नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)
Niti Shataka of Bhartrihari Hindi
महाराज भर्तृहरि द्वारा
स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)
नीतिशतकम् | १४९
३. √भुज् + तुमुन् = भोक्तुम्
४. भग + वतुप् = भगवत् (स्त्रीलिंग, द्वितीया विभक्ति, एकवचन) भगवतीम्
५. √कृ + सिप् (लुङ् लकार, मध्यम पुरुष, एकवचन), कृथाः
६. यहाँ मा पद के योग में अकृथाः पद में अ के आगम का निषेध हुआ है।
७. हित + अच् = हित (पुल्लिंग, द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) हितान्
८. अक्ष्णोः प्रति, प्रत्यक्षम् (अव्ययीभाव)
९. सत् + √कृ + इयङ् + टाप् = सत्क्रियाम्
१०. आ + √राध् + णिच् (लोट् लकार, मध्यम पुरुष, एकवचन) आराधय
११. साधून् + च (नश्छव्यप्रशान् )न्– रु– ः– स्– शं
१२. √कृ + तिप् (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) करोति
१३. न मृतम्, इति अमृतम् (नञ् समास)
शुभ्रं सद्म सविभ्रमा युवतय श्वेतातपत्रोज्ज्वला,
लक्ष्मीरीत्यनुभूयते चिरमनुस्यूते शुभे कर्मणि।
विच्छिन्ने नितरामंनगकलह क्रीडात्रुटत्तन्तुकं,
मुक्ताजालमिव प्रयाति झटिति भ्रश्यत् दिशो दृश्यताम्॥११३॥
अन्वय- चिरम् शुभे कर्मणि अनुस्यूते, शुभ्रम् सद्म, सविभ्रमाः युवतयः, श्वेतातपत्रोज्ज्वला लक्ष्मीः इति अनुभूयते, (किन्तु एतेषाम्) विच्छिन्ने नितराम् अनङ्गकलहक्रीडात्रुटत्तन्तुकम् मुक्ताजालम् इव भ्रंश्यत् झटिति दिशः प्रयाति (इति) दृश्यताम्।
अनुवाद- चिरकाल तक शुभ कर्मों का उदय होने पर (मनुष्य के) द्वारा धवल (स्वच्छ) महल, विलासवती स्त्रियाँ, श्वेत छत्र से देदीप्यमान लक्ष्मी इत्यादि का अनुभव किया जाता है। (किन्तु इन कर्मों के) नष्ट होने पर अत्यन्त काम कलह की क्रीडा में टूटे हुए धागे वाले मोतियों के समूह के समान टूटते हुए शीघ्र ही (ये सब विविध) दिशाओं में फैल जाते हैं, (यह) जरा देखिये।
व्याख्या- मनुष्य के द्वारा किए गए पूर्वजन्मों के शुभ कर्म जब–जब उदित होते हैं तो उसे उन पुण्य कर्मों के फलस्वरूप संगमरमर के बने स्वच्छ सुन्दर और शुभ्र महलों में भोग भोगना, सुन्दर एवं अत्यन्त विलासपूर्ण चेष्टाओं से युक्त निपुण स्त्रियों का सांन्निध्य एवं आनन्द तथा असीम ऐश्वर्य की स्वामिनी लक्ष्मी, जिसके ऊपर श्वेत छत्र सदैव देदीप्यमान रहता है, का उपभोग करने का सौभाग्य प्राप्त होता है।
किन्तु जैसे ही ये पुण्य कर्म भोगने के पश्चात् नष्ट हो जाते हैं और दूसरे पुण्य कर्मों के अभाव में ये सब सुख सुविधाएँ, भोग सामग्रियाँ आदि ठीक उसी प्रकार तितर–बितर
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हो जाती हैं, जैसे अत्यन्त उद्दाम काम-क्रीड़ा के कलह में टूटे हुए धागे वाली माला के मोती सर्वत्र विविध दिशाओं में फैल जाते हैं।
आप सब भी इस विषय में गम्भीरता से विचार करें, यह कितनी आश्चर्यजनक बात है।
विशेष- १. पुण्यकर्मों का प्रभाव अद्भुत है। अतः व्यक्ति को सदैव शुभ कर्म ही करने चाहिएँ। २. शुभ कर्मों के नष्ट होने पर सभी भोगसामग्री किस अप्रत्याशित ढंग से बिखर जाती है। उसके लिए माला के मोतियों की कल्पना अत्यन्त सुन्दर बन पड़ी है। ३. उपमालंकार का प्रयोग दर्शनीय है। लक्षण इस प्रकार है— प्रस्फुटं सुन्दरं साम्यमुपमेत्यभिधीयते॥ ४. शार्दूलविक्रीडित छन्द का प्रयोग हुआ है। लक्षण— सूर्याश्वैर्मसजास्ततः सगुरवः शार्दूलविक्रीडितम्। ५. अनुप्रास अलंकार का प्रयोग भी प्रशंसनीय है। लक्षण— अनुप्रासः शब्द साम्यं वैषम्येऽपि स्वरस्य यत्। ६. झटिति पद यहाँ अद्भुत कल्पना की अभिव्यक्ति कर रहा है।
व्याकरणात्मक टिप्पणी- १. वि + √छिद् + क्त (सप्तमी विभक्ति, एकवचन) विच्छिन्ने २. √भ्रंश् + शतृ = भ्रश्यत् ३. विभ्रमैः सहिताः, सविभ्रमाः (अव्ययीभाव) ४. अनु + √भू + णिच् + त (आत्मनेः, प्रथम पुरुष, एकवचनं) अनुभूयते ५. अनु + √सिव् + क्त = अनुस्यूते (सप्तमी विभक्ति, एकवचन) ६. प्र + √इण् (गतौ) तिप् (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) प्रयाति
गुणवदगुणवद् वा कुर्वता कार्यमादौ,
परिणतिरवधार्या यत्नतः पण्डितेन।
अतिरभसकृतानां कर्मणामाविपत्ते-
र्भवति हृदयदाही शल्यतुल्यो विपाकः॥११४॥
अन्वय- गुणवत् अगुणवत् वा कार्यम् कुर्वता पण्डितेन आदौ यत्नतः परिणतिः अवधार्या। अतिरभस-कृतानाम् कर्मणाम् विपाकः आविपत्तेः शल्यतुल्यः हृदय दाहिं भवति।
अनुवाद- अच्छा या बुरा काम करते हुए विद्वान् के द्वारा प्रारम्भ में (ही) यत्नपूर्वक (उसके) परिणाम पर विचार कर लेना चाहिए, (अन्यथा) अत्यन्त जल्दी में
नीतिशतकम् १५१
किए गए कार्यों का परिणाम मृत्युपर्यन्त कांटे के समान हृदय को जलाने (पीड़ा) वाला होता है।
व्याख्या- बुद्धिमान् व्यक्ति जब भी कोई अच्छा या बुरा कार्य प्रारम्भ करे, उससे पहले वह भलीप्रकार सूक्ष्म-दृष्टि से विचारं करते हुए, इस कार्य का परिणाम अच्छा होगा या बुरा यह जान लेवे।
कई बार व्यक्ति किसी काम को भावावेश में जल्दीबाजी में शुरू तो कर देता है, किन्तु उसके परिणाम उसे अत्यन्त कटु रूप में मिलते हैं, जिनका उसे मरणपर्यन्त अत्यन्त पश्चाताप होता रहता है, इस कार्य के फल उसके हृदय को ठीक उसी प्रकार वेदना पहुँचाते हैं, जिस प्रकार कोई कांटा शरीर के मर्मस्थल हृदय में प्रवेश करने के बाद पीड़ा पहुँचाने वाला होता है, क्योंकि ये दोनों ही वेदनाएँ असह्य होती है। वह व्यक्ति पश्चाताप की अग्नि में जलता रहता है।
विशेष- १. व्यक्ति को किसी भी कार्य को प्रारम्भ करने से पूर्व उसके परिणाम के प्रत्येक पक्ष पर भली-भाँति विचार कर लेना चाहिए।
२. महाकवि भारवि ने भी कहा है— ‘‘सहसा विदधीत न क्रियाम्’’ । (किरातार्जुनीयम्)
३. कई बार व्यक्ति अपने द्वारा किए गए कार्य के परिणाम से इतना दुःखी एवं पीड़ित होता है जैसे उसके हृदय में किसी ने विष से बुझा हुआ नुकीला बाण ही चुभा दिया हो।
४. उपमा और अर्थान्तरन्यास अलंकार का प्रयोग हुआ है।
५. 'हृदय दाहि' से अभिप्राय 'वेदना अतिरेक' की अनुभूति से है।
६. मालिनी छन्द का प्रयोग हुआ है, लक्षण इस प्रकार है—
ननमयययुतेयं मालिनी भोगिलोकैः।
७. 'पण्डित' शब्द का प्रयोग 'बुद्धिमान्' अर्थ की अभिव्यक्ति के लिए हुआ है।
व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. गुण + मतुप् = गुणवत्, न गुणवत् इति अगुणवत् (नञ् समास)
२. √कृ + शतृ (तृतीया विभक्ति, एकवचन, पुल्लिंग) कुर्वता
३. परि + √नम् + क्तिन् (स्त्रीलिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) परिणतिः
४. यत्न + तसिल् = यत्नतः
५. अव + √धृ + ण्यत् + टाप् (प्रथमा विभक्ति, एकवचन) अवधार्या
६. वि + √पच् + घञ् (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) विपाकः
७. वि + √पद् + क्तिन् = विपत्तिः
८. हृदय + √दह् + णिनि (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) हृदयदाही
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९. कर्मणाम् जातम् कर्मजातम् (षष्ठी तत्पुरुष)
१०. √जन् + क्त = जातम्
११. पण्डा + इतच् = पण्डितः
१२. √भू + तिप् (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) भवति
स्थाल्यां वैदूर्यमय्यां पचति च लशुनं चन्दनैरिन्धनाद्यैः,
सौवर्णैर्लाङ्गलाग्रैर्विलिखति वसुधामर्क्रमूलस्य हेतोः।
कृत्वा कर्पूरखण्डान् वृत्तिमिह कुरुते कोद्रवाणां समन्तात्
प्राप्येमां कर्मभूमिं न चरति मनुजो यस्तपो मन्दभाग्यः॥११५॥
अन्वय- यः मन्दभाग्यः मनुजः इमाम् कर्मभूमिम् प्राप्य, इह तपः न चरति, सः वैदूर्यमय्याम् स्थाल्याम् चन्दनैः इन्धनाद्यैः लशुनम् पचति, अर्कमूलस्य हेतोः सौवर्णैः लाङ्गलाग्रैः वसुधाम् विलिखति, कर्पूरखण्डान् कृत्वा कोद्रवाणाम् समन्तात् वृत्तिम् कुरुते।
अनुवाद- जो भाग्यविहीन व्यक्ति इस कर्मभूमि को प्राप्त करके यहाँ तपस्या का आचरण नहीं करता है, वह वैदूर्यमणि से निर्मित बटलोई में चन्दन आदि के इन्धनों के द्वारा लहसुन पकाता है, आक की जड़ से लिए सोने के हल के अग्रभागों के द्वारा पृथिवी को खोदता है, कर्पूर के टुकड़े करके कोदों (अन्न) के चारों ओर घेरा बनाता है।
व्याख्या- सामान्य रूप से मनुष्य-जीवन दुर्लभ है, साथ ही यह जीवन ईश्वर ने इस संसार में कर्म करने के लिए प्रदान किया है, इसलिए यह संसार वस्तुतः कर्मभूमि है, किन्तु यदि कोई व्यक्ति इस कर्मभूमि रूपी संसार में आकर कर्म रूपी कठोर तप का आचरण नहीं करता है, अन्यान्य व्यर्थ के कार्य जैसे सोना, खाना, खेलना आदि कार्यों में ही अपना अमूल्य जीवन व्यतीत करता है, तो उसका यह जीवन पूर्णतया निरर्थक है और ये सब कार्य भी ठीक उसी प्रकार मूर्खतापूर्ण और निरर्थक हैं, जैसे—
कोई व्यक्ति बहुमूल्य वैदूर्यमणिजटित बटलोई में चन्दन आदि बहुमूल्य लकड़ी के ईंधन को जलाकर लहसुन जैसी तुच्छ वस्तु को पकाने का कार्य करे अथवा उसका यह कार्य सोने जैसी मूल्यवान् धातु से बने हल के द्वारा आक की जड़ जैसी तुच्छ वस्तु को प्राप्त करने का प्रयास करने जैसा अविवेकपूर्ण होगा।
उस व्यक्ति का यह कार्य, कोदों नामक खाद्यान्न जो जंगल में स्वतः ही उग आता है, की रक्षा के लिए कर्पूर के टुकड़ों से बाढ़ बनाने जैसा होगा।
अतः मनुष्य को इस संसार रूपी कर्मभूमि में आकर, मानवता की सेवा रूप प्रशंसनीय कार्यों में ही लिप्त रहना चाहिए, अपने समय को व्यर्थ नहीं गंवाना चाहिए।
१. पचति तिलकणानिन्धनेश्चन्दनाद्यैः (चन्दन के ईंधन से तिलकणों को पकाता है) इन्धनोत्रै (इन्धनों के समूह से)
नीतिशतकम् १५३
विशेष- १. व्यक्ति को सांसारिक भोगों में आसक्त रहकर अपने मूल्यवान् जीवन को व्यर्थ नहीं गंवाना चाहिए।
२. संसार में जन्म लेकर भी यदि कोई व्यक्ति श्रेष्ठ कर्म नहीं करता है, तो वह अभागा ही माना जाएगा।
३. स्रग्धरा छन्द का प्रयोग हुआ है, लक्षण इस प्रकार है— म्रभ्नैर्यानां त्रयेण त्रिमुनियतियुता स्रग्धरा कीर्तितियम्॥
४. कोदों अत्यन्त सामान्य प्रकार का अन्न जिसे तपस्वी वनों में प्रयोग करते हैं, क्योंकि यह वहाँ स्वतः उग आता है।
५. दीपक तथा काव्यलिंग अलंकार का प्रयोग हुआ है।
व्याकरणात्मक टिप्पणी- १. मन्दं भाग्यं यस्य सः, मन्दभाग्यः (बहुव्रीहि) २. कर्मणः भूमिः, कर्मभूमिः, तम् कर्मभूमिम् (षष्ठी तत्पुरुष) ३. √चर् + तिप् (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) चरति ४. स्थाली + ङि (सप्तमी विभक्ति, एकवचन) स्थाल्याम् ५. √पच् + तिप् (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) पचति ६. सुवर्ण + अण् = सौवर्णम् (नपुं., तृतीया विभक्ति, बहुवचन) सौवर्णैः ७. लाङ्गलानाम् अग्रम् तैः (षष्ठी तत्पुरुष) लाङ्गलाग्रैः ८. अर्कस्य मूलम्, अर्कमूलम्, तस्य अर्कमूलस्य (षष्ठी तत्पुरुष) ९. वि + √लिख् + तिप् = विलिखति (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) १०. कर्पूरस्य खण्डान् = कर्पूरखण्डान् (षष्ठी तत्पुरुष) ११. √वृ + क्तिन् (स्त्रीलिंग, द्वितीया विभक्ति, एकवचन) वृत्तिः
नैवाकृतिः फलति नैव कुलं न शीलं, विद्याऽपि नैव न च यत्नकृताऽपि सेवा। भाग्यानि पूर्वतपसा खलु सञ्चितानि, काले फलन्ति पुरुषस्य यथैव वृक्षाः॥११६॥
अन्वय- न एव आकृतिः फलति, न एव कुलम्, न शीलम्, विद्या अपि फलति न एव, यत्नकृता सेवा अपि न (फलति), च यथा वृक्षाः (तथा) एव पुरुषस्य पूर्वतपसा सञ्चितानि भाग्यानि खलु काले फलन्ति।
अनुवाद- न ही (सुन्दर) आकृति फलती है, न ही कुल, न शील। विद्या भी (फलवती) नहीं होती है और यत्नपूर्वक की गई सेवा भी नहीं (फलती है), (अपितु) जिस प्रकार वृक्ष (फलवान् होते हैं), (वैसे) ही पुरुष के पूर्व (जन्म) के तप के द्वारा सञ्चित भाग्य ही समय (आने) पर फलीभूत होते हैं।
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व्याख्या- मनुष्य कितना ही सुन्दर क्यों न हो, कितने ही उच्च वंश में उसका जन्म क्यों न हुआ हो। कितना ही सदाचारी क्यों न हो, उसने कितने भी शास्त्रों का अध्ययन क्यों न किया हो अथवा कितने भी समर्पण भाव से तन्मयतापूर्वक दूसरों की सेवा क्यों न की हो, ये सब बातें व्यक्ति को शुभ फल प्रदान करने में समर्थ नहीं हैं अर्थात् उक्त किसी भी कारण से लाभ एवं सुख की प्राप्ति ही हो यह अनिवार्य नहीं है।
अपितु व्यक्ति ने पूर्वजन्म में जिन कर्मों को तपस्यापूर्वक करते हुए अर्थात् शारीरिक कष्टों को सहन करते हुए इकट्ठा किया है, ऐसे पुण्य कर्मों द्वारा निर्मित भाग्य ही ठीक उसी प्रकार फल देने वाला होता है, जिस प्रकार उपयुक्त ऋतुकाल आने पर सभी वृक्ष फल देने वाले होते हैं।
कहने का तात्पर्य है कि पूर्वजन्म में किए गए पुण्य कर्मों से ही व्यक्ति का भाग्य निर्माण होता है और वह भाग्य ही उपयुक्त समय पर व्यक्ति को सुख, उन्नति, यश, लाभादि प्रदान करने वाला होता है।
विशेष-
१. मनुष्य के भाग्य का निर्माण भी पूर्वजन्म के कर्मों के द्वारा ही होता है।
२. मनुष्य की उन्नति, सुखादि में कुल, शील, विद्या, सेवा और सुन्दर आकृति आदि का कोई महत्त्व नहीं है।
३. कर्मफल के सिद्धान्त को वृक्ष का दृष्टान्त देकर समझाया गया है। अतः दृष्टान्त अलंकार—
दृष्टान्तस्तु सधर्मस्य वस्तुनः प्रतिबिम्बनम्।
४. समय से पूर्व किसी भी कार्य का होना सम्भव नहीं है।
५. वसन्ततिलका छन्द का प्रयोग हुआ है। लक्षण इस प्रकार है—
उक्ता वसन्ततिलका तभजा जगौ गः।
व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. आ + √कृ + क्तिन् (स्त्रीलिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) आकृतिः
२. यत्नेन कृता, यत्नकृता (तृतीया तत्पुरुष) √यत् + नङ् = यत्न
३. पूर्वेण तपसा पूर्वतपसा (तृतीया तत्पुरुष)
४. सम् + √चि + क्त (नपुं., प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) संचितानि
५. √फल् + झि (लट् लकार, प्रथम पुरुष, बहुवचन) फलन्ति
६. √विद् + क्यप् + टाप् = विद्या
७. न + एव + आकृतिः (वृद्धिरेचि, अकः सवर्णे दीर्घः)
८. यथा + एव= यथैव (वृद्धिरेचि) (आ + ए = ऐ)
९. √व्रंश्च् + क्सु = वृक्षः
१०. √भज् + ण्यत् = भाग्यम् (नपुं., प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) भाग्यानि
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मज्जत्वम्भसि यातु मेरुशिखरं शत्रूञ्जयत्वाहवे,
वाणिज्यं कृषिसेवनादि सकलाः विद्याः कला शिक्षतु।
आकाशं विपुलं प्रयातु खगवत् कृत्वा प्रयत्नं परः,
नाभाव्यं भवतीह कर्मवशतो भाव्यस्य नाशः कुतः।॥११७॥
अन्वय- (मनुष्यः) अम्भसि मज्जतु, मेरु-शिखरम् यातु, आहवे शत्रून् जयतु, वाणिज्यम् कृषि- सेवनादिसकलाः विद्याः कलाः शिक्षतु, परः प्रयत्नम् कृत्वा खगवत् विपुलम् आकाशम् प्रयातु, इह कर्मवशतः अभाव्यम् न भवति, भाव्यस्य नाशः कुतः।
अनुवाद- (मनुष्य) जल में डूब जाए, मेरु की चोटी पर चलां जाए, युद्ध में शत्रुओं को जीत ले, व्यापार, कृषि, सेवा आदि सभी विद्याएँ (एवं) कलाएँ सीख ले, अत्यधिक प्रयत्न करके पक्षी के समान् विस्तृत आकाश में चला जाए, इस (संसार) में कर्म के वशीभूत अनहोनी नहीं होती, (तो फिर) होनी का नाश कैसे (सम्भव है)।
व्याख्या- कर्म फल पर आधारित होनहार होकर रहती है, उसे कोई भी रोकने में समर्थ नहीं है, ठीक इसी प्रकार अनहोनी किसी भी स्थिति में नहीं हो सकती, भले में व्यक्ति जल में समा जाए अथवा सुमेरु पर्वत की चोटी पर भी क्यों न चढ़ जाए। युद्ध स्थल पर शत्रुओं पर प्राप्त विजय भी तभी सम्भव है जब वह होनहार हो, व्यापार, खेती अथवा सेवाकार्य आदि सभी कलाओं में निपुणता क्यों न प्राप्त कर ले। प्रयत्नपूर्वक पक्षी के समान आकाश में भी क्यों न उड़ने लगे, किन्तु इन सब बातों को देखकर इतना अवश्य समझ लेना चाहिए कि होता वही है जो होनहार होती है, जिसे होनी भी कहते हैं।
जो अनहोनी है, उसका किसी भी काल अथवा परिस्थिति में होना सम्भव नहीं होता।
विशेष-
१. यहाँ अभाव्य से अभिप्राय अनहोनी से है तथा भाव्य से अभिप्राय होनी से है।
२. मनुष्य को इस संसार में जो भी सुख अथवा दुःख प्राप्त होता है, वह उसके पूर्वजन्म में किए गए कर्मों द्वारा प्राप्त भवितव्यता के सिद्धान्त के आधार पर ही होता है।
३. मनुष्य कोई भी असम्भव से असम्भव कार्य क्यों न कर ले, किन्तु भाग्य के सामने (जिसका निर्माण उसी द्वारा किए गए पूर्वजन्म के कर्मों से होता है), उसकी एक नहीं चलती। अतः व्यक्ति को सदैव श्रेष्ठ कार्य करने चाहिएँ।
४. शार्दूलविक्रीडित छन्द का प्रयोग हुआ है। लक्षण इस प्रकार है—
सूर्याश्वैर्मसजस्ततः सगुरवः शार्दूलविक्रीडितम्।
५. यमक तथा दीपक अलंकार का प्रयोग दर्शनीय है।
१५६ श्रीभर्तृहरिविरचितम्
व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. √मज्ज् + तिप्( लोट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) मज्जतु २. मेरोः शिखरम् मेरुशिखरम् (षष्ठी तत्पुरुष) ३. √शिक्ष + तिप् (लोट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) शिक्षतु ४. √नश् + घञ् = नाशः (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) ५. √भू + ण्यत् = भाव्यम् ६. √नश् + घञ् (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) नाशः ७. किम् + तसिल् = कुतः ८. वणिज् + ष्यञ् = वाणिज्यम् ९. √सेव् + ल्युट् = सेवनम् १०. न भाव्यम् इति अभाव्यम् (नञ् समास) ११. खग + वतुप् = खगवत् १२. √कृ + क्त्वा = कृत्वा १३. मज्जतु + अम्भसि (इकोयणचि) (उ— व्) १४. न + अभाव्यम् (अकः सवर्णे दीर्घः) अ + अ = आ)
वने रणे शत्रुजलाग्निमध्ये,
महार्णवे पर्वतमस्तके वा।
सुप्तं प्रमत्तं विषमस्थितं वा,
रक्षन्ति पुण्यानि पुरा कृतानि॥१९८॥
अन्वय- पुरा कृतानि पुण्यानि सुप्तम्, प्रमत्तम्, विषमस्थितम्, वा (नरम्) वने, रणे, शत्रुजलाग्निमध्ये महार्णवे, पर्वतमस्तके वा रक्षन्ति।
अनुवाद- पूर्व (जन्म) में किए गए पुण्य (कर्म) सोए हुए, असावधान अवस्था वाले अथवा विषम स्थिति वाले (मनुष्य की) वन में, युद्ध में, शत्रु, जल और अग्नि के बीच में, महासमुद्र में अथवा पर्वत की चोटी पर (भी) रक्षा करते हैं।
व्याख्या- मनुष्यों के पूर्वजन्म में किए गए पुण्य कर्मों से ही व्यक्ति के भाग्य का निर्माण होता है और वे पुण्य ही व्यक्ति की किसी भी कठिन परिस्थिति में सर्वत्र रक्षा करते हैं। भले ही व्यक्ति गहरी निद्रा में सोया हुआ हो, सावधान न हो अथवा किसी भी आपत्ति में क्यों न फँस गया हो, वन में जंगली जानवरों के बीच में भी क्यों न हो, शत्रुओं के बीच युद्ध स्थल पर ही क्यों न हो, गहरी नदी या समुद्र के जल में क्यों न खड़ा हो अथवा अग्नि के बीच ही क्यों न फँस गया हो, पर्वत की चोटी पर ही क्यों न स्थित हो, सर्वत्र उसके द्वारा किए गए पुण्य कर्म ही उसकी रक्षा करते हैं।
नीतिशतकम् | १५७
विशेष- १. पुण्य कर्म अप्रत्याशित ढंग से कठिन से कठिन परिस्थिति में भी व्यक्ति की रक्षा करते हैं। इसका प्रतिपादन बहुत सुन्दर ढंग से किया गया है। २. सदैव व्यक्ति को पुण्य कर्म करने चाहिएँ, पाप कर्म नहीं। ३. कर्मफल के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया गया है। ४. उपेन्द्रवज्रा छन्द का प्रयोग हुआ है, लक्षण इस प्रकार है— उपेन्द्रवज्रा जतजास्ततो गौ। ५. अनुप्रास अलंकार का प्रयोग दर्शनीय है।
व्याकरणात्मक टिप्पणी— १. शत्रुश्च जलं च अग्निश्च शत्रुजलाग्नयः तेषां मध्ये शत्रुजलाग्निमध्ये (द्वन्द्व समास) २. महति अर्णवे = महार्णवे (सप्तमी तत्पुरुष) महान् अर्णवः तस्मिन् (कर्मधारय) = महार्णवे ३. पर्वतस्य मस्तके (षष्ठी तत्पुरुष) पर्वतमस्तके ४. √स्वप् + क्त = सुप्तम् (पुल्लिंग, द्वितीया विभक्ति, एकवचन) ५. प्र + √मद् + क्त (पुल्लिंग, द्वितीया विभक्ति, एकवचन) प्रमत्तम् ६. विषम + √स्था + क्त (पुल्लिंग, द्वितीया विभक्ति, एकवचन) विषमास्थितम् ७. वि + सम, विगतो विरुद्धो वा समः (प्रादि समास) ८. √रक्ष् + झि (लट् लकार, प्रथम पुरुष, बहुवचन) रक्षन्ति ९. √कृ + क्त (नपुं., प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) कृतानि १०. महा + अर्णवे (अकः सवर्णे दीर्घः, आ + अ = आ) महार्णवे ११. अर्णांसि सन्ति यस्मिन् = अर्णस् + व (सलोप) = अर्णवः
भीमं वनं भवति तस्य पुरं प्रधानं,
सर्वे¹ जनाः सुजनतामुपयान्ति तस्य।
कृत्स्ना च भूर्भवति सन्निधिरत्नपूर्णा,
यस्यास्ति पूर्वसुकृतं विपुलं नरस्य॥११९॥
अन्वय- यस्य नरस्य विपुलम् पूर्वसुकृतम् अस्ति, तस्य भीमम् वनम् (अपि) प्रधानम् पुरम् भवति, सर्वे जनाः तस्य सुजनताम् उपयान्ति, कृत्स्नाः च भूः सन्निधिरत्नपूर्णा भवति।
अनुवाद- जिस मनुष्य का अत्यधिक पूर्व (जन्म) का पुण्य है, उसके (लिए)
१. सर्वे जनाः (सभी लोग)
१५८ श्रीभर्तृहरिविरचितम्
भयंकर जंगल (भी) प्रमुख नगर हो जाता है, सभी लोग उसके (लिए) सज्जन हो जाते हैं और सम्पूर्ण पृथिवी समृद्धि और रत्नों से परिपूर्ण हो जाती है।
व्याख्या- जिस व्यक्ति ने पूर्व जन्म में श्रेष्ठ कर्म किए हैं, ऐसे पुण्यात्मा व्यक्ति के लिए कितना भी भयानक से भयानक वन क्यों न हो, उसके पुण्यों के प्रताप से वह भी उत्तम सुविधासम्पन्न महानगर बन जाता है। उनके प्रभाव से सभी लोग उसके लिए हितकर बन जाते हैं, इतना ही नहीं, अपितु वह जहाँ भी जाता है, समृद्धियाँ, ऐश्वर्य उसके साथ-साथ चलते हैं।
कहने का तात्पर्य यह है कि यदि व्यक्ति अच्छे कार्य करता है, तो उनसे उसे सदैव अच्छे फल की ही प्राप्ति होती है। कहीं भी किसी भी परिस्थिति में उसे कष्ट प्राप्त नहीं होता।
विशेष- १. व्यक्ति के अच्छे कर्मों से पुण्यों की तथा बुरे कर्मों से पापों की प्राप्ति होती है। अतः व्यक्ति को सदैव अच्छे कर्म करने चाहिएँ। २. सुकर्मों के प्रताप से विपरीत परिस्थितियाँ भी अनुकूल हो जाती हैं। काव्यलिंगं अलंकार का प्रयोग हुआ है। ३. वसन्ततिलका छन्द का प्रयोग हुआ है। लक्षण इस प्रकार है— उक्ता वसन्ततिलका तभजाः जगौ गः।
व्याकरणात्मक टिप्पणी- १. सन्तः निधयः सन्निधयः, रत्नैः पूर्णा रत्नपूर्णा सन्निधिरत्नपूर्णा २. √अस् + तिप् (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) = अस्ति ३. उप + √इण् (गतौ) + झि (लट् लकार, प्रथम पुरुष, बहुवचन) उपयान्ति
कर्मायत्तं फलं पुंसां बुद्धिः कर्मानुसारिणी।
तथापि सुधिया भाव्यं सुविचार्यैव कुर्वता॥१२०॥
अन्वय- पुंसाम् फलम् कर्मायत्तम्, बुद्धिः कर्मानुसारिणी, तथापि, सुधिया सुविचार्य एव कुर्वता भाव्यम्।
अनुवाद- मनुष्यों को (प्राप्य) फल कर्म के अधीन है, बुद्धि (भी) कर्म का अनुसरण करने वाली है, फिर भी श्रेष्ठ बुद्धि वाले व्यक्ति को भली प्रकार विचार कर ही करते हुए होना चाहिए।
व्याख्या- इस संसार में व्यक्ति जैसा कर्म करता है उसे वैसे ही फल की प्राप्ति होती है, ठीक इसी प्रकार व्यक्ति जैसे काम करता है, उसकी बुद्धि भी उसी प्रकार का चिंतन करके वैसी ही हो जाती है।
इसलिए बुद्धिमान् व्यक्ति को सदैव भली प्रकार सोचविचार कर ही अर्थात् औचित्य, अनौचित्य आदि का चिंतन करके ही सद्बुद्धिपूर्वक ही कोई कार्य करना चाहिए।
श्लोके षष्ठं गुरु ज्ञेयं, सर्वत्र लघु पञ्चमम्।
नीतिशतकम् १५९
विशेष– १. कर्म की महत्ता का प्रतिपादन किया गया है। अतः व्यक्ति को सदा अच्छे कार्य करने चाहिएँ।
२. अच्छे काम करने से व्यक्ति की बुद्धि अच्छा विचार करेगी, जिससे उस व्यक्ति का व्यक्तित्व भी अच्छा बनेगा, क्योंकि व्यक्ति जैसा विचार करता है उसका व्यक्तित्व वैसा ही बनता है।
३. अनुष्टुप् छन्द है, लक्षण इस प्रकार है—
श्लोके षष्ठं गुरु ज्ञेयं, सर्वत्र लघु पञ्चमम्।
द्विः चतुष्पादयोर्ह्रस्वं, सप्तमं दीर्घमन्ययोः॥
व्याकरणात्मक टिप्पणी–
१. कर्मणाम् आयत्तम्, कर्मायत्तम् (षष्ठी तत्पुरुष)
२. कर्म अनुसरति इति कर्मानुसारिणी
३. अनु + √सृ + णिनि + ङीप् (प्रथमा विभक्ति, एकवचन) अनुसारिणी
४. सु + वि + √चर् + ल्यप् = सुविचार्य
५. भू + ण्यत् (नपुं., प्रथमा विभक्ति, एकवचन) भाव्यम्
६. √कृ + शतृ = कुर्वत् (पुल्लिंग, तृतीया विभक्ति, एकवचन) कुर्वता
७. सुधीः यस्य सः सुधी तेन सुधिया (बहुव्रीहि)
८. तथा + अपि (अकः सवर्णे दीर्घः, आ + अ = आ)
९. सुविचार्य + एव (वृद्धिरेचि— अ + ए = ऐ)
आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः।
नास्त्युद्यमसमो बन्धुः यं^१कृत्वा नावसीदति॥१२१॥
अन्वय– आलस्यम् हि मनुष्याणाम् शरीरस्थः महान् रिपुः, उद्यमसमः बन्धुः न अस्ति, यम् कृत्वा (मनुष्यः) न अवसीदति।
अनुवाद– आलस्य मनुष्यों का शरीर में स्थित सबसे बड़ा शत्रु है। परिश्रम के समान (कोई) बन्धु नहीं है, जिसे करके (मनुष्य) दुःखी नहीं होता है।
व्याख्या– मनुष्य के शरीर में ही स्थित आलस्य उसका सबसे बड़ा शत्रु है। परिश्रम के समान मनुष्य का अन्य कोई श्रेष्ठ बन्धु नहीं है, यदि व्यक्ति परिश्रम करता है तो उसके बाद उसे कार्य की सफलता असफलता दोनों ही स्थितियों में दुःख नहीं होता है।
कहने का तात्पर्य यह है कि सामान्यतः शत्रु हानिकर होता है, किन्तु यदि वह शत्रु उसके अपने घर में ही बैठा हो तब तो बात ही क्या ? वस्तुतः आलस्य मनुष्य के अपने
१. यत् कृत्वा
१६० श्रीभर्तृहरिविरचितम्
घर रूपी शरीर में ही बैठा हुआ भयानक शत्रु है, जिससे सर्वाधिक हानि की सम्भावना है।
इसके विपरीत जो व्यक्ति परिश्रमशील है, उनका सबसे अधिक हित करने वाला, उनका अपना भाई उनके पास ही है। यदि व्यक्ति परिश्रम करता है और उसे सफलता नहीं मिलती है। तो मनुष्य को कम से कम यह पश्चाताप तो नहीं होता कि मैंने परिश्रम नहीं किया था।
विशेष- १. मनुष्य को कभी भी आलस्य नहीं करना चाहिए और सदैव परिश्रमशील बनना चाहिए। २. आलस्य को मनुष्य का शत्रु और परिश्रम को मनुष्य का श्रेष्ठ बन्धु बताया गया है। ३. अनुष्टुप् छन्द का प्रयोग हुआ है, लक्षण पूर्ववत्।
व्याकरणात्मक टिप्पणी- १. शरीरे तिष्ठति इति शरीरस्थः २. उद्यमेन समः उद्यमसमः ३. अव + √सद् + तिप् (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) अवसीदति ४. न + अस्ति + उद्यमसमः + बन्धुः (अकः सवर्णे दीर्घः, इकोयणचि, हशिच)
नीतिशतकम् १६१
परिशिष्ट
(क) संस्कृत व्याख्या
१. आद्यन्त:-
शिरः...........................................................................शतमुखः।
२. संदर्भ:-
प्रस्तुतभावपूर्णः श्लोकः महाकविभर्तृहरिविरचितात् 'नीतिशतकम्' नाम गीतिकाव्यात् उद्धृतोऽस्ति।
३. प्रसङ्ग:-
श्लोकेऽस्मिन् महाकविना विवेकभ्रष्टानां पतनं अनेकप्रकारेण भवति, इति सोदाहरणं प्रतिपादितम्।
४. अन्वय:-
इयम् गंगा स्वर्गात् शार्वम् शिरः, पशुपति शिरस्तः क्षितिधरम्, उत्तुंगात् महीध्रात् अवनिम्, अवनेः च अपि जलधिम् (एवम् क्रमशः) अधः अधः स्तोकम् पदम् उपगता अथवा विवेकभ्रष्टानाम् विनिपातः शतमुखः भवति।
५. संस्कृत व्याख्या-
संसारेऽस्मिन् यदा मनुष्यः विवेकभ्रष्टः भवति तस्य पतनस्य तदानीं नैव काऽपि सीमा भवति विषयेऽस्मिन् गंगायाः उदाहरणमस्ति। एषा आरम्भे स्वर्गे वसति स्म सुखपूर्वकम्, किन्तु यदा एषा विवेकरहिता सञ्जाता तदा अस्याः पतनं कैलाशपर्वते विराजमानस्य शिवस्य शिरसि अभवत्, तस्मात् अपि स्थानात् हिमालये, किन्तु तत्रापि अस्याः स्थैर्यं सम्भवं न जातम्, तस्मात् उत्तुंगात्, स्थानात् सा पृथिव्यां पतिता। पुनः सा निम्नतमे स्थाने समुद्रे पतिता। यत्र सा अस्तित्वहीना सञ्जाता।
एवम् यः जनः विवेकरहितः भवति तस्य एतादृशी शोचनीया स्थितिरेव भवति। अतः जनः कदापि स्व विवेकं न परित्यजेत्।
७. विशेष:-
१. अस्य श्लोकस्य भाषा अतिसरला, भावबोधगम्या च वर्तते।
२. अत्र गंगायाः उपमा विवेकरहितेन जनेन सह प्रदत्ता।
३. शिखरिणी छन्दोऽत्र वर्तते, लक्षणमिदम्—
१६२ श्रीभर्तृहरिविरचितम्
रसैः रुद्रैश्छिन्ना यमनसभलागः शिखरिणी।
७. व्याकरणात्मक टिप्पणयः- १. शतम् मुखानि यस्य सः, शतमुखः (बहुव्रीहि) २. वि + नि + पत् + घञ् (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) • २. उप + √गम् + क्त + टाप् = उपगता ३. विवेकात् भ्रष्टः, विवेकभ्रष्टः, तेषां विवेकभ्रष्टानां (पञ्चमी तत्पुरुष)
(ख) हिन्दी व्याख्या
१. आद्यन्त-
यद्धात्रा....................................................................जलम्।
२. संदर्भ-
प्रस्तुत श्लोक संस्कृत साहित्याकाश के देदीप्यमान नक्षत्र महाकवि भर्तृहरि द्वारा विरचित गीतिकाव्यों में अग्रणी ‘नीतिशतकम्’ नामक काव्य से अवतरित है।
३. प्रसङ्ग-
व्यक्ति को कभी भी धनवानों के सामने दीनहीन नहीं बनना चाहिए, अपितु धैर्य को धारण करना चाहिए। इसी बात को सोदाहरण समझाते हुए कवि कहता है कि—
शेष व्याख्या श्लोक संख्या के अनुसार अन्वय हिन्दी अनुवाद, व्याख्या, विशेष और व्याकरणात्मक टिप्पणी आदि शीर्षकों के अन्तर्गत करनी चाहिए।
इस विषय में एक बात विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि छात्रों को व्याख्या में विस्तार उतना ही देना चाहिए जितने विस्तार की उन्हें समय अनुमति प्रदान करे। यदि उन्हें ऐसा प्रतीत हो कि समय कम है तो उन्हें हिन्दी अनुवाद लिखने की आवश्यकता नहीं है। विशेष और व्याकरणात्मक टिप्पणियों में भी अपेक्षाकृत कम लिखा जा सकता है। ध्यान रहे परीक्षा में निर्धारित समय के अन्तर्गत सम्पूर्ण प्रश्न-पत्र का हल करना अधिक महत्त्वपूर्ण है।
(ग) विद्वत्पद्धति का सारांश
नीतिशतकम् में कवि ने एक ही विषय को लेकर कुछ श्लोकों की संरचना की है तथा उन्हें एक साथ संग्रह कर दिया गया। ये संग्रहित श्लोक ही तत्तत् पद्धति के नाम से कहे गये हैं। यहाँ हम विद्वत्पद्धति का संक्षेप में उल्लेख कर रहे हैं। छात्रों को इसी प्रकार अन्य पद्धतियों का सारांश लिखने का भी अभ्यास करना चाहिए।
| नीतिशतकम् | १६३ |
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जिस राजा के राज्य में शिष्यों को देने योग्य शास्त्रों से सम्पन्न, उत्कृष्ट काव्य निर्माण में निपुण, विद्वान्, कवि निर्धन अवस्था में रहते हैं। यह तो उस राजा की ही मूर्खता कही जाएगी, क्योंकि कवि तो बिना धन के भी ऐश्वर्यसम्पन्न होते हैं। कवि जैसी मणियों को न पहचानने के लिए राजा जैसे जौहरी ही दोषी माने जाने चाहिएँ।
ऐश्वर्य सम्पन्न लोगों को विद्वानों का आदर करना चाहिए, क्योंकि उनके पास तो विद्या नामक अद्भुत गुप्त धन है और इस धन की विशेषता है कि यह सदा कल्याणों को ही देता है और साथ ही अधिकाधिक दान देने पर यह बढ़ता ही है।
कवि ने परिष्कृत वाणी को ही सर्वश्रेष्ठ आभूषण बताया है—
केयूराणि न भूषयन्ति पुरुषं हारा न चन्द्रोज्ज्वलाः,
न स्नानं न विलेपनं न कुसुमं नालंकृता मूर्धजाः।
वाण्येका समलंकरोति पुरुषं या संस्कृता धार्यते,
क्षीयन्ते खलु भूषणानि सततं वाग्भूषणं भूषणम्॥२०॥
विद्याविहीन व्यक्ति तो पशु ही होता है। इसलिए व्यक्ति को सदैव विद्या अध्ययन करना चाहिए। विद्या में अनेक विशेषताएँ हैं। यह मनुष्य का छिपा हुआ खजाना है। यह यश, सुख और भोगों को देने वाली है। राजा भी विद्या की ही पूजा करते हैं धन की नहीं।
इसी प्रकार यदि व्यक्ति में श्रेष्ठ कविता बनाने की सामर्थ्य है तो उसके लिए राज्य भी बेकार है।
सुकविता यद्यस्ति राज्येन किम्?
मनुष्य को यदि इस संसार में सफलता प्राप्त करनी है तो उसे कुछ बातों का विशेष ध्यान देना चाहिए जैसे— दुष्टों से सदैव दुष्टतापूर्वक, सेवकों के साथ दयापूर्वक, विद्वानों के साथ सरलतापूर्वक तथा बंधुजनों के प्रति उदारतापूर्वक व्यवहार करना चाहिए।
इसी प्रकार व्यक्ति को सदैव अच्छे लोगों की संगति ही करनी चाहिए, क्योंकि सत्संगति से व्यक्ति सत्य बोलना सीखता है, पापों से दूर रहता है तथा उसका सर्वत्र यश प्रसारित होता है—
जाड्यं धियो हरति सिञ्चति वाचि सत्यं
मानोन्नतिं दिशति पापमपाकरोति।
चेतः प्रसादयति दिक्षु तनोति कीर्तिं
सत्सङ्गतिः कथय किं न करोति पुंसाम्॥२४॥
| १६४ | श्रीभर्तृहरिविरचितम् |
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जिन लोगों के पास विद्या नहीं है, दान नहीं करते, तपस्या का आचरण नहीं करते उन्हें कवि ने मनुष्य रूप में विचरण करते हुए पशु ही बर्ताया है। ठीक इसी प्रकार साहित्य, संगीत और कला से रहित व्यक्ति भी पूँछ और सींग से रहित साक्षात् पशु ही है—
साहित्य-संगीत-कला-विहीनः,
साक्षात् पशुः पुच्छविषाणहीनः।
तृणं न खादन्नपि जीवमानः,
तद् भागधेयं परमं पशूनाम्॥१३॥
इसी प्रकार राजाओं को कभी भी विद्वानों का अपमान नहीं करना चाहिए। लक्ष्मी तो ऐसे पण्डितों के लिए तिनके का समान है। राजा यदि क्रोधित भी होता है तो अधिक से अधिक विद्वान् को अपने राज्य से निष्कासित कर सकता है, किन्तु उसकी योग्यता, क्षमता, विद्वत्ता आदि को तो किसी भी स्थिति में उससे नहीं ले सकता है। रससिद्ध कवियों के यशः शरीर में वृद्धावस्था और मरणादि से उत्पन्न भय नहीं होता है। अतः वे श्लाघनीय हैं।
(घ) शब्दार्थ
अंकितः = चिह्नित, अकरुणत्वम् = निर्दयता, अकारणविग्रहः = बिना कारण झगड़ा, अखिलाः = सम्पूर्ण, अज्ञः = न जानने वाला, अज्ञतायाः = मूर्खता का, अतिरभसा = अत्यन्त वेग से, अत्ति = खाता है, अथ = इसके पश्चात्, और अधः = नीचे, अधिगतपरमार्थान् = प्राप्त कर लिया है परमतत्त्व को जिसने, अनक्षरम् = विद्या रहित, अनवच्छिन्न = आच्छादित न किए जा सकने वाले, अनवद्या = प्रशंसनीय, अन्वेक्षणात् = बिना देखभाल से, अनिशम् = निरन्तर, अनुत्सेकः = अभिमान न होना, अनुपहतविधिः = जिसके विधान का खण्डन नहीं किया जा सकता, अनुयाहि = अनुसरण करो, अनुव्रताः = अनुकूल क्रिया, अनैकान्त्यात् = अनेक अवस्था वाला होने से, अन्तर्धनम् = गुप्तधन, अपहर्तुम् = अपहरण करने के लिए, अपाकरोति = दूर करती है।
अप्रगल्भः = असहासी, अप्रतिहताः = न रुकने वाली, अभिजनः = उत्तम कुल में उत्पन्न, अभिजातः = कुलीन, अभियोगः = परिश्रम, अभ्यर्चनीया = पूजनीय, अभ्युदये = उन्नति में, अम्भोद वर = श्रेष्ठ बादल, अम्भसि = जल में, अम्भोजिनी = कमलिनी, अर्घतः = मूल्य से, अर्थपरा = धन प्रदान करने वाली, अर्थिभ्यः = याचकों को, अर्थिसु = याचकों में, अर्थोष्मणा = धन की गर्मी के द्वारा, अवगतम् = जाना, अवञ्चकः = धोखा न देने वाला, अवदात् = उज्ज्वल, स्वच्छ, अवधार्या = विचार की जानी चाहिए,
नीतिशतकम् १६५
अवमंस्थाः = अपमान करो, अवलिप्तता = अभिमान, अवाप्त-विभवस्य = प्राप्त किया है ऐश्वर्य को जिसने, अविकलानि = पूर्ण, अवेक्ष्य = देखकर, अशेष गुणाकरम् = सम्पूर्ण गुणों की खान, असुभङ्गे = प्राणों के नष्ट होने पर, असून् = प्राणों को, अस्थायिन्यः = अस्थायी, अस्थिकम् = हड्डी का टुकड़ा, अहह = आश्चर्यसूचक।
'आखुः = चूहा, आगमा = शास्त्र, आढ्य = धनी, आत्मदमने = आत्म नियन्त्रण में, आदौ = पहले, आपदि = आपत्ति में, आपन्नः = प्राप्त हुआ, आयसि = लोहे पर, आराधयेत् = प्रसन्न कर सकता है, आराध्यः = प्रसन्न करने योग्य, आर्जवम् = सरलता, आर्द्रयन्ति = भिगोते हैं, आविपत्तेः = मृत्युपर्यन्त, आशु = शीघ्र ही, आश्रयन्ते = आश्रय में रहते हैं, आसादयेत् = प्राप्त कर ले, आस्थाम् = श्रद्धा को।
इतः = इधर से, इनकान्तः = सूर्यकान्त मणि, इष्टद = इच्छित वस्तु को देने वाला, इह = यहाँ, इहते = चाहता है, ईदृशी = ऐसी, उज्जत = छोड़ दो, उत्पलकोमलम् = कमल के समान कोमल, उत्तुंगात् = ऊँचे से, उद्रच्छत् = ऊपर उठती हुई, उद्दिष्टम् = बताया गया है, उद्धत = अहंकारी, उद्धरेत् = निकाल ले, उन्नमन्तः = ऊपर उठते हुए, उद्भासित = प्रकाशित, उन्मनः = व्याकुल, उपकृतेः = उपकार का, उपशमः = शान्ति, उपचीयते = बढ़ जाता है, उपयान्ति = प्राप्त होते हैं, उपाश्रयेण = सहारा लेने से, ऊर्जितम् = बलवान्, एकान्तगुणम् = केवल गुण स्वरूप, एतादृशाः = ऐसे, ओघः = समूह।
कः अर्थः = क्या लाभ, कंकोल = शीतल चीनी, कदर्थितस्य = पीडित, कन्याधारी = गुदड़ी धारण करने वाला, कन्दुकः = गेंद, कमठपतिना = कछुओं के स्वामी के द्वारा, करण्ड = पिटारी, कर्मभूमिम् = संसार को, कर्मायत्तम् = कर्मों के अधीन, काचित् = कोई स्त्री, काले = समय पर, कार्पण्योक्ति = दीनता से युक्त कथन, कार्यार्थी = कार्य करने का इच्छुक, किञ्चिज्ज्ञः = कुछ जानने वाला, किमु = प्रश्नवाचक अव्यय, कियन्तः = कितने, कुत्स्याः = निन्दा के योग्य, कुपरीक्षकाः = खराब परीक्षक, कुम्भकवल = मस्तक का टुकड़ा, कुरंगायते = हिरण के समान हो जाता है, कुर्वता = करते हुए, कुलालवत् = कुम्हार के समान, कुलिश प्रहारैः = वज्र के प्रहारों से, कुल्यायते = छोटी सी नहर के समान हो जाता है।
कृच्छगतः = कष्ट में पड़े हुए, कृत्स्नम् = सम्पूर्ण, कृथाः = करो, कृमिकुलचितम् = कीड़ों के समूह से व्याप्त, कृशानुताप = अग्नि का ताप, केयूराणि = बाजूबन्द, कैतवम् = धूर्तता, कैरवचक्रवालम् = कुमुद समूह, कोद्रवाणाम् = कोदों (अन्न) के, क्रोडाधीनम् = गोद में, क्षयिणी = क्षीणता से युक्त, क्षान्तिः = क्षमा, क्षितिधेनुम् = पृथ्वी रूपी गाय को, क्षुत्क्षामाः = भूख से दुर्बल, क्षीयन्ते = नष्ट हो जाते हैं, खलोपासनात् = दुष्टों की सेवा से, खादन् = खाते हुए, ख्यापयन्तः = प्रकाशित करते हुए, गुर्वी = लम्बी, गुह्यम् = गोपनीय, गोचरगतैः = इन्द्रियों का विषय बने हुए।
१६६ || श्रीभर्तृहरिविरचितम्
चाटुलः = बहुत बोलने वाला, छिन्धि = काटो, छेत्तुम् = काटने के लिए, छादनम् = छिपाने वाला, जम्बुकम् = गीदड़ को, जल्पकः = बकवादी, जहि = छोड़ दो, जुह्वानम् = हवन करते हुए को, जाड्यम् = मूर्खता को, जातेन = उत्पन्न होने से, जानीमहे = हम जानते हैं, जायते = उत्पन्न होता है, जीवमानः = जीवित रहता हुआ, जुगुप्सितम् = घृणित, ज्ञातिः = सम्बन्धी।
तनिम्ना = दुबलेपन से, तुतुषुः = संतुष्ट हुए, तृणलवप्रायाः = तिनके के टुकड़े के समान, दंष्ट्रांकुर = दाढ़ का अग्रभाग, दम्भः = अभिमान, दरी = कुरूप, गुफा, दाक्षिण्यम् = उदारता, दिवसधूसरः = दिन में मलिनकान्ति, दुधुक्षसि = दुहना चाहते हो, दुर्गतः = दुर्दशा को प्राप्त, दुर्विदग्धः = अभिमानी (व्यक्ति), दौर्मन्त्र्यात् = बुरी सलाह से, धरित्रीम् = पृथ्वी को, धात्रा = विधाता ने, धीवरः = मछुआरा, धृष्टः = ढीठ, ननु = निश्चयपूर्वक, निकृतिम् = अपमान को, निघ्नन्ति = नष्ट करते हैं, नितराम् = अत्यधिक, निधनम् = नाश को, निपत्य = गिरकर, निर्घृणता = निर्दयता, निर्व्याजता = निष्कपटता, निवारयति = रोकता है, निवृत्तः = हटा हुआ, निशितांकुशेण = तीक्ष्ण अंकुश से।
पक्षच्छेदः = पंखों का कटना, पञ्चषाः = पांच, छः, पत्तने = नगर में, पयसां पत्युः = जलों के स्वामी, परार्थम् = दूसरों के लिए, परिक्षीणः = निर्धन, परिग्रहफल्गुताम् = ग्रहण की गई वस्तु की निस्सारता को, परितुष्यति = व्याकुल होती है, परित्यज्य = त्यागकर, परिवाद = निन्दा, परिस्फुरित = देदीप्यमान, परिहर्त्तव्या = त्यागने योग्य, पयोनिधौ = समुद्र में, पर्यंकम् = पलंग को, पर्यटन् = घूमते हुए, पर्वतीकृत्य = पर्वत के समान बनाकर, पादाक्रान्त = पैरों (किरणों) से व्याप्त, पिण्डदस्य = अन्न देने वाले के, पिपासार्दितः = प्यास से व्याकुल, पिशुनता = चुगलखोरी, पीडयन् = दबाता हुआ, पीयूष = अमृत, पुरतः = सामने, पुरा = पहले, पुषाण = पुष्ट करो, पुष्णाति = पुष्ट करता है, प्रच्छादय = छिपाओ, प्रच्छन्नम् = अत्यन्त गुप्त, प्रणयिता = अनुराग करने वाला, प्रतिनिविष्ट = दुराग्रही और हठी, प्रतिपाद्यमानम् = दिया जाता हुआ, प्रथयति = विस्तार करती है, प्रभवति = प्रभावशाली होता है, प्रमादात् = आलस्य से, प्रमार्ष्टुम् = मिटाने के लिए, प्रययुः = प्राप्त हुए, प्रविचलन्ति = विचलित होते हैं, प्रसह्म = बलपूर्वक, प्रसादोन्मुखः = अनुग्रहशील, प्रसृतये = अंजलि के लिए, प्रहरणम् = अस्त्र, प्राज्ञः = बुद्धिमान्, प्राणाघातात् = प्राणों के विनाश से, प्रीणयन्तः = प्रसन्न करते हुए, प्रीणयेत् = प्रसन्न करे, बलभित् = इन्द्र, ब्रूहि = बोलो,
भिक्षाटनम् = भिक्षा के लिए घूमना, भागधेयम् = सौभाग्य, भाव्यम् = जो होना है, भुङ्क्ते = खाता है, भूरि = अनेक, भोगकरी = भोगों को देने वाली, भोगिनः = सर्प, भ्राम्यति = घूमता है, मज्जतु = डूब जाए, मण्डिता = सुशोभित, मतिमताम् = बुद्धिमानों की, महार्णवे = समुद्र में, महार्हैः = बहुमूल्य, मानोन्नतिम् = सम्मान और उन्नति को,
नीतिशतकम् १६७
मार्जितुम् = पोंछने के लिए, मूकभावः = चुप रहना, मूर्धजाः = केश, मूर्ध्नि = सिर पर, मृगाश्चरन्ति = पशु विचरण कर रहे हैं, म्लानेन्द्रियस्य = शिथिल इन्द्रियों वाले का।
यथेष्टम् = इच्छानुसार, यशः काये = यश रूपी शरीर में, योजयते = लगाता है, रञ्जयति = प्रसन्न करता हैं, रजताद्रिणा = चाँदी के पर्वत द्वारा, रुचिराकारः = सुन्दर आकृति वाला, रोद्धुम् = रोकने के लिए, लब्ध्वा = प्राप्त करके, लाङ्गलाग्रैः = हलों के अग्रभागों द्वारा, लाङ्गूल = पूँछ, लालनात् = लाड प्यार से, लालाक्लिन्नम् = लार से भीगा हुआ, लुनन्ति = काटते हैं, लुब्धक = बहेलिया, लोकस्थितिः = लोक मर्यादा, लोकापवात् = लोक निन्दा से।
वनचरैः = वनवासियों के द्वारा, वयः = आयु, वहल = घनी, वाञ्छति = चाहता है, वाञ्छा = इच्छा, वारणम् = रोकने वाला, वारणानाम् = हाथियों का, वाराङ्गना = वेश्या, विकचीकरोति = खिलाता है, विगन्धि = दुर्गन्धयुक्त, वित्तवत्सु = धनवानों में, विद्याख्य = विद्यानाम वाला, विद्यावदातम् = विद्या से उज्ज्वल, विनिपातः = पतन, विनिर्मितम् = बनाया गया, विभाति = सुशोभित होता है, विमतिता = बुद्धिहीनता, विमृशन्तः = सोचते हुए, विरमन्ति = रुक जाते हैं, विलिखति = खोदता है, विलोकयति = देखता है, विशिखाः = बाण, विशीर्यते = नष्ट हो जाता है, विषमम् = कठोर, विषये = राज्य में, विष्टपं = संसार, विहीनम् = रहित, वैदग्ध्यकीर्तिम् = निपुणता के यश को, व्यालं = हाथी को, व्यसनम् = शौक, व्यपगत = दूर हो गया।
शक्त्या = शक्ति के अनुसार, शतमुखः = सैकड़ों प्रकार से, शल्यतुल्यः = कांटे के समान, शाठ्यम् = दुष्टता, शाणोल्लीढः = शान पर चढ़ाई हुई, शाम्यति = शान्त हो जाता है, शार्वम् = शिव को, शाल्योदन = भात, शास्त्रोपस्कृत = शास्त्रों द्वारा शोधित, शिखरिणाम् = पर्वतों का, शीर्यते = नष्ट हो जाती है, शीर्षावशेषाकृतिः = सिर मात्र शेष आकृति वाला, शीलम् = अच्छा स्वभाव, शुचौ = पवित्रता में, शैलतटात् = पर्वत की चोटी से, श्यानपुलिनाः = सूखे तटों वाली, श्वा = कुत्ता, श्रुतौ = वेदों में, श्रूयताम् = सुनो।
संघात = समूह, संदह्यताम् = जला डाले, संनह्यते = सन्नद्ध होता है, संरुणद्धि = रोकती है, सञ्चितानि = एकत्रित, सन् = होते हुए, सत्त्ववतां = शक्तिशाली लोगों का, सत्वानुरूपम् = स्वभाव के अनुरूप, सदसि = सभा में, सन्तप्यन्ते = दुःखी होते हैं, समक्रियाम् = समान आचरण वाला, समन्तात् = चारों ओर, समाविशतु = प्रवेश करे, समुन्मीलति = प्रकट होता है, सम्पातः = गिरना, सम्भाविताः = प्रतिष्ठित।
सिकतासु = बालू में, सिञ्चति = सींचती है, सुकृत = अच्छी प्रकार किया गया, सुकृतिनः = पुण्यात्मा, सुचरितैः = सुन्दर आचरणों से, सुजनता = सज्जनता,
१६८ श्रीभर्तृहरिविरचितम्
सुधास्यन्दिभिः = अमृतवर्षी, सुरतमृदिता = सम्भोग में मर्दन की गई, सूनुः = पुत्र, सूर्यातपः = सूर्य की धूप, सृजति = रचना करता है।
स्पृष्टः = स्पर्श किया गया, स्युः = होने चाहिएँ, स्पृहा = इच्छा, हतविधेः = दुष्ट विधाता, हर्तुः = हरण करने वाले के, ह्रीमति = लज्जा से, हुत्भुक् = अग्नि, हेतिनिहतः = शस्त्रों द्वारा घायल।