नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)
Niti Shataka of Bhartrihari Hindi
महाराज भर्तृहरि द्वारा
स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१५८ श्रीभर्तृहरिविरचितम्
भयंकर जंगल (भी) प्रमुख नगर हो जाता है, सभी लोग उसके (लिए) सज्जन हो जाते हैं और सम्पूर्ण पृथिवी समृद्धि और रत्नों से परिपूर्ण हो जाती है।
व्याख्या- जिस व्यक्ति ने पूर्व जन्म में श्रेष्ठ कर्म किए हैं, ऐसे पुण्यात्मा व्यक्ति के लिए कितना भी भयानक से भयानक वन क्यों न हो, उसके पुण्यों के प्रताप से वह भी उत्तम सुविधासम्पन्न महानगर बन जाता है। उनके प्रभाव से सभी लोग उसके लिए हितकर बन जाते हैं, इतना ही नहीं, अपितु वह जहाँ भी जाता है, समृद्धियाँ, ऐश्वर्य उसके साथ-साथ चलते हैं।
कहने का तात्पर्य यह है कि यदि व्यक्ति अच्छे कार्य करता है, तो उनसे उसे सदैव अच्छे फल की ही प्राप्ति होती है। कहीं भी किसी भी परिस्थिति में उसे कष्ट प्राप्त नहीं होता।
विशेष- १. व्यक्ति के अच्छे कर्मों से पुण्यों की तथा बुरे कर्मों से पापों की प्राप्ति होती है। अतः व्यक्ति को सदैव अच्छे कर्म करने चाहिएँ। २. सुकर्मों के प्रताप से विपरीत परिस्थितियाँ भी अनुकूल हो जाती हैं। काव्यलिंगं अलंकार का प्रयोग हुआ है। ३. वसन्ततिलका छन्द का प्रयोग हुआ है। लक्षण इस प्रकार है— उक्ता वसन्ततिलका तभजाः जगौ गः।
व्याकरणात्मक टिप्पणी- १. सन्तः निधयः सन्निधयः, रत्नैः पूर्णा रत्नपूर्णा सन्निधिरत्नपूर्णा २. √अस् + तिप् (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) = अस्ति ३. उप + √इण् (गतौ) + झि (लट् लकार, प्रथम पुरुष, बहुवचन) उपयान्ति
कर्मायत्तं फलं पुंसां बुद्धिः कर्मानुसारिणी।
तथापि सुधिया भाव्यं सुविचार्यैव कुर्वता॥१२०॥
अन्वय- पुंसाम् फलम् कर्मायत्तम्, बुद्धिः कर्मानुसारिणी, तथापि, सुधिया सुविचार्य एव कुर्वता भाव्यम्।
अनुवाद- मनुष्यों को (प्राप्य) फल कर्म के अधीन है, बुद्धि (भी) कर्म का अनुसरण करने वाली है, फिर भी श्रेष्ठ बुद्धि वाले व्यक्ति को भली प्रकार विचार कर ही करते हुए होना चाहिए।
व्याख्या- इस संसार में व्यक्ति जैसा कर्म करता है उसे वैसे ही फल की प्राप्ति होती है, ठीक इसी प्रकार व्यक्ति जैसे काम करता है, उसकी बुद्धि भी उसी प्रकार का चिंतन करके वैसी ही हो जाती है।
इसलिए बुद्धिमान् व्यक्ति को सदैव भली प्रकार सोचविचार कर ही अर्थात् औचित्य, अनौचित्य आदि का चिंतन करके ही सद्बुद्धिपूर्वक ही कोई कार्य करना चाहिए।