भारतकोश
नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

Niti Shataka of Bhartrihari Hindi

महाराज भर्तृहरि द्वारा

स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished194 पृष्ठ

पृष्ठ 153, कुल 194 में से

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पृष्ठ 153

नीतिशतकम् १३१

२. सम् + √तप् + णिच् + क्त (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) सन्तापितः ३. न अस्ति आतपं यस्मिन्, तम्, अनातपम् ४. √वाञ्छ् + शतृ = वाञ्छन् (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) ५. √पत् + शतृ (नपुं. तृतीया विभक्ति, एकवचन) पतता ६. शब्देन सहितम्, सशब्दम् (अव्ययीभाव) ७. आ + √पद् + क्विप् (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) आपदः ८. √इण् (गतौ) + झि (लट् लकार, प्रथम पुरुष, बहुवचन) यान्ति ९. √भञ्ज् + क्त = भग्नम् १०. भाग्येन रहितः, भाग्यरहितः (तृतीया तत्पुरुष) ११. खल्वाटः + दिवस + ईश्वरस्य (हशि च, आद् गुणः) १२. तत्र + अपि + अस्य (अकः सवर्णे दीर्घः, इकोयणचि) १३. तत्र + एव (वृद्धिरेचि— अ + ए = ऐ) १४. यान्ति + आपदः (इकोयणचि)

सृजति तावदशेषगुणाकरं,
पुरुषरत्नमलङ्करणं भुवः।
तदपि तत्क्षणभङ्गि करोति चेद्,
अहह! कष्टमपण्डितता विधेः॥१००॥

अन्वय- चेत् अशेषगुणाकरम् भुवः अलङ्करणम् पुरुषरत्नम् (विधिः) सृजति तावत्, तदपि तत्क्षणभङ्गिकरोति, अहह, विधेः अपण्डितता कष्टम् (अस्ति)

अनुवाद- यद्यपि सभी गुणों की खान, पृथ्वी के आभूषण (स्वरूप) पुरुष रूपी रत्न को (विधाता) रचता तो है, (किन्तु) उसे भी तो क्षणभंगुर कर देता है, अहो, विधाता की मूर्खता (अत्यन्त) कष्टकर (है)।

व्याख्या- कवि को इस बात का अत्यन्त कष्ट है कि ब्रह्मा अनेक गुणों का निधान, पृथ्वी के आभूषण रूप पुरुष का पहले तो प्रयत्नपूर्वक निर्माण करता है, किन्तु निर्माण करने के बाद स्वयं ही उसे विनाशवान् भी बना देता है।

सामान्यतः होता यह है कि कोई भी व्यक्ति अपनी निर्मिति को तोड़ता नहीं है, क्योंकि उसका परिश्रम, उसकी भावना उस निर्मिति में निहित रहती है, किन्तु कवि की दृष्टि में यह ब्रह्मा की मूर्खता ही कही जायेगी कि वह स्वयं ही मानव रूप कृति का निर्माण अत्यन्त परिश्रम के साथ करता है और यह मानव भी कोई साधारण वस्तु नहीं है, अपितु इस सम्पूर्ण पृथ्वी का आभूषण स्वरूप, अनेक गुणों की खान, मानो रत्न स्वरूप ही है। फिर इतने उत्तम निर्माण को स्वयं ही वह विनाशवान् बना देता है; अतः