नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)
Niti Shataka of Bhartrihari Hindi
महाराज भर्तृहरि द्वारा
स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१६० श्रीभर्तृहरिविरचितम्
घर रूपी शरीर में ही बैठा हुआ भयानक शत्रु है, जिससे सर्वाधिक हानि की सम्भावना है।
इसके विपरीत जो व्यक्ति परिश्रमशील है, उनका सबसे अधिक हित करने वाला, उनका अपना भाई उनके पास ही है। यदि व्यक्ति परिश्रम करता है और उसे सफलता नहीं मिलती है। तो मनुष्य को कम से कम यह पश्चाताप तो नहीं होता कि मैंने परिश्रम नहीं किया था।
विशेष- १. मनुष्य को कभी भी आलस्य नहीं करना चाहिए और सदैव परिश्रमशील बनना चाहिए। २. आलस्य को मनुष्य का शत्रु और परिश्रम को मनुष्य का श्रेष्ठ बन्धु बताया गया है। ३. अनुष्टुप् छन्द का प्रयोग हुआ है, लक्षण पूर्ववत्।
व्याकरणात्मक टिप्पणी- १. शरीरे तिष्ठति इति शरीरस्थः २. उद्यमेन समः उद्यमसमः ३. अव + √सद् + तिप् (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) अवसीदति ४. न + अस्ति + उद्यमसमः + बन्धुः (अकः सवर्णे दीर्घः, इकोयणचि, हशिच)