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नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

Niti Shataka of Bhartrihari Hindi

महाराज भर्तृहरि द्वारा

स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished194 पृष्ठ

पृष्ठ 156, कुल 194 में से

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१३४ श्रीभर्तृहरिविरचितम्

करते हैं अथवा आकाश मण्डल में शतभिषा (तारामंडल) से घिरा हुआ है। इतना ही नहीं देवों के देव, महादेव के सिर का आभूषण है।

फिर भी दुर्भाग्यवश इसे जो राजयक्ष्मा रोग लगा हुआ है, जिसके कारण इसका प्रतिदिन क्षरण होता है, वह दूर नहीं हो रहा है। इसलिए इस सब को देखकर तो यही कहा जाना उचित प्रतीत होता है कि व्यक्ति के हिस्से का जो दुर्भाग्य है वह तो किसी भी परिस्थिति में व्यक्ति को भोगना ही होगा, उससे बचना उसके लिए पूर्णतया असम्भव है।

विशेष- १. दुर्भाग्य के परिणाम से कोई भी व्यक्ति बचने में समर्थ नहीं होता भले ही वह साधन सम्पन्न ही क्यों न हो। २. शतभिषक पद में श्लेष अलंकार है, क्योंकि इसके दो अर्थ हैं- सैकड़ों चिकित्सक और शतभिषा नामक तारामण्डल। ३. कवि की कल्पना है कि चन्द्रमा के प्रतिदिन क्षरण का कारण उसका राजयक्ष्मा नामक रोग है, जिससे वह दुर्भाग्य के परिणाम के कारण ग्रसित है। ४. मालिनी छन्द का प्रयोग हुआ है। लक्षण इस प्रकार है- ननमयययुतेयं मालिनी भोगिलोकैः। ५. राजयक्ष्मा एक रोग जिसमें अंग गलने लगते हैं। इसे गलित कोढ़ भी कहते हैं।

व्याकरणात्मक टिप्पणी-

१. √नी + ण्वुल् = नायकः २. अमृत + नि + √धा + ल्युट् = अमृतनिधानम् ३. न मृतः इति, अमृतः (नञ् समास) √मृ + क्त = मृतः ४. अनु + √इण् (गतौ) + क्त = अनुयातः ५. शशः अङ्के यस्य सः (बहुव्रीहि) शशाङ्कः, तम् शशाङ्कम् ६. वि + √रह् + णिच् + तिप् (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) विरहयति ७. √लङ्घ् + अनीयर् = लङ्घनीयः (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) ८. अव + √तंस् + घञ् = अवतंसः (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) ९. अमृतस्य निधानम् (षष्ठी तत्पुरुष) अमृतनिधानम्

प्रियसखे विपद्दण्डाघातप्रपातपरम्परा, परिचयबले१ चिन्ताचक्रे निधाय विधिः खलः। मृदमिव बलात् पिण्डीकृत्य प्रगल्भकुलालवद्, भ्रमयति मनो नो जानीमः किमत्र विधास्यति॥१०३॥


१. परिचयचले