नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)
Niti Shataka of Bhartrihari Hindi
महाराज भर्तृहरि द्वारा
स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१३२ श्रीभर्तृहरिविरचितम्
उसकी इस प्रकार की प्रवृत्ति की किस प्रकार प्रशंसा की जा सकती है, इसे तो उसकी मूर्खता ही कहेंगे।
विशेष- १. "अहह" पद का प्रयोग यहाँ अत्यन्त दुःख की अभिव्यक्ति के लिए हुआ है। २. विधाता के अविवेकपूर्ण कार्य की आलोचना अत्यन्त कटु शब्दों में की गयी है। ३. 'पुरुषरत्नम्' में रूपक अलंकार का प्रयोग हुआ है, पुरुष रूपी उपमेय में रत्न रूपी उपमान के अभेद का आरोप किया गया है। लक्षण— तद् रूपकमभेदो य उपमानोपमेययोः। ४. द्रुतविलम्बित छन्द प्रयुक्त हुआ है, लक्षण— "द्रुतविलम्बितमाह नभौ भरौ।"
व्याकरणात्मक टिप्पणी— १. न शेषः इति अशेषः (नञ् समास) १. √सृज् + तिप् (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) सृजति २. अशेषगुणानाम् आकरःतम् (षष्ठी तत्पुरुष) अशेषगुणानामाकरम् ३. पुरुषः रत्नम् इव (कर्मधारय) पुरुषरत्नम् ४. क्षणे भङ्गि (सप्तमी तत्पुरुष) क्षणभङ्गि ५. न पण्डितता इति (नञ् समास) अपण्डितता ६. पण्डा + इतच् = पण्डित + तल् + टाप् = पण्डितता ७. अलम् + √कृ + ल्युट् = अलंकरणम् ८. पुरुषेषु रत्नम् इति (सप्तमी तत्पुरुष) पुरुषरत्नम् ९. तत् + अपि (झलां जशोऽन्ते) तदपि। चेत् + अहह (झलां जशोऽन्ते) चेदहह
येनैवाम्बरखण्डेन संवीतो निशि चन्द्रमाः।
तेनैव च दिवा भानुरहो दौर्गत्यमेतयोः ॥१०१॥
अन्वय- येन अम्बरखण्डेन एव चन्द्रमाः निशि संवीतः, तेन एव च (अम्बरखण्डेन) भानुः दिवा (संवीतः), अहो! एतयोः दौर्गत्यम्।
अनुवाद- जिस वस्त्र के टुकड़े के द्वारा ही चन्द्रमा रात्रि में ढक दिया जाता है और उतने (वस्त्र के टुकड़े) से ही सूर्य दिन में (आवृत कर दिया जाता है) इन दोनों की दुर्गति आश्चर्यजनक है।
व्याख्या- सम्पूर्ण संसार को प्रकाशित करने वाले तेजस्वी देवता सूर्य और चन्द्रमा भी क्रमशः दिन और रात में मात्र एक वस्त्र के टुकड़े के द्वारा ढक दिये जाते हैं। यह इन दोनों तेजस्वी एवं विशाल आकार वाले देवताओं की दुर्गति ही है, क्योंकि विशाल