नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)
Niti Shataka of Bhartrihari Hindi
महाराज भर्तृहरि द्वारा
स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)
पृष्ठ 173, कुल 194 में से
संदर्भ में पढ़ेंनीतिशतकम् १५१
किए गए कार्यों का परिणाम मृत्युपर्यन्त कांटे के समान हृदय को जलाने (पीड़ा) वाला होता है।
व्याख्या- बुद्धिमान् व्यक्ति जब भी कोई अच्छा या बुरा कार्य प्रारम्भ करे, उससे पहले वह भलीप्रकार सूक्ष्म-दृष्टि से विचारं करते हुए, इस कार्य का परिणाम अच्छा होगा या बुरा यह जान लेवे।
कई बार व्यक्ति किसी काम को भावावेश में जल्दीबाजी में शुरू तो कर देता है, किन्तु उसके परिणाम उसे अत्यन्त कटु रूप में मिलते हैं, जिनका उसे मरणपर्यन्त अत्यन्त पश्चाताप होता रहता है, इस कार्य के फल उसके हृदय को ठीक उसी प्रकार वेदना पहुँचाते हैं, जिस प्रकार कोई कांटा शरीर के मर्मस्थल हृदय में प्रवेश करने के बाद पीड़ा पहुँचाने वाला होता है, क्योंकि ये दोनों ही वेदनाएँ असह्य होती है। वह व्यक्ति पश्चाताप की अग्नि में जलता रहता है।
विशेष- १. व्यक्ति को किसी भी कार्य को प्रारम्भ करने से पूर्व उसके परिणाम के प्रत्येक पक्ष पर भली-भाँति विचार कर लेना चाहिए।
२. महाकवि भारवि ने भी कहा है— ‘‘सहसा विदधीत न क्रियाम्’’ । (किरातार्जुनीयम्)
३. कई बार व्यक्ति अपने द्वारा किए गए कार्य के परिणाम से इतना दुःखी एवं पीड़ित होता है जैसे उसके हृदय में किसी ने विष से बुझा हुआ नुकीला बाण ही चुभा दिया हो।
४. उपमा और अर्थान्तरन्यास अलंकार का प्रयोग हुआ है।
५. 'हृदय दाहि' से अभिप्राय 'वेदना अतिरेक' की अनुभूति से है।
६. मालिनी छन्द का प्रयोग हुआ है, लक्षण इस प्रकार है—
ननमयययुतेयं मालिनी भोगिलोकैः।
७. 'पण्डित' शब्द का प्रयोग 'बुद्धिमान्' अर्थ की अभिव्यक्ति के लिए हुआ है।
व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. गुण + मतुप् = गुणवत्, न गुणवत् इति अगुणवत् (नञ् समास)
२. √कृ + शतृ (तृतीया विभक्ति, एकवचन, पुल्लिंग) कुर्वता
३. परि + √नम् + क्तिन् (स्त्रीलिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) परिणतिः
४. यत्न + तसिल् = यत्नतः
५. अव + √धृ + ण्यत् + टाप् (प्रथमा विभक्ति, एकवचन) अवधार्या
६. वि + √पच् + घञ् (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) विपाकः
७. वि + √पद् + क्तिन् = विपत्तिः
८. हृदय + √दह् + णिनि (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) हृदयदाही