नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)
Niti Shataka of Bhartrihari Hindi
महाराज भर्तृहरि द्वारा
स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंनीतिशतकम् १३५
अन्वय- प्रिय सखे! खलः विधिः प्रगल्भकुलालवत् (मम) मनः मृदम् इव बलात् पिण्डीकृत्य विपद्दण्डाघातप्रपातपरम्परापरिचय बले चिन्ता चक्रे निधाय भ्रमयति, अत्र किम् विधास्यति इति नो जानीमः।
अनुवाद- प्रिय मित्र! दुष्ट विधाता निपुण कुम्हार के समान हमारे मन को मिट्टी के समान, बलपूर्वक पिण्ड बनाकर विपत्ति रूपी डण्डे के प्रहारों से, अत्यन्त गिराने की परम्परा के परिचय रूपी बल वाले चिन्ता रूपी चक्र पर रखकर घूमा रहा है, यहाँ (वह) क्या बनायेगा, यह (हम) नहीं जानते हैं।
व्याख्या- हे मित्र! यह दुष्ट विधाता मेरे मन के साथ ठीक वैसा ही निर्दयतापूर्वक आचरण कर रहा है जैसा एक घड़ा बनाने में निपुण कुम्हार मिट्टी के साथ करता है, क्योंकि कुम्हार पहले मिट्टी को कठोरता के साथ उसका पिण्ड बना लेता है। उसके बाद वह उसे डण्डों के प्रहारों से अत्यन्त निर्दयतापूर्वक कूटता है और पुनः उस मिट्टी के लोंधे को बार-बार ऊपर उठा कर जमीन पर पटकता है। इस प्रकार उसे अनेकशः प्रपीडित करने के बाद ही चक्र पर चढ़ा कर घड़े आदि का निर्माण करता है।
इसी प्रकार यह विधाता भी मेरे मिट्टी के समान मन को बलपूर्वक दबाते हुए पिण्ड के रूप में बनाकर, विपत्ति रूपी डण्डों के प्रहारों से तथा अनेक असफलताओं रूपी गिराने की परम्परा के बल से, चिन्ता रूपी चक्र पर रखकर निरन्तर घूमा रहा है। यह मैं नहीं जान पा रहा हूँ कि विधाता इस सब प्रक्रिया को पूर्ण करने के पश्चात् मेरे मन रूपी मिट्टी के द्वारा क्या बनाएगा। अर्थात् विधाता की मनः स्थिति को मैं नहीं समझ पा रहा हूँ।
विशेष- १. विधाता की प्रत्येक क्रिया का फल परिणाम के द्वारा ही जाना जा सकता है, पहले नहीं।
२. विधाता की तुलना निपुण कुम्हार के साथ की गई है।
३. विधाता के लिए खल शब्द का प्रयोग उसे गाली देने के समान है।
४. यहाँ द्वितीय चरण के प्रारम्भ में परिचय बल के स्थान पर 'परिचय चले' भी पाठ उपलब्ध होता है। जो अधिक उपयुक्त प्रतीत होता है।
५. जब मनुष्य पर विपरीत विधाता का कठोरतापूर्वक शक्तिपरीक्षण होता है, तो उसके मन की दशा कुम्हार की मिट्टी से भी बदतर होती है।
६. कठिन एवं विपरीत परिस्थिति में पड़े व्यक्ति की मनःस्थिति का अत्यन्त सुन्दर चित्रण किया गया है।
७. हरिणी छन्द का प्रयोग हुआ है। लक्षण इस प्रकार है—
रसयुगहयैन्स्रौम्रौ स्लौ गो यदा हरिणी तदा।
८. रूपक अलंकार का प्रयोग हुआ है— ‘तद्रूपकमभेदो य उपमानोपमेययोः।’