नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)
Niti Shataka of Bhartrihari Hindi
महाराज भर्तृहरि द्वारा
स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)
पृष्ठ 158, कुल 194 में से
संदर्भ में पढ़ें| १३६ | श्रीभर्तृहरिविरचितम् |
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व्याकरणात्मक टिप्पणी—
१. पिण्ड + च्वि + √कृ + ल्यप् = पिण्डीकृत्य
२. प्रगल्भः कुलालः, प्रगल्भकुलालः (कर्मधारय) तेन तुल्यः
३. √भ्रम् + णिच् + तिप् (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) भ्रमयति
४. वि + √धा + तिप् (लुट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) विधास्यति
५. नि + √धा + ल्यप् = निधाय
६. चिन्ता एव चक्रम्, चिन्ता चक्रम् (कर्मधारय) तस्मिन् चिन्ताचके
७. प्र + √गल्भ् + अच् = प्रगल्भः
८. वि + √धा + कि = विधिः (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन)
९. मनः + नो = मनो नो (हशि च से :- उ— ओ)
१०. नो यहाँ अव्यय पद निषेध अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। यह न + उ दो अव्यय पदों से मिलकर बनता है। न + उ = नो (आद् गुणः सूत्र से गुण)
विरम विरमायासादस्माद् दुरध्यवसायतो,
विपदि महतां धैर्यध्वंसं यदिेक्षितुमीहसे।
अयि जड़विधे! कल्पापायेऽप्यपेतनिजक्रमाः,
कुलशिखरिणः क्षुद्रा नैते न वा जलराशयः॥१०४॥
अन्वय- अयि जड़विधे! यत् (त्वम्) विपदि महताम् धैर्यध्वंसम् ईक्षितुम् ईहसे, अस्मात् दुरध्यवसायतः आयासात्, विरम विरम। एते कल्पापाये अपि अपेतनिजक्रमाः क्षुद्राः कुलशिखरिणः न, न वा जलराशयः (सन्ति)।
अनुवाद- हे जड़बुद्धि विधाता ! जो (तुम) विपत्ति में महान् पुरुषों के धैर्य के विनाश को देखना चाहते हो, इस दुराग्रह रूप परिश्रम से रुक जाओ, रुक जाओ। ये (महापुरुष) कल्प के अन्त होने पर भी, नष्ट कर दिया है, अपनी मर्यादा को जिन्होंने ऐसे कुल पर्वत नहीं (हैं) और न ही क्षुद्र समुद्र (हैं)।
व्याख्या- विधाता अपनी अज्ञानतावश महापुरुषों के धैर्य की, कठोरतम आपत्तियों का आघात करता हुआ मानो परीक्षा लेता रहता है, जो किसी भी दृष्टि से उसका विवेकपूर्ण कार्य नहीं कहा जा सकता, क्योंकि वह सोचता है कि महान् पुरुषों का धैर्य विपत्तियों के सामने नष्ट हो जायेगा।
कवि विधाता को इस अविवेकपूर्ण कार्य से रोकते हुए कहता है कि ये महापुरुष कुल पर्वतों अथवा समुद्र के समान क्षुद्र प्रवृत्ति वाले नहीं हैं, क्योंकि उनका प्रलयकाल में धैर्य नष्ट हो जाता है, वे अपनी मर्यादाओं का परित्याग कर देते हैं, किन्तु इन महापुरुषों का धैर्य तो कल्प के अन्त में भी नष्ट नहीं होता है, अपितु पूर्ववत् बना रहता है।