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नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

Niti Shataka of Bhartrihari Hindi

महाराज भर्तृहरि द्वारा

स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished194 पृष्ठ

पृष्ठ 155, कुल 194 में से

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पृष्ठ 155

नीतिशतकम् १३३

सामर्थ्य सम्पन्न होते हुए भी छोटे से वस्त्र के टुकड़े से ढका जाना अत्यन्त संकुचित दशा को प्राप्त होना है, जो स्वयं में आश्चर्यजनक एवं हीनता का द्योतक है।

विशेष- १. यहाँ अम्बर का अर्थ आकाश भी किया जा सकता है। तब अर्थ होगा 'छोटे से आकाश के टुकड़े से'।

२. वस्तुतः यहाँ अम्बोदखण्ड पाठ अधिक उपयुक्त प्रतीत होता है, क्योंकि सूर्य और चन्द्रमा दोनों ही को बादल का छोटा सा टुकड़ा आच्छादित कर लेता है, यह दोनों तेजस्वी ग्रहों के लिए तिरस्कार का विषय है।

३. विधाता की सामर्थ्य सर्वोपरि है जिससे सामर्थ्यवान् व्यक्ति भी बचने में समर्थ नहीं है।

४. अनुष्टुप् छन्द का प्रयोग हुआ है। लक्षण पूर्ववत् है।

व्याकरणात्मक टिप्पणी- १. सम् + वि + √इण् (गतौ) + क्त = संवीतः २. अम्बरस्य खण्डेन, अम्बरखण्डेन (षष्ठी तत्पुरुष) ३. दुर् + गम् + क्त = दुर्गत + ष्यङ् = दौर्गत्यम् ४. येन + एव + अम्बरखण्डेन (वृद्धिरेचि, अकः सवर्णे दीर्घः) ६. तेन + एव = तेनैव (वृद्धिरेचि)

अयममृतनिधानं नायकोऽप्योषधीनां,
शतभिषगनुयातः शम्भुमूर्द्धोऽवतंसः।
विरहयति न चैनं राजयक्ष्मा शशांकं,
हतविधिपरिपाकः केन वा लंघनीयः॥१०२॥

अन्वय- अयम् अमृतनिधानम्, ओषधीनाम् नायकः, शतभिषक् अनुयातः, शम्भुमूर्ध्नो अवतंसः अपि (भवति), (तथापि) एनम् च शशाङ्कम् राजयक्ष्मा न विहरयति वा हतविधिपरिपाकः केन लग्नीयः।

अनुवाद- यह अमृत का भण्डार, औषधियों का नायक, सैकड़ों चिकित्सकों द्वारा अनुगमन किया गया, महादेव के सिर का आभूषण भी (बनता है), (फिर भी) इस चन्द्रमा को राजयक्ष्मा (रोग) नहीं छोड़ता है अथवा दुर्भाग्य का परिणाम किसके द्वारा उल्लंघन करने योग्य है।

व्याख्या- जब व्यक्ति का दुर्भाग्य उसका अनुकरण करता है, तब वह कितने भी अधिक साधनों से युक्त क्यों न हो, उसको कष्ट उठाना ही पड़ता है। अब चन्द्रमा का ही उदाहरण क्यों न ले लें। कहते हैं यह अमृत का भण्डार है, औषधियों को गुण प्रदान करने के कारण उन सबमें अग्रणी है तथा अनेकों चिकित्सक इसके महत्त्व को स्वीकार