भारतकोश
नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

Niti Shataka of Bhartrihari Hindi

महाराज भर्तृहरि द्वारा

स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished194 पृष्ठ

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नीतिशतकम् | १४९

३. √भुज् + तुमुन् = भोक्तुम्
४. भग + वतुप् = भगवत् (स्त्रीलिंग, द्वितीया विभक्ति, एकवचन) भगवतीम्
५. √कृ + सिप् (लुङ् लकार, मध्यम पुरुष, एकवचन), कृथाः
६. यहाँ मा पद के योग में अकृथाः पद में अ के आगम का निषेध हुआ है।
७. हित + अच् = हित (पुल्लिंग, द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) हितान्
८. अक्ष्णोः प्रति, प्रत्यक्षम् (अव्ययीभाव)
९. सत् + √कृ + इयङ् + टाप् = सत्क्रियाम्
१०. आ + √राध् + णिच् (लोट् लकार, मध्यम पुरुष, एकवचन) आराधय
११. साधून् + च (नश्छव्यप्रशान् )न्– रु– ः– स्– शं
१२. √कृ + तिप् (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) करोति
१३. न मृतम्, इति अमृतम् (नञ् समास)

शुभ्रं सद्म सविभ्रमा युवतय श्वेतातपत्रोज्ज्वला,
लक्ष्मीरीत्यनुभूयते चिरमनुस्यूते शुभे कर्मणि।
विच्छिन्ने नितरामंनगकलह क्रीडात्रुटत्तन्तुकं,
मुक्ताजालमिव प्रयाति झटिति भ्रश्यत् दिशो दृश्यताम्॥११३॥

अन्वय- चिरम् शुभे कर्मणि अनुस्यूते, शुभ्रम् सद्म, सविभ्रमाः युवतयः, श्वेतातपत्रोज्ज्वला लक्ष्मीः इति अनुभूयते, (किन्तु एतेषाम्) विच्छिन्ने नितराम् अनङ्गकलहक्रीडात्रुटत्तन्तुकम् मुक्ताजालम् इव भ्रंश्यत् झटिति दिशः प्रयाति (इति) दृश्यताम्।

अनुवाद- चिरकाल तक शुभ कर्मों का उदय होने पर (मनुष्य के) द्वारा धवल (स्वच्छ) महल, विलासवती स्त्रियाँ, श्वेत छत्र से देदीप्यमान लक्ष्मी इत्यादि का अनुभव किया जाता है। (किन्तु इन कर्मों के) नष्ट होने पर अत्यन्त काम कलह की क्रीडा में टूटे हुए धागे वाले मोतियों के समूह के समान टूटते हुए शीघ्र ही (ये सब विविध) दिशाओं में फैल जाते हैं, (यह) जरा देखिये।

व्याख्या- मनुष्य के द्वारा किए गए पूर्वजन्मों के शुभ कर्म जब–जब उदित होते हैं तो उसे उन पुण्य कर्मों के फलस्वरूप संगमरमर के बने स्वच्छ सुन्दर और शुभ्र महलों में भोग भोगना, सुन्दर एवं अत्यन्त विलासपूर्ण चेष्टाओं से युक्त निपुण स्त्रियों का सांन्निध्य एवं आनन्द तथा असीम ऐश्वर्य की स्वामिनी लक्ष्मी, जिसके ऊपर श्वेत छत्र सदैव देदीप्यमान रहता है, का उपभोग करने का सौभाग्य प्राप्त होता है।
किन्तु जैसे ही ये पुण्य कर्म भोगने के पश्चात् नष्ट हो जाते हैं और दूसरे पुण्य कर्मों के अभाव में ये सब सुख सुविधाएँ, भोग सामग्रियाँ आदि ठीक उसी प्रकार तितर–बितर