नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)
Niti Shataka of Bhartrihari Hindi
महाराज भर्तृहरि द्वारा
स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)
नीतिशतकम् १३७
अतः हे दुर्बुद्धि विधाता! तुम महापुरुषों के धैर्य को नष्ट करने रूप अपने निरर्थक प्रयास से बस करो, अपने दुराग्रह का तुम परित्याग कर दो, क्योंकि इस कार्य में तुम्हें लेशमात्र भी सफलता प्राप्त होने की सम्भावना नहीं है। यह अविवेकपूर्ण कार्य तुम्हारी बुद्धि की अपंगता का ही परिचायक है।
विशेष- १. प्रस्तुत श्लोक में विधाता के विवेकरहित कार्य के लिए उसे जड़बुद्धि कहा गया है।
२. महापुरुष विकट से विकट परिस्थिति में भी अपने धैर्य को नहीं खोते हैं।
३. उपमेय महापुरुषों को उपमान समुद्र और कुल पर्वतों से भी बढ़कर बताया गया है। अतः व्यतिरेक अलंकार, लक्षण—
उपमानाद् यदन्यस्य व्यतिरेकः स एव सः।
४. यहाँ भी हरिणी छन्द का प्रयोग हुआ है। लक्षण पूर्ववत् है।
५. प्रलयकाल में समुद्र अपनी मर्यादाओं को छोड़ देता है। कुल पर्वत भी टूट फूट कर अपने आकार और मर्यादा का त्याग कर देते हैं। अतः उनके लिए क्षुद्र पद का प्रयोग किया गया है।
६. नीतिशतकम् की कुछ प्रतियों में यह श्लोक उपलब्ध नहीं है।
७. ‘आर्य’ सम्बोधन वाचक अव्यय पद।
व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. वि + √रम् + सिप् (लोट् लकार, मध्यम पुरुष, एकवचन) विरम
२. दुष्टः अध्यवसायः यस्मिन् सः, तस्मात् = दुरध्यवसायातः
३. √ईक्ष् + तुमुन् = ईक्षितुम्
४. आ + √यस् + घञ् = आयासः, तस्मात् आयासात्
५. धैर्यस्य ध्वंसम् (षष्ठी तत्पुरुष) धैर्यध्वंसम्
६. कल्पस्य अपाये (षष्ठी तत्पुरुष) कल्पापाये
७. वा पद का प्रयोग ‘समुच्चय’ अर्थ में भी स्वीकार किया जा सकता है।
८. न + एते = नैते (वृद्धिरेचि) (अ + ए = ऐ)
दैवेन प्रभुणा स्वयं जगति यद्यस्य प्रमाणीकृतं,
तत्तस्योपनमेन्मनागपि महान्नैवाश्रयः कारणम्।
सर्वाशापरिपूरके जलधरे वर्षत्यपि प्रत्यहं,
सूक्ष्मा एव पतन्ति चातकमुखे द्वित्रा पयोबिन्दवः॥१०५॥
अन्वय- प्रभुणा दैवेन जगति स्वयम् यस्य यत् प्रमाणीकृतम्, तत् तस्य उपनमेत्, महान् आश्रयः मनाक् अपि कारणम् न एव (भवति)। सर्वाशापरिपूरके जलधरे प्रत्यहम् वर्षति अपि चातकमुखे सूक्ष्माः एव द्वित्राः पयोबिन्दवः पतन्ति।
१३८ || श्रीभर्तृहरिविरचितम्
अनुवाद- सामर्थ्यशाली विधाता के द्वारा संसार में स्वयं जिसका जो निश्चित कर दिया, वह (स्वयं ही) उसके पास आ जायेगा। महान् आश्रय (इसमें) थोड़ा भी कारण नहीं (होता है)। सभी दिशाओं में भरपूर बरसने वाले मेघ के प्रतिदिन बरसने पर भी चातक के मुँह में मुश्किल से दो तीन जल की बूँदे (ही) गिरती हैं।
व्याख्या- पूर्णतया समर्थ भाग्य के द्वारा ही संसार के प्रत्येक प्राणी के हिस्से का स्वयं निर्धारण कर दिया जाता है। भाग्य की प्रबलता के कारण यह हिस्सा उसके पास स्वतः ही आ जाता है अर्थात् उसके लिए उसे चिन्तित होने की आवश्यकता नहीं है और इस विषय में ऐसा भी नहीं है कि प्रभावशाली व्यक्ति को यह अधिक प्राप्त हो जाएगा।
इस विषय में चातक और मेघ का उदाहरण द्रष्टव्य है। मेघ अपना जल सभी दिशाओं में पूरी सामर्थ्य के साथ रोजाना बरसाता है, किन्तु फिर भी चातक के मुँह में बड़ी मुश्किल से दो तीन बूँदें ही गिर पाती हैं। इसका प्रमुख कारण भाग्य ही है, जिसके कारण उसके हिस्से में बादल के रोजाना मूसलाधार बरसने पर भी दो तीन बूँदें ही निर्धारित होने के कारण, उससे अधिक प्राप्त नहीं हो पाती हैं।
विशेष- १. भाग्य की प्रबलता एवं सामर्थ्य का अत्यन्त सुन्दरतापूर्वक निदर्शन सहित प्रतिपादन किया गया है। २. इसी प्रकार के भावों की अभिव्यक्ति 'यद् धात्रा निजभालपट्ट्¹......इत्यादि श्लोक में भी की गई है। ३. शार्दूलविक्रीडित छन्द का प्रयोग हुआ है। लक्षण इस प्रकार है—
सूर्याश्वैर्मसजास्ततः सगुरबः शार्दूलविक्रीडितम्।
४. सर्वाशा का अर्थ विद्वानों ने 'सभी लोगों की आशाओं को पूरा करने वाले', भी किया है।
व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. प्रमाण + च्वि + √कृ + क्त = प्रमाणीकृतम्
२. उप + √नम् + तिप् (विधिलिंग लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) उपनमेत्
३. परि + √पूर् + ण्वुल् = परिपूरके (सप्तमी विभक्ति, एकवचन)
४. जल + √धृ + अच् = जलधरः, तस्मिन् जलधरे (सप्तमी विभक्ति, एकवचन)
५. अहनि अहनि इति प्रत्यहम् (अव्ययीभाव)
६. √पत् + झि (लट् लकार, प्रथम पुरुष, बहुवचन) पतन्ति
७. पयसां बिन्दुः पयोबिन्दुः (षष्ठी तत्पुरुष) ते पयोबिन्दवः
८. √वृष् + तिप् (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) वर्षति
९. वर्षति + अपि = वर्षत्यपि (इकोयणचि) (इ— य्)
१. द्रष्टव्य श्लोक संख्या- ४९
नीतिशतकम् १३९
पातितोऽपि कराघातैरुत्पतत्येव कन्दुकः।
प्रायेण साधुवृत्तानामस्थायिन्यो विपत्तयः॥१०६॥
अन्वय- कन्दुकः कराघातैः पातितः अपि उत्पतति एव। साधुवृत्तानाम् विपत्तयः प्रायेण अस्थायिन्यः (भवन्ति)।
अनुवाद- गेंद हाथ के प्रहारों से गिराई गई भी ऊपर उठती ही है। अच्छे चरित्र वाले लोगों की आपत्तियाँ (भी) प्रायः अस्थायी (होती हैं)।
व्याख्या- जिस प्रकार गेंद पर हाथ से चोट करने पर पहले तो वह नीचे चली जाती है, किन्तु अगले ही क्षण वह उछलकर ऊपर उठ जाती है, ठीक उसी प्रकार श्रेष्ठ चरित्र वाले लोगों की आपत्तियाँ भी स्थायी नहीं होती अर्थात् सच्चरित्र वाले पर आपत्तियाँ दैववश आती तो हैं, किन्तु वे स्थायी नहीं होती हैं, सदा नहीं रहती, कुछ दिन बाद स्वतः ही नष्ट हो जाती हैं।
विशेष-
१. सज्जनों की आपत्तियों को अस्थायी बताया है।
२. सज्जनों पर विपत्ति की तुलना, गेंद पर हाथ के प्रहार से नीचे जाने से की गई है।
३. प्रथम चरण तथा द्वितीय चरण का अर्थ व्यवस्थित करने के लिए उपमा की परिकल्पना करने के कारण निदर्शना अलंकार लक्षण— ‘अभवन् वस्तुसम्बन्धः उपमा परिकल्पकः। निदर्शना।।'
४. अनुष्टुप् छन्द का प्रयोग हुआ है, लक्षण इस प्रकार है—
श्लोके षष्ठं गुरु ज्ञेयं, सर्वत्र लघु पञ्चमम्।
द्विचतुष्पादयो ह्रस्वं सप्तमं दीर्घमन्ययोः॥
५. प्रस्तुत श्लोक नीतिशतकम् की सभी प्रतियों में उपलब्ध नहीं होता।
व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. √पत् + णिच् + क्त (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) पातितः
२. आ + √हन् + घञ् = आघातः
३. साधूनि वृत्तानि येषां तेषाम्, साधुवृत्तानाम्
४. वि + √पद् + क्तिन् = विपत्ति (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) विपत्तयः
५. न स्थायिन्यः, अस्थायिन्यः (नञ् समास)
६. √स्था + णिनि = स्थायिन् + ङीप् = स्थायिनी (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) स्थायिन्यः
७. पतति + एव (यण् – इकोयणचि, इ— य्)
८. पातितः + अपि (अतो रोरप्लुतादप्लुते) (:— उ— ओ)
१४० | श्रीभर्तृहरिविरचितम्
शशिदिवाकरयोर्ग्रहपीडनं,
गजभुजङ्गमयोरपि बन्धनम्।
मतिमतां च विलोक्य दरिद्रतां,
विधिरहो बलवान् इति मे मतिः॥१०७॥
अन्वय- शशि-दिवाकरयोः ग्रहपीडनम्, गज-भुजङ्गमयोः बन्धनम् अपि, मतिमताम् च दरिद्रताम् विलोक्य, मे मतिः इति (अस्ति), अहो विधिः बलवान्।
अनुवाद- सूर्य और चन्द्रमा को ग्रहों (राहू, केतु) द्वारा पीडित किए जाने को, हाथी और सांप के बन्धन को भी (देखकर) और बुद्धिमानों की दरिद्रता को देखकर मेरी बुद्धि तो यही है कि अहो ! भाग्य (ही) बलवान् (है)।
व्याख्या- जब हम सूर्य और चन्द्रमा जैसे विशाल आकार वाले तेजस्वी ग्रहों को राहू और केतु जैसे ग्रहों के द्वारा पीड़ित किया जाता हुआ देखते हैं। इसके अलावा जब हम हाथी जैसे शक्तिशाली एवं भयंकर सर्प जैसे विषैले और खतरनाक जीवों का बांधा जाना भी देखते हैं।
इसी प्रकार जब हम इस संसार में देखते हैं कि अत्यन्त बुद्धिमान् व्यक्ति भी दरिद्रता में अत्यन्त दयनीय जीवन जीने के लिए बाध्य है, तो उस स्थिति में हमारी बुद्धि केवल एक ही निश्चय पर पहुँचती है कि भाग्य वस्तुतः बलवान् होता है। कोई कितना भी प्रभावशाली, भयंकर, समर्थ अथवा योग्य क्यों न हो, दुर्भाग्य के वशीभूत होकर उनको भी कष्ट और आपत्तियों का सामना करना पड़ता है।
विशेष-
१. कवि ने सूर्य, चन्द्रमा, हाथी और सांप तथा विद्वान् का उदाहरण देते हुए भाग्य की प्रबलता का प्रतिपादन अत्यन्त सुन्दर ढंग से किया है।
२. पुराणों के अनुसार सूर्य और चन्द्र का ग्रसन (ग्रहण) राहू और केतु नामक राक्षस ग्रहों के द्वारा किया जाता है, किन्तु वर्तमान वैज्ञानिक युग में यह बात निराधार सिद्ध हो गयी है।
३. अप्रत्यक्ष रूप से व्यक्ति के तेज, बल, पौरुष आदि सबकी निरर्थकता प्रतिपादित की गई है।
४. द्रुतविलम्बित छन्द का प्रयोग हुआ है, लक्षण इस प्रकार है—
द्रुतविलम्बितमाह नभौ भरौ।
५. समुच्चय तथा अर्थान्तरन्यास अलंकार का प्रयोग हुआ है।
व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. शशी च दिवाकरश्च शशिदिवाकरौ, तयोः शशिदिवाकरयोः (द्वन्द्व समास)
२. √पीड् + ल्युट् = पीडनम्। ग्रहाभ्याम् पीडनम् (तृतीया तत्पुरुष) ग्रहपीडनम्
३. गजश्च भुजङ्गश्च गजभुजङ्गौ, तयोः गजभुजङ्गमयोः (द्वन्द्व समास)
नीतिशतकम् १४१
४. √बन्ध् + ल्युट् = बन्धनम् ५. मति + मतुप् = मतिमत् (षष्ठी तत्पुरुष) मतिमताम् ६. दरिद्र + तल् = दरिद्रता, ताम् दरिद्रताम् ७. वि + √लोक् + ल्यप् = विलोक्य ८. √मन् + क्तिन् = मतिः ९. शशिदिवाकरयोः + ग्रहपीडनम् (विसर्जनीयस्य सः, ससजुषो रुः) १०. गजभुजङ्गमयोः + अपि (विसर्जनीयस्य सः, ससजुषो रुः) ११. विधिः + अहो (विसर्जनीयस्य सः, ससजुषो रुः)
पत्रं नैव यदा करीरविटपे दोषो वसन्तस्य किं, नोलूकोऽप्यवलोकते यदि दिवा सूर्यस्य किं दूषणम्। धारा नैव पतन्ति चातकमुखे मेघस्य किं दूषणं, यत्पूर्वं विधिना ललाटलिखितं तन्मार्जितुं कः क्षमः॥१०८॥
अन्वय- यदा करीरविटपे पत्रम् न एव (भवति), वसन्तस्य किम् दोषः ? उलूकः दिवा अपि यदि न अवलोकते, सूर्यस्य किम् दूषणम् ? (यदि) चातकमुखे धाराः न एव (पतन्ति), मेघस्य किम् दूषणम् ? विधिना यत् पूर्वम् ललाटलिखितम् तत् मार्जितुम् कः क्षमः ?
अनुवाद- यदि करील के वृक्ष पर पत्ता नहीं (होता है, तो) वसन्त का क्या दोष ? उल्लू दिन में भी यदि नहीं देखता (तो) सूर्य का क्या दोष ? (यदि) चातक के मुख में (जल की) धारा नहीं (गिरती है, तो) मेघ का क्या दोष ? विधाता के द्वारा जो पहले मस्तक पर लिख दिया (तो) उसे मिटाने में कौन समर्थ है ?
व्याख्या- भाग्य में लिखा हुआ कोई भी मिटाने में समर्थ नहीं है, इसी बात का प्रतिपादन कवि ने कुछ उदाहरण देकर किया है— सामान्य रूप में वसन्त ऋतु में सभी वनस्पतियों पर फूल और सुन्दर पत्ते आ जाते हैं, जिनसे उनकी शोभा में वृद्धि होती है, किन्तु इसके विपरीत करीर का वृक्ष इस सुन्दर ऋतु में भी पत्तों से रहित रहता है। इसमें वसन्त ऋतु का तो कोई दोष नहीं माना जायेगा। यह उसका दुर्भाग्य ही है, जिसे कोई भी मिटाने में समर्थ नहीं है।
इसी प्रकार सूर्य दिन भर संसार को आलोकित करता है, जिसमें सभी प्राणी इस सुन्दर संसार का अवलोकन करते हैं, किन्तु यदि उल्लू अपने भाग्य-दोष के कारण दिन में भी नहीं देख पाता है, तो इसमें सूर्य का तो कोई दोष मानना उचित नहीं है।
बादल धरती पर चारों ओर समान रूप से वर्षा करता है, किन्तु यदि उसके जल की बूँदें चातक के मुख में नहीं गिरती हैं तब यह तो चातक का ही दुर्भाग्य है, बादल को इस विषय में दोषी कहना लेशमात्र भी उचित नहीं है। विधाता ने ही इस प्रकार
१४२ | श्रीभर्तृहरिविरचितम्
चातक का प्यासा रहना, उसके भाग्य में लिख दिया, अतः उसे मिटाना तो किसी भी प्रकार सम्भव नहीं है।
विशेष– १. विधि के विधान को बदलने में कोई भी समर्थ नहीं है। यदि भाग्य में नहीं है तो व्यक्ति को संसार में समृद्धि होने पर भी लेशमात्र भी मिलना सम्भव नहीं है।
२. करील वृक्ष की विशेषता है कि उस पर वसन्त ऋतु में भी पत्ते नहीं आते हैं।
३. चातक के विषय में प्रसिद्ध है कि वह वर्षा के जल की बूँद से ही अपनी प्यास शान्त करता है।
४. भाग्य की प्रबलता का सुन्दरता से प्रतिपादन किया है।
५. शार्दूलविक्रीडित छन्द का प्रयोग हुआ है— लक्षण—
सूर्याश्वैर्म्सजस्ततः सगुरवः शार्दूलविक्रीडितम्।
६. अर्थापत्ति अलंकार का प्रयोग हुआ है।
व्याकरणात्मक टिप्पणी–
१. करीरस्य विटपे (षष्ठी तत्पुरुष) करीरविटपे
२. अव + √लोक् + त (आत्मने, लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) अवलोकते
३. √दूष् + ल्युट् (नपुं., प्रथमा विभक्ति, एकवचन) दूषणम्
४. ललाटे लिखितम् (सप्तमी तत्पुरुष) ललाटलिखितम्
५. √मृज् + तुमुन् = मार्जितुम्
६. √क्षम् + अच् (पुंल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) क्षमः
७. न + एव = नैव (वृद्धिरेचि— अ + ए = ऐ)
८. न + उलूकः + अपि + अवलोकते (आद् गुणः, अतो रोरप्लुतादप्लुते, इकोयणचि, अ + उ = ओ, :— उ— ओ, इ— य्)
९. √लिख्+ क्त = लिखितम्
१०. √पत् + झि (लट् लकार, प्रथम पुरुष, बहुवचन) पतन्ति
सूनुः सच्चरितः सती प्रियतमा स्वामी प्रसादोन्मुखः,
स्निग्धं मित्रमवञ्चकः परिजनो निष्क्लेशलेशं मनः।
आकारो रुचिरः स्थिरश्च विभवो विद्यावदातं मुखं,
तुष्टे विष्टपहारिणीष्टदहरौ संप्राप्यते देहिना।।१०९।।
अन्वय– विष्टपहारिणी इष्टद हरौ तुष्टे, देहिना सच्चरितः सूनुः, सती प्रियतमा, प्रसादोन्मुखः स्वामी, स्निग्धम् मित्रम्, अवञ्चकः परिजनः, निष्क्लेशलेशम् मनः, रुचिरः आकारः, स्थिरः विभवः, विद्यावदातम् च मुखम् सम्प्राप्यते।
अनुवाद– संसार (के कष्टों) का हरण करने वाले, मनोवाञ्छित (वस्तु) प्रदान करने वाले भगवान् विष्णु के प्रसन्न होने पर देहधारी (मनुष्य) के द्वारा श्रेष्ठ आचरण
नीतिशतकम् १४३
वाला पुत्र, सती साध्वी पत्नी, कृपालु स्वामी, स्नेही मित्र, कपटरहित सेवक, क्लेश के अंश मात्र से शून्य मन, सुन्दर आकार, स्थिर ऐश्वर्य और विद्या से पवित्र मुख प्राप्त किया जाता है।
व्याख्या- परम कृपालु भगवान् विष्णु, जो संसार के सभी प्रकार के कष्टों का हरण करने में सक्षम हैं तथा मनोवाञ्छित वस्तु को प्रदान करने वाले हैं, के पूर्ण प्रसन्न होने पर इस संसार में व्यक्ति को उत्तम आचरण वाला पुत्र, एकमात्र पति के प्रति ही अनुरक्त रहने वाली, प्रिय लगने वाली पत्नी, ऐसा स्वामी जो कठोरतापूर्वक आचरण नहीं करता हो, अपितु दयाभाव से युक्त हो, अत्यन्त प्रेम करने वाले मित्र तथा निश्छल एवं समर्पित भाव से सेवा करने वाले सेवक तथा कपटरहित बन्धु लोग, पूर्णतया प्रसन्न रहने वाला मन, अत्यन्त मनोहर आकृति और कभी भी समाप्त न होने वाला ऐश्वर्य, धन-धान्य एवं विद्या से पवित्र मुख प्राप्त किया जाता है।
कहने का तात्पर्य यह है कि इस संसार में ऊपर गिनाई गई वस्तुओं एवं विशेषताओं की प्राप्ति मनुष्य को सहज ही नहीं होती है और जिन्हें होती है, वे या तो अत्यन्त पुण्यवान् होते हैं या फिर अत्यन्त कृपालु भगवान् विष्णु ही यदि उनपर प्रसन्न हो जाएँ। दोनों ही स्थितियों में उपरोक्त का प्राप्त होना सौभाग्य का सूचक है।
विशेष- १. उपर्युक्त सभी बातें व्यक्ति को यदि प्राप्त हो सकें तो निश्चय ही वह सर्वाधिक भाग्यशाली होगा और वह सौभाग्य भगवान् विष्णु की कृपा से ही सम्भव है।
२. प्रस्तुत श्लोक से ऐसा प्रतीत होता है कि महाकवि भर्तृहरि वैष्णव मतावलम्बी थे।
३. श्लोक में प्रयुक्त परिजन का अर्थ सम्बन्धी भी किया जा सकता है।
४. कुछ विद्वानों के मत में यह श्लोक प्रक्षिप्त है।
५. शार्दूलविक्रीडित छन्द प्रयुक्त हुआ है। लक्षण—
सूर्याश्वैर्मसजास्ततः सगुरवः शार्दूलविक्रीडितम्॥
६. श्लोक में प्रयुक्त 'हारिणी' पद का अर्थ 'रञ्जयति' भी किया जा सकता है, तब अर्थ होगा संसार को प्रसन्न करने वाले, किन्तु यह अर्थ उतना प्रभावशाली प्रतीत नहीं होता।
व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. √तुष् + क्त = तुष्टे (सप्तमी विभक्ति, एकवचन)
२. देह + इनि = देहिन् (तृतीया विभक्ति, एकवचन) देहिना
३. प्रिय + तमप् + टाप् (प्रथमा विभक्ति, एकवचन) प्रियतमा
४. प्रसाद + उन्मुखः = प्रसादोन्मुखः (गुण, आद् गुणः) प्रसादाय उन्मुखः (चतुर्थी तत्पुरुष)
१४४ || श्रीभर्तृहरिविरचितम्
५. √स्निह् + क्त (नपुं., प्रथमा विभक्ति, एकवचन) स्निग्धम्
६. न वञ्चकः, अवञ्चकः (नञ् तत्पुरुष) √वञ्च् + ण्वुल् = वञ्चक
७. क्लेशस्य लेशः, क्लेशलेशः, निर्गतः क्लेशः यस्मात् तत् निष्क्लेशलेशम् (अव्ययीभाव समास)
८. विद्यया अवदातम् (तृतीया तत्पुरुष) विद्यावदातम्
९. अव + √दै + क्त = अवदातम् (नपुं., प्रथमा विभक्ति, एकवचन)
१०. विष्टपं हर्तुम् शीलम् यस्य सः, विष्टपहारी (बहुव्रीहि) विष्टप् + √हृ + णिनि = विष्टपहारिन्
११. इष्ट + √दा + क = इष्टद
१२. आ + √कृ + घञ् = आकारः
कर्म-पद्धतिः
नमस्यामो देवान्ननु हतविधेस्तेऽपि वशगाः,
विधिर्वन्द्यः सोऽपि प्रतिनियतकर्मैकफलदः।
फलं कर्मायत्तं किममरगणैः किञ्च विधिना,
नमस्तत्कर्मभ्यो विधिरपि न तेभ्यः प्रभवति॥९०॥
अन्वय- (वयम्) देवान् नमस्यामः, ननु ते अपि हतविधेः वशगाः, विधिः वन्द्यः, सः अपि प्रतिनियतकर्मैकफलदः, फलम् कर्मायत्तम्, अमरगणैः किम्? किम् च विधिना? तत् कर्मभ्यः नमः येभ्यः विधिः अपि न प्रभवति।
अनुवाद- (हम) देवताओं को नमस्कार करते हैं, किन्तु वे भी दुष्ट विधाता के वश में हैं। (तो फिर) विधाता ही वन्दना के योग्य है, वह भी केवल निश्चित कर्म के अनुसार (ही) फल देने वाला है (इस प्रकार यदि) फल (मात्र) कर्म के अधीन हैं (तो) देवताओं से क्या ? और विधाता से क्या ? उन कर्मों को (ही) नमस्कार है, जिन पर विधाता का भी प्रभाव नहीं होता है।
व्याख्या- कवि सर्वप्रथम देवताओं को शक्तिशाली एवं सर्वोपरि मानते हुए उनके प्रति नमन करता है, किन्तु तभी उसे विचार आता है कि देवता भी सर्वोपरि नहीं हैं, वे भी भाग्य के अधीन हैं, क्योंकि उनके आदेश की पालना में ही वे अनेक कार्य करने को बाध्य हैं। तब कवि विधाता को सर्वोपरि समझते हुए उसे नमन करने का विचार बनाता है, तभी उसे ध्यान आता है कि यह विधाता भी पूर्णतया स्वतन्त्र शक्ति नहीं है, अपितु यह जो व्यक्ति जैसा कर्म करता है, उसे वैसा ही फल प्रदान, करता है, कर्म फल में उसकी इच्छा लेशमात्र भी प्रभावी नहीं होती।
पुनः कवि विचार करता है— जब फल प्राप्ति पूर्णतया कर्म के अनुसार ही होती है अर्थात् व्यक्ति यदि अच्छे कर्म करेगा तो अच्छा फल मिलेगा और यदि पाप कर्म करेगा
नीतिशतकम् १४५
तो निश्चय ही उसे बुरे फल की प्राप्ति होगी। तो फिर कवि कहता है कि तब हमें देवताओं की वन्दना से क्या लाभ ? अर्थात् हम उनकी वन्दना नहीं करेंगे। इसी प्रकार उस विधाता के प्रति भी नमन से कोई लाभ नहीं है।
हम तो एक मात्र कर्म की ही पूजा करते हैं, जिनको करने पर विधाता भी फल देने के लिए बाध्य होगा।
विशेष- १. कर्म की ही सर्वोपरि महत्ता का सुन्दर ढंग से प्रतिपादन किया गया है।
२. प्रस्तुत श्लोक में 'हत' पद विधाता के प्रति उपेक्षा प्रकट करते हुए गाली के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है।
३. प्रकृति में पूर्णतया कर्मफल का सिद्धान्त ही लागू होता है।
४. शिखरिणी छन्द का प्रयोग हुआ है। लक्षण इस प्रकार है—
रसैःरुद्रैश्छिन्ना यमन सभलागः शिखरिणी॥
५. 'नमस्यामः' पद यहाँ वर्तमानकालिक अर्थ की अभिव्यक्ति के लिए नाम धातु पद से बनकर प्रयुक्त हुआ है।
६. 'ननु' अव्यय का प्रयोग 'किन्तु' अर्थ की अभिव्यक्ति में हुआ है।
७. नमःस्वस्तिस्वाहास्वधाऽलंवषट् योगाच्च सूत्र से नमः के योग में 'तेभ्यः कर्मभ्यः' में चतुर्थी विभक्ति प्रयुक्त हुई है।
व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. नमस् (नाम धातु) + क्यच् (लट् लकार, उत्तम पुरुष, बहुवचन) नमस्यामः
२. हतः विधिः हतविधिः तस्य (कर्मधारय) हतविधेः
३. वशम् गच्छन्ति इति वशगाः
४. √वन्द् + ण्यत् (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) वन्द्यः
५. नियतम् नियतम् प्रति प्रतिनियतम् (अव्ययीभाव)
६. फल + √दा + क = फलदः (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन)
७. आ + √यत् + क्त = आयत्तम्
८. अमराणाम् गणः, अमरगणः तैः अमरगणैः (षष्ठी तत्पुरुष)
९. प्र + √भू + तिप् (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) प्रभवति
१०. कर्मणाम् आयत्तम् = कर्मायत्तम् (षष्ठी तत्पुरुष)
११. नमस्यामः + देवान् (हशि च - :- उ— ओ— आद् गुणः से)
१२. हतविधेः + ते + अपि (विसर्जनीयस्य सः, अतो रोरप्लुतादप्लुते)
१३. विधिः + वन्द्यः (विसर्जनीयस्य सः, ससजुषो रुः) (:- र्)
१४. कर्म + एक = कर्मैकं (वृद्धिरेचि, अ + ए = ऐ)
१५. कर्म + आयत्तम् (अकः सवर्णे दीर्घः— अ + आ = आ)
१४६ | श्रीभर्तृहरिविरचितम्
ब्रह्मा येन कुलालवन्नियमितो ब्रह्माण्डभाण्डोदरे,
विष्णुर्येन दशावतारगहने क्षिप्तो महासङ्कटे।
रुद्रो येन कपालपाणिपुटको भिक्षाटनं कारितः^१,
सूर्यो भ्राम्यति नित्यमेव गगने तस्मै नमः कर्मणे॥१११॥
अन्वय- येन (कर्मणा) ब्रह्मा (अपि) कुलालवत् ब्रह्माण्ड भाण्डोदरे नियमितः, येन विष्णुः (अपि) दशावतार- गहने महासंकटे क्षिप्तः, येन कपालपाणिपुटकः रुद्रः (अपि) भिक्षाटनम् कारितः, (येन) सूर्यः गगने नित्यम् एव भ्राम्यति, तस्मै कर्मणे नमः।
अनुवाद- जिस (कर्म) के द्वारा ब्रह्मा (भी) कुम्हार के समान, ब्रह्माण्ड रूपी बर्तन के अन्दर नियन्त्रित कर दिया गया, जिसके द्वारा विष्णु (भी) दस अवतार रूपी गम्भीर (और) महान् संकट में डाल दिया गया। जिसके द्वारा कपाल रूपी दोने को हाथ में लिए हुए शिव से (भी) भिक्षावृत्ति करा दी गई। (जिसके द्वारा) सूर्य (भी) आकाश में नित्य ही घूमाया जा रहा है, उस कर्म को नमस्कार है।
व्याख्या- कर्म के प्रभाव से कोई नहीं बच सकता, सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण एवं शक्तिशाली देवता ब्रह्मा, विष्णु और महेश भी नहीं, इसका प्रतिपादन प्रस्तुत श्लोक में करते हुए कवि कहता है कि— कर्म की सामर्थ्य के कारण ही सम्पूर्ण सृष्टि का निर्माण करने वाला ब्रह्मा भी ब्रह्माण्ड रूपी बर्तन के भीतर बन्द होकर, कुम्हार जिस प्रकार बर्तन बनाने में लगा रहता है, ठीक उसी प्रकार इस सृष्टि का निर्माण करने में दिन-रात बिना विश्राम किए लगा हुआ है।
इसी प्रकार यह कर्म का ही प्रभाव है कि उसने सामर्थ्यशाली संसार का पालन करने वाले भगवान् विष्णु को भी एक दो नहीं, अपितु पूरे दस-दस अवतार लेने के लिए बाध्य कर दिया तथा उनमें उन्हें अनेकों कष्टों का भी सामना करना पड़ा।
इतना ही नहीं उसी शक्तिशाली एवं प्रभावशाली कर्म ने सम्पूर्ण संसार का विनाश करने वाले, भयंकर प्रलयकारी देवता भगवान् रुद्र को भी मृत मनुष्य की खोपड़ी का भिक्षा पात्र हाथ में लेकर भिक्षावृत्ति के लिए बाध्य कर दिया।
इतना ही नहीं सम्पूर्ण संसार को प्रकाशित करने वाला, तेजस्वी सूर्य भी जिसके आदेश एवं प्रभाव के कारण आकाश में एक दो दिन से नहीं, अपितु अनन्त काल से चक्कर लगाने के लिए बाध्य है। ऐसे प्रभावशाली उस कर्म को प्रणाम हैं अर्थात् अन्त में कवि कर्म की सर्वोच्च सत्ता को स्वीकार कर नमन करता है।
विशेष- १. ब्रह्मा, विष्णु और शिव जैसे महत्त्वपूर्ण और शक्तिशाली देवता भी कर्म के द्वारा नियन्त्रित हैं। अतः कर्म की सर्वोच्चसत्ता स्वतः सिद्ध है।
१. कपालपाणिपुटके भिक्षाटनं सेवते।
नीतिशतकम् १४७
२. ब्रह्मा को निर्माण का, विष्णु को पालन का तथा शिव को विनाश का देवता माना जाता है।
३. पुराणों के अनुसार, भगवान् विष्णु ही संसार को कष्टों से मुक्ति दिलाने के लिए अनेक अवतार ग्रहण करते हैं।
४. 'नमः' पद को योग में 'कर्मणे' में चतुर्थी विभक्ति का प्रयोग हुआ है— सूत्र नमः स्वस्तिस्वाहा स्वधाऽलं वषट्योगाच्च।
५. शिव की विशेषता है कि वे मनुष्य की खोपड़ी रूपी पात्र को ही सदा अपने पास रखते हैं तथा सर्वसामर्थ्यशाली होते हुए भी भिक्षाटन करके अपनी जीविका चलाते हैं।
६. शार्दूलविक्रीडित छन्द का प्रयोग हुआ है, लक्षण—
सूर्याश्वैर्मसजस्तताः सगुरवः शार्दूलविक्रीडितम्।
७. ब्रह्मा की उपमा कुम्हार से दी गई है, अतः उपमालंकार, लक्षण—
प्रस्फुटं सुन्दरं साम्यमुपमेत्यभिधीयते।
८. ब्रह्माण्ड रूपी पात्र में रूपक अलंकार, लक्षण—
तद्रूपकमभेदो य उपमानोपमेययोः।
व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. कुलाल + मतुप् = कुलालवत्, कुलालेन तुल्यः, इति
२. √क्षिप् + क्त = क्षिप्तः (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन)
३. महति सङ्कटे, महासंकटे (सप्तमी तत्पुरुष)। √कृ + णिच् + क्त (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) कारितः √भ्रम् + णिच् + तिप् (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) भ्राम्यति। कपालं पाणिपुटके यस्य सः, कपालपाणिपुटकः (बहुव्रीहिं) दश अवताराः दशावताराः, तैः गहनम्, दशावतारगहनं, तस्मिन् दशावतारगहने अव + √तृ + घञ् = अवतारः पाणि एव पुटकम्, तस्मिन् (कर्मधारय) √भिक्ष् + अट् + ल्युट् = भिक्षाटनम् नि + √यम् + णिच् + क्त = नियमितः।
या साधूंश्च खलान् करोति, विदुषो मूर्खान् हितान् द्वेषिनः,
प्रत्यक्षं कुरुते परोक्षममृतं हलाहलं तत्क्षणात्।
तामाराधय सत्क्रियां भगवतीं भोक्तुं फलं वाञ्छितं,
हे साधो! व्यसनैर्गुणेषु विपुलेष्वास्थां वृथा मा कृथाः॥११२॥
अन्वय- हे साधो! या खलान् साधून् करोति, मूर्खान् च विदुषः, द्वेषिणः हितान्, परोक्षम् प्रत्यक्षम् कुरुते, हलाहलम् तत् क्षणात् अमृतम् कुरुते, वाञ्छितम् फलम् भोक्तुम् ताम् भगवतीम् सत्क्रियाम् आराधय। व्यसनैः विपुलेषु गुणेषु वृथा आस्थाम् मा कृथाः।
१४८ श्रीभर्तृहरिविरचितम्
अनुवाद- हे सज्जन, जो दुष्टों को सज्जन बनाती है और मूर्खों को विद्वान्, द्वेष करने वालों को हितकारी, परोक्ष को प्रत्यक्ष करती है। हलाहल (विष) को उसी क्षण अमृत बना देती है, मनोवाञ्छित फल को भोगने के लिए, उस देवी सत्क्रिया की आराधना करो। आसक्तियों के कारण बहुत से गुणों पर व्यर्थ श्रद्धा मत करो।
व्याख्या- मनुष्य एक मात्र सत्कार करने की क्रिया में निपुण हो जाता है तो फिर उसे अन्य किसी गुण की आवश्यकता नहीं है। घर आए अतिथि का व्यक्ति को अवश्य सत्कार करना चाहिए, क्योंकि यह दैवी गुणों से सम्पन्न सत्क्रिया मनुष्य को, यदि वह दुष्ट प्रकृति का है तो सज्जन बनाती है। यदि वह मूर्ख है तो उसे विद्वान् बनाती है, अर्थात् ऐसा करने से वह विद्वानों के सम्पर्क में आएगा तथा उसे अनेक विद्वानों का आशीर्वाद तथा मार्गदर्शन प्राप्त होगा।
जो लोग उससे शत्रुता रखते हैं वे उसके मित्र तथा हितेच्छु हो जाएँगे, जिस वस्तु का उसे ज्ञान नहीं है, वह भी जिनकी उसने सेवा की है तथा सत्कार किया है, उनसे प्रत्यक्षवत् ज्ञात हो जायेगी। इस अतिथि सत्कार रूपी देवी में तो वह गुण है कि यह हलाहल जैसे भयंकर विष के समान वातावरण एवं वस्तु को भी अमृत के समान मधुर और हितकारी बना देती है।
इसलिए अन्त में कवि सभी व्यक्तियों को सम्बोधित करते हुए कहता है कि यदि तुम सब अपने मनोवाञ्छित फल की प्राप्ति करना चाहते हो तो इस सत्क्रिया रूपी ऐश्वर्य की देवी की आराधना करो। अत्यधिक लालच एवं आसक्ति के कारण अलग-अलग अन्यान्य गुणों के पीछे भागना व्यर्थ है।
विशेष- १. प्रस्तुत श्लोक में सेवा (अतिथि सत्कार) को सर्वोपरि प्रतिपादित किया है। काव्यलिंग अलंकार का प्रयोग हुआ है।
२. यहाँ साधो शब्द व्यञ्जना से दुष्ट अर्थ की भी अभिव्यक्ति कर रहा है।
३. यदि व्यक्ति में सेवाभाव है तो वह निश्चय ही सभी का मन जीतने में समर्थ है। अतः व्यक्ति को सेवाभावी 'अतिथि देवो भव' की भावना वाला होना चाहिए।
४. शार्दूलविक्रीडित छन्द का प्रयोग हुआ है, लक्षण—
सूर्याश्वैर्मसजस्तताः सगुरवः शार्दूलविक्रीडितम्।
५. हलाहल पुराणों के अनुसार समुद्र मंथन के समय समुद्र से निकला था, जिसके कारण सम्पूर्ण सृष्टि में हाहाकार मच गया था। बाद में देवताओं की प्रार्थना पर शिव ने उसे अपने कण्ठ में धारण किया था।
व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. √द्विष् + णिनि = द्वेषिन् (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) द्वेषिनः
२. √वाञ्छ् + क्त (नपुं., द्वितीया विभक्ति, एकवचन) वाञ्छितम्
नीतिशतकम् | १४९
३. √भुज् + तुमुन् = भोक्तुम्
४. भग + वतुप् = भगवत् (स्त्रीलिंग, द्वितीया विभक्ति, एकवचन) भगवतीम्
५. √कृ + सिप् (लुङ् लकार, मध्यम पुरुष, एकवचन), कृथाः
६. यहाँ मा पद के योग में अकृथाः पद में अ के आगम का निषेध हुआ है।
७. हित + अच् = हित (पुल्लिंग, द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) हितान्
८. अक्ष्णोः प्रति, प्रत्यक्षम् (अव्ययीभाव)
९. सत् + √कृ + इयङ् + टाप् = सत्क्रियाम्
१०. आ + √राध् + णिच् (लोट् लकार, मध्यम पुरुष, एकवचन) आराधय
११. साधून् + च (नश्छव्यप्रशान् )न्– रु– ः– स्– शं
१२. √कृ + तिप् (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) करोति
१३. न मृतम्, इति अमृतम् (नञ् समास)
शुभ्रं सद्म सविभ्रमा युवतय श्वेतातपत्रोज्ज्वला,
लक्ष्मीरीत्यनुभूयते चिरमनुस्यूते शुभे कर्मणि।
विच्छिन्ने नितरामंनगकलह क्रीडात्रुटत्तन्तुकं,
मुक्ताजालमिव प्रयाति झटिति भ्रश्यत् दिशो दृश्यताम्॥११३॥
अन्वय- चिरम् शुभे कर्मणि अनुस्यूते, शुभ्रम् सद्म, सविभ्रमाः युवतयः, श्वेतातपत्रोज्ज्वला लक्ष्मीः इति अनुभूयते, (किन्तु एतेषाम्) विच्छिन्ने नितराम् अनङ्गकलहक्रीडात्रुटत्तन्तुकम् मुक्ताजालम् इव भ्रंश्यत् झटिति दिशः प्रयाति (इति) दृश्यताम्।
अनुवाद- चिरकाल तक शुभ कर्मों का उदय होने पर (मनुष्य के) द्वारा धवल (स्वच्छ) महल, विलासवती स्त्रियाँ, श्वेत छत्र से देदीप्यमान लक्ष्मी इत्यादि का अनुभव किया जाता है। (किन्तु इन कर्मों के) नष्ट होने पर अत्यन्त काम कलह की क्रीडा में टूटे हुए धागे वाले मोतियों के समूह के समान टूटते हुए शीघ्र ही (ये सब विविध) दिशाओं में फैल जाते हैं, (यह) जरा देखिये।
व्याख्या- मनुष्य के द्वारा किए गए पूर्वजन्मों के शुभ कर्म जब–जब उदित होते हैं तो उसे उन पुण्य कर्मों के फलस्वरूप संगमरमर के बने स्वच्छ सुन्दर और शुभ्र महलों में भोग भोगना, सुन्दर एवं अत्यन्त विलासपूर्ण चेष्टाओं से युक्त निपुण स्त्रियों का सांन्निध्य एवं आनन्द तथा असीम ऐश्वर्य की स्वामिनी लक्ष्मी, जिसके ऊपर श्वेत छत्र सदैव देदीप्यमान रहता है, का उपभोग करने का सौभाग्य प्राप्त होता है।
किन्तु जैसे ही ये पुण्य कर्म भोगने के पश्चात् नष्ट हो जाते हैं और दूसरे पुण्य कर्मों के अभाव में ये सब सुख सुविधाएँ, भोग सामग्रियाँ आदि ठीक उसी प्रकार तितर–बितर
१५० | श्रीभर्तृहरिविरचितम्
हो जाती हैं, जैसे अत्यन्त उद्दाम काम-क्रीड़ा के कलह में टूटे हुए धागे वाली माला के मोती सर्वत्र विविध दिशाओं में फैल जाते हैं।
आप सब भी इस विषय में गम्भीरता से विचार करें, यह कितनी आश्चर्यजनक बात है।
विशेष- १. पुण्यकर्मों का प्रभाव अद्भुत है। अतः व्यक्ति को सदैव शुभ कर्म ही करने चाहिएँ। २. शुभ कर्मों के नष्ट होने पर सभी भोगसामग्री किस अप्रत्याशित ढंग से बिखर जाती है। उसके लिए माला के मोतियों की कल्पना अत्यन्त सुन्दर बन पड़ी है। ३. उपमालंकार का प्रयोग दर्शनीय है। लक्षण इस प्रकार है— प्रस्फुटं सुन्दरं साम्यमुपमेत्यभिधीयते॥ ४. शार्दूलविक्रीडित छन्द का प्रयोग हुआ है। लक्षण— सूर्याश्वैर्मसजास्ततः सगुरवः शार्दूलविक्रीडितम्। ५. अनुप्रास अलंकार का प्रयोग भी प्रशंसनीय है। लक्षण— अनुप्रासः शब्द साम्यं वैषम्येऽपि स्वरस्य यत्। ६. झटिति पद यहाँ अद्भुत कल्पना की अभिव्यक्ति कर रहा है।
व्याकरणात्मक टिप्पणी- १. वि + √छिद् + क्त (सप्तमी विभक्ति, एकवचन) विच्छिन्ने २. √भ्रंश् + शतृ = भ्रश्यत् ३. विभ्रमैः सहिताः, सविभ्रमाः (अव्ययीभाव) ४. अनु + √भू + णिच् + त (आत्मनेः, प्रथम पुरुष, एकवचनं) अनुभूयते ५. अनु + √सिव् + क्त = अनुस्यूते (सप्तमी विभक्ति, एकवचन) ६. प्र + √इण् (गतौ) तिप् (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) प्रयाति
गुणवदगुणवद् वा कुर्वता कार्यमादौ,
परिणतिरवधार्या यत्नतः पण्डितेन।
अतिरभसकृतानां कर्मणामाविपत्ते-
र्भवति हृदयदाही शल्यतुल्यो विपाकः॥११४॥
अन्वय- गुणवत् अगुणवत् वा कार्यम् कुर्वता पण्डितेन आदौ यत्नतः परिणतिः अवधार्या। अतिरभस-कृतानाम् कर्मणाम् विपाकः आविपत्तेः शल्यतुल्यः हृदय दाहिं भवति।
अनुवाद- अच्छा या बुरा काम करते हुए विद्वान् के द्वारा प्रारम्भ में (ही) यत्नपूर्वक (उसके) परिणाम पर विचार कर लेना चाहिए, (अन्यथा) अत्यन्त जल्दी में
नीतिशतकम् १५१
किए गए कार्यों का परिणाम मृत्युपर्यन्त कांटे के समान हृदय को जलाने (पीड़ा) वाला होता है।
व्याख्या- बुद्धिमान् व्यक्ति जब भी कोई अच्छा या बुरा कार्य प्रारम्भ करे, उससे पहले वह भलीप्रकार सूक्ष्म-दृष्टि से विचारं करते हुए, इस कार्य का परिणाम अच्छा होगा या बुरा यह जान लेवे।
कई बार व्यक्ति किसी काम को भावावेश में जल्दीबाजी में शुरू तो कर देता है, किन्तु उसके परिणाम उसे अत्यन्त कटु रूप में मिलते हैं, जिनका उसे मरणपर्यन्त अत्यन्त पश्चाताप होता रहता है, इस कार्य के फल उसके हृदय को ठीक उसी प्रकार वेदना पहुँचाते हैं, जिस प्रकार कोई कांटा शरीर के मर्मस्थल हृदय में प्रवेश करने के बाद पीड़ा पहुँचाने वाला होता है, क्योंकि ये दोनों ही वेदनाएँ असह्य होती है। वह व्यक्ति पश्चाताप की अग्नि में जलता रहता है।
विशेष- १. व्यक्ति को किसी भी कार्य को प्रारम्भ करने से पूर्व उसके परिणाम के प्रत्येक पक्ष पर भली-भाँति विचार कर लेना चाहिए।
२. महाकवि भारवि ने भी कहा है— ‘‘सहसा विदधीत न क्रियाम्’’ । (किरातार्जुनीयम्)
३. कई बार व्यक्ति अपने द्वारा किए गए कार्य के परिणाम से इतना दुःखी एवं पीड़ित होता है जैसे उसके हृदय में किसी ने विष से बुझा हुआ नुकीला बाण ही चुभा दिया हो।
४. उपमा और अर्थान्तरन्यास अलंकार का प्रयोग हुआ है।
५. 'हृदय दाहि' से अभिप्राय 'वेदना अतिरेक' की अनुभूति से है।
६. मालिनी छन्द का प्रयोग हुआ है, लक्षण इस प्रकार है—
ननमयययुतेयं मालिनी भोगिलोकैः।
७. 'पण्डित' शब्द का प्रयोग 'बुद्धिमान्' अर्थ की अभिव्यक्ति के लिए हुआ है।
व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. गुण + मतुप् = गुणवत्, न गुणवत् इति अगुणवत् (नञ् समास)
२. √कृ + शतृ (तृतीया विभक्ति, एकवचन, पुल्लिंग) कुर्वता
३. परि + √नम् + क्तिन् (स्त्रीलिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) परिणतिः
४. यत्न + तसिल् = यत्नतः
५. अव + √धृ + ण्यत् + टाप् (प्रथमा विभक्ति, एकवचन) अवधार्या
६. वि + √पच् + घञ् (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) विपाकः
७. वि + √पद् + क्तिन् = विपत्तिः
८. हृदय + √दह् + णिनि (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) हृदयदाही
१५२ श्रीभर्तृहरिविरचितम्
९. कर्मणाम् जातम् कर्मजातम् (षष्ठी तत्पुरुष)
१०. √जन् + क्त = जातम्
११. पण्डा + इतच् = पण्डितः
१२. √भू + तिप् (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) भवति
स्थाल्यां वैदूर्यमय्यां पचति च लशुनं चन्दनैरिन्धनाद्यैः,
सौवर्णैर्लाङ्गलाग्रैर्विलिखति वसुधामर्क्रमूलस्य हेतोः।
कृत्वा कर्पूरखण्डान् वृत्तिमिह कुरुते कोद्रवाणां समन्तात्
प्राप्येमां कर्मभूमिं न चरति मनुजो यस्तपो मन्दभाग्यः॥११५॥
अन्वय- यः मन्दभाग्यः मनुजः इमाम् कर्मभूमिम् प्राप्य, इह तपः न चरति, सः वैदूर्यमय्याम् स्थाल्याम् चन्दनैः इन्धनाद्यैः लशुनम् पचति, अर्कमूलस्य हेतोः सौवर्णैः लाङ्गलाग्रैः वसुधाम् विलिखति, कर्पूरखण्डान् कृत्वा कोद्रवाणाम् समन्तात् वृत्तिम् कुरुते।
अनुवाद- जो भाग्यविहीन व्यक्ति इस कर्मभूमि को प्राप्त करके यहाँ तपस्या का आचरण नहीं करता है, वह वैदूर्यमणि से निर्मित बटलोई में चन्दन आदि के इन्धनों के द्वारा लहसुन पकाता है, आक की जड़ से लिए सोने के हल के अग्रभागों के द्वारा पृथिवी को खोदता है, कर्पूर के टुकड़े करके कोदों (अन्न) के चारों ओर घेरा बनाता है।
व्याख्या- सामान्य रूप से मनुष्य-जीवन दुर्लभ है, साथ ही यह जीवन ईश्वर ने इस संसार में कर्म करने के लिए प्रदान किया है, इसलिए यह संसार वस्तुतः कर्मभूमि है, किन्तु यदि कोई व्यक्ति इस कर्मभूमि रूपी संसार में आकर कर्म रूपी कठोर तप का आचरण नहीं करता है, अन्यान्य व्यर्थ के कार्य जैसे सोना, खाना, खेलना आदि कार्यों में ही अपना अमूल्य जीवन व्यतीत करता है, तो उसका यह जीवन पूर्णतया निरर्थक है और ये सब कार्य भी ठीक उसी प्रकार मूर्खतापूर्ण और निरर्थक हैं, जैसे—
कोई व्यक्ति बहुमूल्य वैदूर्यमणिजटित बटलोई में चन्दन आदि बहुमूल्य लकड़ी के ईंधन को जलाकर लहसुन जैसी तुच्छ वस्तु को पकाने का कार्य करे अथवा उसका यह कार्य सोने जैसी मूल्यवान् धातु से बने हल के द्वारा आक की जड़ जैसी तुच्छ वस्तु को प्राप्त करने का प्रयास करने जैसा अविवेकपूर्ण होगा।
उस व्यक्ति का यह कार्य, कोदों नामक खाद्यान्न जो जंगल में स्वतः ही उग आता है, की रक्षा के लिए कर्पूर के टुकड़ों से बाढ़ बनाने जैसा होगा।
अतः मनुष्य को इस संसार रूपी कर्मभूमि में आकर, मानवता की सेवा रूप प्रशंसनीय कार्यों में ही लिप्त रहना चाहिए, अपने समय को व्यर्थ नहीं गंवाना चाहिए।
१. पचति तिलकणानिन्धनेश्चन्दनाद्यैः (चन्दन के ईंधन से तिलकणों को पकाता है) इन्धनोत्रै (इन्धनों के समूह से)
नीतिशतकम् १५३
विशेष- १. व्यक्ति को सांसारिक भोगों में आसक्त रहकर अपने मूल्यवान् जीवन को व्यर्थ नहीं गंवाना चाहिए।
२. संसार में जन्म लेकर भी यदि कोई व्यक्ति श्रेष्ठ कर्म नहीं करता है, तो वह अभागा ही माना जाएगा।
३. स्रग्धरा छन्द का प्रयोग हुआ है, लक्षण इस प्रकार है— म्रभ्नैर्यानां त्रयेण त्रिमुनियतियुता स्रग्धरा कीर्तितियम्॥
४. कोदों अत्यन्त सामान्य प्रकार का अन्न जिसे तपस्वी वनों में प्रयोग करते हैं, क्योंकि यह वहाँ स्वतः उग आता है।
५. दीपक तथा काव्यलिंग अलंकार का प्रयोग हुआ है।
व्याकरणात्मक टिप्पणी- १. मन्दं भाग्यं यस्य सः, मन्दभाग्यः (बहुव्रीहि) २. कर्मणः भूमिः, कर्मभूमिः, तम् कर्मभूमिम् (षष्ठी तत्पुरुष) ३. √चर् + तिप् (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) चरति ४. स्थाली + ङि (सप्तमी विभक्ति, एकवचन) स्थाल्याम् ५. √पच् + तिप् (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) पचति ६. सुवर्ण + अण् = सौवर्णम् (नपुं., तृतीया विभक्ति, बहुवचन) सौवर्णैः ७. लाङ्गलानाम् अग्रम् तैः (षष्ठी तत्पुरुष) लाङ्गलाग्रैः ८. अर्कस्य मूलम्, अर्कमूलम्, तस्य अर्कमूलस्य (षष्ठी तत्पुरुष) ९. वि + √लिख् + तिप् = विलिखति (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) १०. कर्पूरस्य खण्डान् = कर्पूरखण्डान् (षष्ठी तत्पुरुष) ११. √वृ + क्तिन् (स्त्रीलिंग, द्वितीया विभक्ति, एकवचन) वृत्तिः
नैवाकृतिः फलति नैव कुलं न शीलं, विद्याऽपि नैव न च यत्नकृताऽपि सेवा। भाग्यानि पूर्वतपसा खलु सञ्चितानि, काले फलन्ति पुरुषस्य यथैव वृक्षाः॥११६॥
अन्वय- न एव आकृतिः फलति, न एव कुलम्, न शीलम्, विद्या अपि फलति न एव, यत्नकृता सेवा अपि न (फलति), च यथा वृक्षाः (तथा) एव पुरुषस्य पूर्वतपसा सञ्चितानि भाग्यानि खलु काले फलन्ति।
अनुवाद- न ही (सुन्दर) आकृति फलती है, न ही कुल, न शील। विद्या भी (फलवती) नहीं होती है और यत्नपूर्वक की गई सेवा भी नहीं (फलती है), (अपितु) जिस प्रकार वृक्ष (फलवान् होते हैं), (वैसे) ही पुरुष के पूर्व (जन्म) के तप के द्वारा सञ्चित भाग्य ही समय (आने) पर फलीभूत होते हैं।
| १५४ | श्रीभर्तृहरिविरचितम् |
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व्याख्या- मनुष्य कितना ही सुन्दर क्यों न हो, कितने ही उच्च वंश में उसका जन्म क्यों न हुआ हो। कितना ही सदाचारी क्यों न हो, उसने कितने भी शास्त्रों का अध्ययन क्यों न किया हो अथवा कितने भी समर्पण भाव से तन्मयतापूर्वक दूसरों की सेवा क्यों न की हो, ये सब बातें व्यक्ति को शुभ फल प्रदान करने में समर्थ नहीं हैं अर्थात् उक्त किसी भी कारण से लाभ एवं सुख की प्राप्ति ही हो यह अनिवार्य नहीं है।
अपितु व्यक्ति ने पूर्वजन्म में जिन कर्मों को तपस्यापूर्वक करते हुए अर्थात् शारीरिक कष्टों को सहन करते हुए इकट्ठा किया है, ऐसे पुण्य कर्मों द्वारा निर्मित भाग्य ही ठीक उसी प्रकार फल देने वाला होता है, जिस प्रकार उपयुक्त ऋतुकाल आने पर सभी वृक्ष फल देने वाले होते हैं।
कहने का तात्पर्य है कि पूर्वजन्म में किए गए पुण्य कर्मों से ही व्यक्ति का भाग्य निर्माण होता है और वह भाग्य ही उपयुक्त समय पर व्यक्ति को सुख, उन्नति, यश, लाभादि प्रदान करने वाला होता है।
विशेष-
१. मनुष्य के भाग्य का निर्माण भी पूर्वजन्म के कर्मों के द्वारा ही होता है।
२. मनुष्य की उन्नति, सुखादि में कुल, शील, विद्या, सेवा और सुन्दर आकृति आदि का कोई महत्त्व नहीं है।
३. कर्मफल के सिद्धान्त को वृक्ष का दृष्टान्त देकर समझाया गया है। अतः दृष्टान्त अलंकार—
दृष्टान्तस्तु सधर्मस्य वस्तुनः प्रतिबिम्बनम्।
४. समय से पूर्व किसी भी कार्य का होना सम्भव नहीं है।
५. वसन्ततिलका छन्द का प्रयोग हुआ है। लक्षण इस प्रकार है—
उक्ता वसन्ततिलका तभजा जगौ गः।
व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. आ + √कृ + क्तिन् (स्त्रीलिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) आकृतिः
२. यत्नेन कृता, यत्नकृता (तृतीया तत्पुरुष) √यत् + नङ् = यत्न
३. पूर्वेण तपसा पूर्वतपसा (तृतीया तत्पुरुष)
४. सम् + √चि + क्त (नपुं., प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) संचितानि
५. √फल् + झि (लट् लकार, प्रथम पुरुष, बहुवचन) फलन्ति
६. √विद् + क्यप् + टाप् = विद्या
७. न + एव + आकृतिः (वृद्धिरेचि, अकः सवर्णे दीर्घः)
८. यथा + एव= यथैव (वृद्धिरेचि) (आ + ए = ऐ)
९. √व्रंश्च् + क्सु = वृक्षः
१०. √भज् + ण्यत् = भाग्यम् (नपुं., प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) भाग्यानि
| नीतिशतकम् | १५५ |
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मज्जत्वम्भसि यातु मेरुशिखरं शत्रूञ्जयत्वाहवे,
वाणिज्यं कृषिसेवनादि सकलाः विद्याः कला शिक्षतु।
आकाशं विपुलं प्रयातु खगवत् कृत्वा प्रयत्नं परः,
नाभाव्यं भवतीह कर्मवशतो भाव्यस्य नाशः कुतः।॥११७॥
अन्वय- (मनुष्यः) अम्भसि मज्जतु, मेरु-शिखरम् यातु, आहवे शत्रून् जयतु, वाणिज्यम् कृषि- सेवनादिसकलाः विद्याः कलाः शिक्षतु, परः प्रयत्नम् कृत्वा खगवत् विपुलम् आकाशम् प्रयातु, इह कर्मवशतः अभाव्यम् न भवति, भाव्यस्य नाशः कुतः।
अनुवाद- (मनुष्य) जल में डूब जाए, मेरु की चोटी पर चलां जाए, युद्ध में शत्रुओं को जीत ले, व्यापार, कृषि, सेवा आदि सभी विद्याएँ (एवं) कलाएँ सीख ले, अत्यधिक प्रयत्न करके पक्षी के समान् विस्तृत आकाश में चला जाए, इस (संसार) में कर्म के वशीभूत अनहोनी नहीं होती, (तो फिर) होनी का नाश कैसे (सम्भव है)।
व्याख्या- कर्म फल पर आधारित होनहार होकर रहती है, उसे कोई भी रोकने में समर्थ नहीं है, ठीक इसी प्रकार अनहोनी किसी भी स्थिति में नहीं हो सकती, भले में व्यक्ति जल में समा जाए अथवा सुमेरु पर्वत की चोटी पर भी क्यों न चढ़ जाए। युद्ध स्थल पर शत्रुओं पर प्राप्त विजय भी तभी सम्भव है जब वह होनहार हो, व्यापार, खेती अथवा सेवाकार्य आदि सभी कलाओं में निपुणता क्यों न प्राप्त कर ले। प्रयत्नपूर्वक पक्षी के समान आकाश में भी क्यों न उड़ने लगे, किन्तु इन सब बातों को देखकर इतना अवश्य समझ लेना चाहिए कि होता वही है जो होनहार होती है, जिसे होनी भी कहते हैं।
जो अनहोनी है, उसका किसी भी काल अथवा परिस्थिति में होना सम्भव नहीं होता।
विशेष-
१. यहाँ अभाव्य से अभिप्राय अनहोनी से है तथा भाव्य से अभिप्राय होनी से है।
२. मनुष्य को इस संसार में जो भी सुख अथवा दुःख प्राप्त होता है, वह उसके पूर्वजन्म में किए गए कर्मों द्वारा प्राप्त भवितव्यता के सिद्धान्त के आधार पर ही होता है।
३. मनुष्य कोई भी असम्भव से असम्भव कार्य क्यों न कर ले, किन्तु भाग्य के सामने (जिसका निर्माण उसी द्वारा किए गए पूर्वजन्म के कर्मों से होता है), उसकी एक नहीं चलती। अतः व्यक्ति को सदैव श्रेष्ठ कार्य करने चाहिएँ।
४. शार्दूलविक्रीडित छन्द का प्रयोग हुआ है। लक्षण इस प्रकार है—
सूर्याश्वैर्मसजस्ततः सगुरवः शार्दूलविक्रीडितम्।
५. यमक तथा दीपक अलंकार का प्रयोग दर्शनीय है।
१५६ श्रीभर्तृहरिविरचितम्
व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. √मज्ज् + तिप्( लोट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) मज्जतु २. मेरोः शिखरम् मेरुशिखरम् (षष्ठी तत्पुरुष) ३. √शिक्ष + तिप् (लोट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) शिक्षतु ४. √नश् + घञ् = नाशः (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) ५. √भू + ण्यत् = भाव्यम् ६. √नश् + घञ् (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) नाशः ७. किम् + तसिल् = कुतः ८. वणिज् + ष्यञ् = वाणिज्यम् ९. √सेव् + ल्युट् = सेवनम् १०. न भाव्यम् इति अभाव्यम् (नञ् समास) ११. खग + वतुप् = खगवत् १२. √कृ + क्त्वा = कृत्वा १३. मज्जतु + अम्भसि (इकोयणचि) (उ— व्) १४. न + अभाव्यम् (अकः सवर्णे दीर्घः) अ + अ = आ)
वने रणे शत्रुजलाग्निमध्ये,
महार्णवे पर्वतमस्तके वा।
सुप्तं प्रमत्तं विषमस्थितं वा,
रक्षन्ति पुण्यानि पुरा कृतानि॥१९८॥
अन्वय- पुरा कृतानि पुण्यानि सुप्तम्, प्रमत्तम्, विषमस्थितम्, वा (नरम्) वने, रणे, शत्रुजलाग्निमध्ये महार्णवे, पर्वतमस्तके वा रक्षन्ति।
अनुवाद- पूर्व (जन्म) में किए गए पुण्य (कर्म) सोए हुए, असावधान अवस्था वाले अथवा विषम स्थिति वाले (मनुष्य की) वन में, युद्ध में, शत्रु, जल और अग्नि के बीच में, महासमुद्र में अथवा पर्वत की चोटी पर (भी) रक्षा करते हैं।
व्याख्या- मनुष्यों के पूर्वजन्म में किए गए पुण्य कर्मों से ही व्यक्ति के भाग्य का निर्माण होता है और वे पुण्य ही व्यक्ति की किसी भी कठिन परिस्थिति में सर्वत्र रक्षा करते हैं। भले ही व्यक्ति गहरी निद्रा में सोया हुआ हो, सावधान न हो अथवा किसी भी आपत्ति में क्यों न फँस गया हो, वन में जंगली जानवरों के बीच में भी क्यों न हो, शत्रुओं के बीच युद्ध स्थल पर ही क्यों न हो, गहरी नदी या समुद्र के जल में क्यों न खड़ा हो अथवा अग्नि के बीच ही क्यों न फँस गया हो, पर्वत की चोटी पर ही क्यों न स्थित हो, सर्वत्र उसके द्वारा किए गए पुण्य कर्म ही उसकी रक्षा करते हैं।