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नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

Niti Shataka of Bhartrihari Hindi

महाराज भर्तृहरि द्वारा

स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished194 पृष्ठ

पृष्ठ 170, कुल 194 में से

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पृष्ठ 170

१४८ श्रीभर्तृहरिविरचितम्

अनुवाद- हे सज्जन, जो दुष्टों को सज्जन बनाती है और मूर्खों को विद्वान्, द्वेष करने वालों को हितकारी, परोक्ष को प्रत्यक्ष करती है। हलाहल (विष) को उसी क्षण अमृत बना देती है, मनोवाञ्छित फल को भोगने के लिए, उस देवी सत्क्रिया की आराधना करो। आसक्तियों के कारण बहुत से गुणों पर व्यर्थ श्रद्धा मत करो।

व्याख्या- मनुष्य एक मात्र सत्कार करने की क्रिया में निपुण हो जाता है तो फिर उसे अन्य किसी गुण की आवश्यकता नहीं है। घर आए अतिथि का व्यक्ति को अवश्य सत्कार करना चाहिए, क्योंकि यह दैवी गुणों से सम्पन्न सत्क्रिया मनुष्य को, यदि वह दुष्ट प्रकृति का है तो सज्जन बनाती है। यदि वह मूर्ख है तो उसे विद्वान् बनाती है, अर्थात् ऐसा करने से वह विद्वानों के सम्पर्क में आएगा तथा उसे अनेक विद्वानों का आशीर्वाद तथा मार्गदर्शन प्राप्त होगा।

जो लोग उससे शत्रुता रखते हैं वे उसके मित्र तथा हितेच्छु हो जाएँगे, जिस वस्तु का उसे ज्ञान नहीं है, वह भी जिनकी उसने सेवा की है तथा सत्कार किया है, उनसे प्रत्यक्षवत् ज्ञात हो जायेगी। इस अतिथि सत्कार रूपी देवी में तो वह गुण है कि यह हलाहल जैसे भयंकर विष के समान वातावरण एवं वस्तु को भी अमृत के समान मधुर और हितकारी बना देती है।

इसलिए अन्त में कवि सभी व्यक्तियों को सम्बोधित करते हुए कहता है कि यदि तुम सब अपने मनोवाञ्छित फल की प्राप्ति करना चाहते हो तो इस सत्क्रिया रूपी ऐश्वर्य की देवी की आराधना करो। अत्यधिक लालच एवं आसक्ति के कारण अलग-अलग अन्यान्य गुणों के पीछे भागना व्यर्थ है।

विशेष- १. प्रस्तुत श्लोक में सेवा (अतिथि सत्कार) को सर्वोपरि प्रतिपादित किया है। काव्यलिंग अलंकार का प्रयोग हुआ है।

२. यहाँ साधो शब्द व्यञ्जना से दुष्ट अर्थ की भी अभिव्यक्ति कर रहा है।

३. यदि व्यक्ति में सेवाभाव है तो वह निश्चय ही सभी का मन जीतने में समर्थ है। अतः व्यक्ति को सेवाभावी 'अतिथि देवो भव' की भावना वाला होना चाहिए।

४. शार्दूलविक्रीडित छन्द का प्रयोग हुआ है, लक्षण—

सूर्याश्वैर्मसजस्तताः सगुरवः शार्दूलविक्रीडितम्।

५. हलाहल पुराणों के अनुसार समुद्र मंथन के समय समुद्र से निकला था, जिसके कारण सम्पूर्ण सृष्टि में हाहाकार मच गया था। बाद में देवताओं की प्रार्थना पर शिव ने उसे अपने कण्ठ में धारण किया था।

व्याकरणात्मक टिप्पणी-

१. √द्विष् + णिनि = द्वेषिन् (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) द्वेषिनः
२. √वाञ्छ् + क्त (नपुं., द्वितीया विभक्ति, एकवचन) वाञ्छितम्