नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)
Niti Shataka of Bhartrihari Hindi
महाराज भर्तृहरि द्वारा
स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)
पृष्ठ 178, कुल 194 में से
संदर्भ में पढ़ें१५६ श्रीभर्तृहरिविरचितम्
व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. √मज्ज् + तिप्( लोट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) मज्जतु २. मेरोः शिखरम् मेरुशिखरम् (षष्ठी तत्पुरुष) ३. √शिक्ष + तिप् (लोट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) शिक्षतु ४. √नश् + घञ् = नाशः (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) ५. √भू + ण्यत् = भाव्यम् ६. √नश् + घञ् (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) नाशः ७. किम् + तसिल् = कुतः ८. वणिज् + ष्यञ् = वाणिज्यम् ९. √सेव् + ल्युट् = सेवनम् १०. न भाव्यम् इति अभाव्यम् (नञ् समास) ११. खग + वतुप् = खगवत् १२. √कृ + क्त्वा = कृत्वा १३. मज्जतु + अम्भसि (इकोयणचि) (उ— व्) १४. न + अभाव्यम् (अकः सवर्णे दीर्घः) अ + अ = आ)
वने रणे शत्रुजलाग्निमध्ये,
महार्णवे पर्वतमस्तके वा।
सुप्तं प्रमत्तं विषमस्थितं वा,
रक्षन्ति पुण्यानि पुरा कृतानि॥१९८॥
अन्वय- पुरा कृतानि पुण्यानि सुप्तम्, प्रमत्तम्, विषमस्थितम्, वा (नरम्) वने, रणे, शत्रुजलाग्निमध्ये महार्णवे, पर्वतमस्तके वा रक्षन्ति।
अनुवाद- पूर्व (जन्म) में किए गए पुण्य (कर्म) सोए हुए, असावधान अवस्था वाले अथवा विषम स्थिति वाले (मनुष्य की) वन में, युद्ध में, शत्रु, जल और अग्नि के बीच में, महासमुद्र में अथवा पर्वत की चोटी पर (भी) रक्षा करते हैं।
व्याख्या- मनुष्यों के पूर्वजन्म में किए गए पुण्य कर्मों से ही व्यक्ति के भाग्य का निर्माण होता है और वे पुण्य ही व्यक्ति की किसी भी कठिन परिस्थिति में सर्वत्र रक्षा करते हैं। भले ही व्यक्ति गहरी निद्रा में सोया हुआ हो, सावधान न हो अथवा किसी भी आपत्ति में क्यों न फँस गया हो, वन में जंगली जानवरों के बीच में भी क्यों न हो, शत्रुओं के बीच युद्ध स्थल पर ही क्यों न हो, गहरी नदी या समुद्र के जल में क्यों न खड़ा हो अथवा अग्नि के बीच ही क्यों न फँस गया हो, पर्वत की चोटी पर ही क्यों न स्थित हो, सर्वत्र उसके द्वारा किए गए पुण्य कर्म ही उसकी रक्षा करते हैं।