भारतकोश
नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

Niti Shataka of Bhartrihari Hindi

महाराज भर्तृहरि द्वारा

स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished194 पृष्ठ

पृष्ठ 181, कुल 194 में से

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पृष्ठ 181

नीतिशतकम् १५९

विशेष– १. कर्म की महत्ता का प्रतिपादन किया गया है। अतः व्यक्ति को सदा अच्छे कार्य करने चाहिएँ। २. अच्छे काम करने से व्यक्ति की बुद्धि अच्छा विचार करेगी, जिससे उस व्यक्ति का व्यक्तित्व भी अच्छा बनेगा, क्योंकि व्यक्ति जैसा विचार करता है उसका व्यक्तित्व वैसा ही बनता है। ३. अनुष्टुप् छन्द है, लक्षण इस प्रकार है— श्लोके षष्ठं गुरु ज्ञेयं, सर्वत्र लघु पञ्चमम्।
द्विः चतुष्पादयोर्ह्रस्वं, सप्तमं दीर्घमन्ययोः॥

व्याकरणात्मक टिप्पणी–
१. कर्मणाम् आयत्तम्, कर्मायत्तम् (षष्ठी तत्पुरुष)
२. कर्म अनुसरति इति कर्मानुसारिणी
३. अनु + √सृ + णिनि + ङीप् (प्रथमा विभक्ति, एकवचन) अनुसारिणी
४. सु + वि + √चर् + ल्यप् = सुविचार्य
५. भू + ण्यत् (नपुं., प्रथमा विभक्ति, एकवचन) भाव्यम्
६. √कृ + शतृ = कुर्वत् (पुल्लिंग, तृतीया विभक्ति, एकवचन) कुर्वता
७. सुधीः यस्य सः सुधी तेन सुधिया (बहुव्रीहि)
८. तथा + अपि (अकः सवर्णे दीर्घः, आ + अ = आ)
९. सुविचार्य + एव (वृद्धिरेचि— अ + ए = ऐ)

आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः।
नास्त्युद्यमसमो बन्धुः यं^१कृत्वा नावसीदति॥१२१॥

अन्वय– आलस्यम् हि मनुष्याणाम् शरीरस्थः महान् रिपुः, उद्यमसमः बन्धुः न अस्ति, यम् कृत्वा (मनुष्यः) न अवसीदति।

अनुवाद– आलस्य मनुष्यों का शरीर में स्थित सबसे बड़ा शत्रु है। परिश्रम के समान (कोई) बन्धु नहीं है, जिसे करके (मनुष्य) दुःखी नहीं होता है।

व्याख्या– मनुष्य के शरीर में ही स्थित आलस्य उसका सबसे बड़ा शत्रु है। परिश्रम के समान मनुष्य का अन्य कोई श्रेष्ठ बन्धु नहीं है, यदि व्यक्ति परिश्रम करता है तो उसके बाद उसे कार्य की सफलता असफलता दोनों ही स्थितियों में दुःख नहीं होता है।
कहने का तात्पर्य यह है कि सामान्यतः शत्रु हानिकर होता है, किन्तु यदि वह शत्रु उसके अपने घर में ही बैठा हो तब तो बात ही क्या ? वस्तुतः आलस्य मनुष्य के अपने


१. यत् कृत्वा