नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)
Niti Shataka of Bhartrihari Hindi
महाराज भर्तृहरि द्वारा
स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)
पृष्ठ 177, कुल 194 में से
संदर्भ में पढ़ें| नीतिशतकम् | १५५ |
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मज्जत्वम्भसि यातु मेरुशिखरं शत्रूञ्जयत्वाहवे,
वाणिज्यं कृषिसेवनादि सकलाः विद्याः कला शिक्षतु।
आकाशं विपुलं प्रयातु खगवत् कृत्वा प्रयत्नं परः,
नाभाव्यं भवतीह कर्मवशतो भाव्यस्य नाशः कुतः।॥११७॥
अन्वय- (मनुष्यः) अम्भसि मज्जतु, मेरु-शिखरम् यातु, आहवे शत्रून् जयतु, वाणिज्यम् कृषि- सेवनादिसकलाः विद्याः कलाः शिक्षतु, परः प्रयत्नम् कृत्वा खगवत् विपुलम् आकाशम् प्रयातु, इह कर्मवशतः अभाव्यम् न भवति, भाव्यस्य नाशः कुतः।
अनुवाद- (मनुष्य) जल में डूब जाए, मेरु की चोटी पर चलां जाए, युद्ध में शत्रुओं को जीत ले, व्यापार, कृषि, सेवा आदि सभी विद्याएँ (एवं) कलाएँ सीख ले, अत्यधिक प्रयत्न करके पक्षी के समान् विस्तृत आकाश में चला जाए, इस (संसार) में कर्म के वशीभूत अनहोनी नहीं होती, (तो फिर) होनी का नाश कैसे (सम्भव है)।
व्याख्या- कर्म फल पर आधारित होनहार होकर रहती है, उसे कोई भी रोकने में समर्थ नहीं है, ठीक इसी प्रकार अनहोनी किसी भी स्थिति में नहीं हो सकती, भले में व्यक्ति जल में समा जाए अथवा सुमेरु पर्वत की चोटी पर भी क्यों न चढ़ जाए। युद्ध स्थल पर शत्रुओं पर प्राप्त विजय भी तभी सम्भव है जब वह होनहार हो, व्यापार, खेती अथवा सेवाकार्य आदि सभी कलाओं में निपुणता क्यों न प्राप्त कर ले। प्रयत्नपूर्वक पक्षी के समान आकाश में भी क्यों न उड़ने लगे, किन्तु इन सब बातों को देखकर इतना अवश्य समझ लेना चाहिए कि होता वही है जो होनहार होती है, जिसे होनी भी कहते हैं।
जो अनहोनी है, उसका किसी भी काल अथवा परिस्थिति में होना सम्भव नहीं होता।
विशेष-
१. यहाँ अभाव्य से अभिप्राय अनहोनी से है तथा भाव्य से अभिप्राय होनी से है।
२. मनुष्य को इस संसार में जो भी सुख अथवा दुःख प्राप्त होता है, वह उसके पूर्वजन्म में किए गए कर्मों द्वारा प्राप्त भवितव्यता के सिद्धान्त के आधार पर ही होता है।
३. मनुष्य कोई भी असम्भव से असम्भव कार्य क्यों न कर ले, किन्तु भाग्य के सामने (जिसका निर्माण उसी द्वारा किए गए पूर्वजन्म के कर्मों से होता है), उसकी एक नहीं चलती। अतः व्यक्ति को सदैव श्रेष्ठ कार्य करने चाहिएँ।
४. शार्दूलविक्रीडित छन्द का प्रयोग हुआ है। लक्षण इस प्रकार है—
सूर्याश्वैर्मसजस्ततः सगुरवः शार्दूलविक्रीडितम्।
५. यमक तथा दीपक अलंकार का प्रयोग दर्शनीय है।