भारतकोश
नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

Niti Shataka of Bhartrihari Hindi

महाराज भर्तृहरि द्वारा

स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished194 पृष्ठ

पृष्ठ 179, कुल 194 में से

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नीतिशतकम् | १५७

विशेष- १. पुण्य कर्म अप्रत्याशित ढंग से कठिन से कठिन परिस्थिति में भी व्यक्ति की रक्षा करते हैं। इसका प्रतिपादन बहुत सुन्दर ढंग से किया गया है। २. सदैव व्यक्ति को पुण्य कर्म करने चाहिएँ, पाप कर्म नहीं। ३. कर्मफल के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया गया है। ४. उपेन्द्रवज्रा छन्द का प्रयोग हुआ है, लक्षण इस प्रकार है— उपेन्द्रवज्रा जतजास्ततो गौ। ५. अनुप्रास अलंकार का प्रयोग दर्शनीय है।

व्याकरणात्मक टिप्पणी— १. शत्रुश्च जलं च अग्निश्च शत्रुजलाग्नयः तेषां मध्ये शत्रुजलाग्निमध्ये (द्वन्द्व समास) २. महति अर्णवे = महार्णवे (सप्तमी तत्पुरुष) महान् अर्णवः तस्मिन् (कर्मधारय) = महार्णवे ३. पर्वतस्य मस्तके (षष्ठी तत्पुरुष) पर्वतमस्तके ४. √स्वप् + क्त = सुप्तम् (पुल्लिंग, द्वितीया विभक्ति, एकवचन) ५. प्र + √मद् + क्त (पुल्लिंग, द्वितीया विभक्ति, एकवचन) प्रमत्तम् ६. विषम + √स्था + क्त (पुल्लिंग, द्वितीया विभक्ति, एकवचन) विषमास्थितम् ७. वि + सम, विगतो विरुद्धो वा समः (प्रादि समास) ८. √रक्ष् + झि (लट् लकार, प्रथम पुरुष, बहुवचन) रक्षन्ति ९. √कृ + क्त (नपुं., प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) कृतानि १०. महा + अर्णवे (अकः सवर्णे दीर्घः, आ + अ = आ) महार्णवे ११. अर्णांसि सन्ति यस्मिन् = अर्णस् + व (सलोप) = अर्णवः

भीमं वनं भवति तस्य पुरं प्रधानं,
सर्वे¹ जनाः सुजनतामुपयान्ति तस्य।
कृत्स्ना च भूर्भवति सन्निधिरत्नपूर्णा,
यस्यास्ति पूर्वसुकृतं विपुलं नरस्य॥११९॥

अन्वय- यस्य नरस्य विपुलम् पूर्वसुकृतम् अस्ति, तस्य भीमम् वनम् (अपि) प्रधानम् पुरम् भवति, सर्वे जनाः तस्य सुजनताम् उपयान्ति, कृत्स्नाः च भूः सन्निधिरत्नपूर्णा भवति।

अनुवाद- जिस मनुष्य का अत्यधिक पूर्व (जन्म) का पुण्य है, उसके (लिए)


१. सर्वे जनाः (सभी लोग)