भारतकोश
नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

Niti Shataka of Bhartrihari Hindi

महाराज भर्तृहरि द्वारा

स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished194 पृष्ठ

पृष्ठ 172, कुल 194 में से

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१५० | श्रीभर्तृहरिविरचितम्

हो जाती हैं, जैसे अत्यन्त उद्दाम काम-क्रीड़ा के कलह में टूटे हुए धागे वाली माला के मोती सर्वत्र विविध दिशाओं में फैल जाते हैं।

आप सब भी इस विषय में गम्भीरता से विचार करें, यह कितनी आश्चर्यजनक बात है।

विशेष- १. पुण्यकर्मों का प्रभाव अद्भुत है। अतः व्यक्ति को सदैव शुभ कर्म ही करने चाहिएँ। २. शुभ कर्मों के नष्ट होने पर सभी भोगसामग्री किस अप्रत्याशित ढंग से बिखर जाती है। उसके लिए माला के मोतियों की कल्पना अत्यन्त सुन्दर बन पड़ी है। ३. उपमालंकार का प्रयोग दर्शनीय है। लक्षण इस प्रकार है— प्रस्फुटं सुन्दरं साम्यमुपमेत्यभिधीयते॥ ४. शार्दूलविक्रीडित छन्द का प्रयोग हुआ है। लक्षण— सूर्याश्वैर्मसजास्ततः सगुरवः शार्दूलविक्रीडितम्। ५. अनुप्रास अलंकार का प्रयोग भी प्रशंसनीय है। लक्षण— अनुप्रासः शब्द साम्यं वैषम्येऽपि स्वरस्य यत्। ६. झटिति पद यहाँ अद्भुत कल्पना की अभिव्यक्ति कर रहा है।

व्याकरणात्मक टिप्पणी- १. वि + √छिद् + क्त (सप्तमी विभक्ति, एकवचन) विच्छिन्ने २. √भ्रंश् + शतृ = भ्रश्यत् ३. विभ्रमैः सहिताः, सविभ्रमाः (अव्ययीभाव) ४. अनु + √भू + णिच् + त (आत्मनेः, प्रथम पुरुष, एकवचनं) अनुभूयते ५. अनु + √सिव् + क्त = अनुस्यूते (सप्तमी विभक्ति, एकवचन) ६. प्र + √इण् (गतौ) तिप् (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) प्रयाति

गुणवदगुणवद् वा कुर्वता कार्यमादौ,
परिणतिरवधार्या यत्नतः पण्डितेन।
अतिरभसकृतानां कर्मणामाविपत्ते-
र्भवति हृदयदाही शल्यतुल्यो विपाकः॥११४॥

अन्वय- गुणवत् अगुणवत् वा कार्यम् कुर्वता पण्डितेन आदौ यत्नतः परिणतिः अवधार्या। अतिरभस-कृतानाम् कर्मणाम् विपाकः आविपत्तेः शल्यतुल्यः हृदय दाहिं भवति।

अनुवाद- अच्छा या बुरा काम करते हुए विद्वान् के द्वारा प्रारम्भ में (ही) यत्नपूर्वक (उसके) परिणाम पर विचार कर लेना चाहिए, (अन्यथा) अत्यन्त जल्दी में