नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)
Niti Shataka of Bhartrihari Hindi
महाराज भर्तृहरि द्वारा
स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंनीतिशतकम् १३७
अतः हे दुर्बुद्धि विधाता! तुम महापुरुषों के धैर्य को नष्ट करने रूप अपने निरर्थक प्रयास से बस करो, अपने दुराग्रह का तुम परित्याग कर दो, क्योंकि इस कार्य में तुम्हें लेशमात्र भी सफलता प्राप्त होने की सम्भावना नहीं है। यह अविवेकपूर्ण कार्य तुम्हारी बुद्धि की अपंगता का ही परिचायक है।
विशेष- १. प्रस्तुत श्लोक में विधाता के विवेकरहित कार्य के लिए उसे जड़बुद्धि कहा गया है।
२. महापुरुष विकट से विकट परिस्थिति में भी अपने धैर्य को नहीं खोते हैं।
३. उपमेय महापुरुषों को उपमान समुद्र और कुल पर्वतों से भी बढ़कर बताया गया है। अतः व्यतिरेक अलंकार, लक्षण—
उपमानाद् यदन्यस्य व्यतिरेकः स एव सः।
४. यहाँ भी हरिणी छन्द का प्रयोग हुआ है। लक्षण पूर्ववत् है।
५. प्रलयकाल में समुद्र अपनी मर्यादाओं को छोड़ देता है। कुल पर्वत भी टूट फूट कर अपने आकार और मर्यादा का त्याग कर देते हैं। अतः उनके लिए क्षुद्र पद का प्रयोग किया गया है।
६. नीतिशतकम् की कुछ प्रतियों में यह श्लोक उपलब्ध नहीं है।
७. ‘आर्य’ सम्बोधन वाचक अव्यय पद।
व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. वि + √रम् + सिप् (लोट् लकार, मध्यम पुरुष, एकवचन) विरम
२. दुष्टः अध्यवसायः यस्मिन् सः, तस्मात् = दुरध्यवसायातः
३. √ईक्ष् + तुमुन् = ईक्षितुम्
४. आ + √यस् + घञ् = आयासः, तस्मात् आयासात्
५. धैर्यस्य ध्वंसम् (षष्ठी तत्पुरुष) धैर्यध्वंसम्
६. कल्पस्य अपाये (षष्ठी तत्पुरुष) कल्पापाये
७. वा पद का प्रयोग ‘समुच्चय’ अर्थ में भी स्वीकार किया जा सकता है।
८. न + एते = नैते (वृद्धिरेचि) (अ + ए = ऐ)
दैवेन प्रभुणा स्वयं जगति यद्यस्य प्रमाणीकृतं,
तत्तस्योपनमेन्मनागपि महान्नैवाश्रयः कारणम्।
सर्वाशापरिपूरके जलधरे वर्षत्यपि प्रत्यहं,
सूक्ष्मा एव पतन्ति चातकमुखे द्वित्रा पयोबिन्दवः॥१०५॥
अन्वय- प्रभुणा दैवेन जगति स्वयम् यस्य यत् प्रमाणीकृतम्, तत् तस्य उपनमेत्, महान् आश्रयः मनाक् अपि कारणम् न एव (भवति)। सर्वाशापरिपूरके जलधरे प्रत्यहम् वर्षति अपि चातकमुखे सूक्ष्माः एव द्वित्राः पयोबिन्दवः पतन्ति।