + टाप् = निर्व्याजता १२. सर्वेषाम् कारणम्, सर्वकारणम् (षष्ठी तत्पुरुष) १३. ज्ञानस्य + उपशमः (गुण् - आद् गुणः) (अ + उ = ओ) १४. विनयः + वित्तस्य (विसर्ग - हशि च) (:— उ— ओ)
रे रे चातक! सावधानमनसा मित्र! क्षणं श्रूयतां, अम्भोदा बहवो हि सन्ति गगने सर्वेऽपि नैतादृशाः। केचिद् वृष्टिभिरार्द्रयन्ति वसुधां गर्जन्ति केचिद् वृथा, यं यं पश्यसि तस्य तस्य पुरतो मा ब्रूहि दीनं वचः॥९५॥
अन्वय- रे रे मित्र चातक! सावधान मनसा क्षणम् श्रूयताम्। गगने बहवः अम्भोदाः सन्ति, हि सर्वे अपि एतादृशाः न। केचित् वृष्टिभिः वसुधाम् आर्द्रयन्ति, केचित् वृथा गर्जन्ति (इत्यर्थम् त्वम्) यम् यम् पश्यसि, तस्य तस्य पुरतः दीनम् वचः मा ब्रूहि।
अनुवाद- हे मित्र चातक! सावधान मन से क्षण भर के लिए सुनो। आकाश में बहुत से बादल हैं, किन्तु सभी एक जैसे नहीं (हैं)। कुछ वर्षा के द्वारा पृथिवी को गीला करते हैं, (परन्तु) कुछ व्यर्थ (ही) गरजते हैं। (इसलिए तुम) जिस-जिसको देखते हो, उस-उस के सामने दीन वचन मत कहो।
व्याख्या- चातक को सम्बोधित करके कवि कहता है कि हे चातक, तुम मेरी बात जरा ध्यान लगाकर क्षणभर के लिए सुनो, आकाश में तुम्हें अनेक बादल दिखाई दे रहे हैं, किन्तु वे सभी एक जैसे नहीं हैं। उनमें कुछ तो जल-वर्षा करके पृथिवी की प्यास बुझाते हैं, किन्तु कुछ तो व्यर्थ ही गर्जन करते हैं अर्थात् बरसते नहीं हैं।
इसलिए तुम जिसे भी देखते हो अपनी दीनवाणी को उस-उसके सामने मत कहो। प्रत्येक के सामने अपनी दीनता प्रकट करना उचित नहीं है।
यहाँ चातक, याचक का प्रतीक है तथा बादल धनवानों का। सभी धनवान् दानदाता नहीं होते, उदार हृदय नहीं होते। अतः याचकों को प्रत्येक के सामने स्वयं की दीनता प्रकट नहीं करनी चाहिए। जो धनवान् वस्तुतः दान देने वाले, दयालु हृदय हैं, उन्हीं के सामने याचना करना उचित है।