भारतकोश
नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

Niti Shataka of Bhartrihari Hindi

महाराज भर्तृहरि द्वारा

स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished194 पृष्ठ

पृष्ठ 187, कुल 194 में से

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पृष्ठ 187

नीतिशतकम् १६५

अवमंस्थाः = अपमान करो, अवलिप्तता = अभिमान, अवाप्त-विभवस्य = प्राप्त किया है ऐश्वर्य को जिसने, अविकलानि = पूर्ण, अवेक्ष्य = देखकर, अशेष गुणाकरम् = सम्पूर्ण गुणों की खान, असुभङ्गे = प्राणों के नष्ट होने पर, असून् = प्राणों को, अस्थायिन्यः = अस्थायी, अस्थिकम् = हड्डी का टुकड़ा, अहह = आश्चर्यसूचक।

'आखुः = चूहा, आगमा = शास्त्र, आढ्य = धनी, आत्मदमने = आत्म नियन्त्रण में, आदौ = पहले, आपदि = आपत्ति में, आपन्नः = प्राप्त हुआ, आयसि = लोहे पर, आराधयेत् = प्रसन्न कर सकता है, आराध्यः = प्रसन्न करने योग्य, आर्जवम् = सरलता, आर्द्रयन्ति = भिगोते हैं, आविपत्तेः = मृत्युपर्यन्त, आशु = शीघ्र ही, आश्रयन्ते = आश्रय में रहते हैं, आसादयेत् = प्राप्त कर ले, आस्थाम् = श्रद्धा को।

इतः = इधर से, इनकान्तः = सूर्यकान्त मणि, इष्टद = इच्छित वस्तु को देने वाला, इह = यहाँ, इहते = चाहता है, ईदृशी = ऐसी, उज्जत = छोड़ दो, उत्पलकोमलम् = कमल के समान कोमल, उत्तुंगात् = ऊँचे से, उद्रच्छत् = ऊपर उठती हुई, उद्दिष्टम् = बताया गया है, उद्धत = अहंकारी, उद्धरेत् = निकाल ले, उन्नमन्तः = ऊपर उठते हुए, उद्भासित = प्रकाशित, उन्मनः = व्याकुल, उपकृतेः = उपकार का, उपशमः = शान्ति, उपचीयते = बढ़ जाता है, उपयान्ति = प्राप्त होते हैं, उपाश्रयेण = सहारा लेने से, ऊर्जितम् = बलवान्, एकान्तगुणम् = केवल गुण स्वरूप, एतादृशाः = ऐसे, ओघः = समूह।

कः अर्थः = क्या लाभ, कंकोल = शीतल चीनी, कदर्थितस्य = पीडित, कन्याधारी = गुदड़ी धारण करने वाला, कन्दुकः = गेंद, कमठपतिना = कछुओं के स्वामी के द्वारा, करण्ड = पिटारी, कर्मभूमिम् = संसार को, कर्मायत्तम् = कर्मों के अधीन, काचित् = कोई स्त्री, काले = समय पर, कार्पण्योक्ति = दीनता से युक्त कथन, कार्यार्थी = कार्य करने का इच्छुक, किञ्चिज्ज्ञः = कुछ जानने वाला, किमु = प्रश्नवाचक अव्यय, कियन्तः = कितने, कुत्स्याः = निन्दा के योग्य, कुपरीक्षकाः = खराब परीक्षक, कुम्भकवल = मस्तक का टुकड़ा, कुरंगायते = हिरण के समान हो जाता है, कुर्वता = करते हुए, कुलालवत् = कुम्हार के समान, कुलिश प्रहारैः = वज्र के प्रहारों से, कुल्यायते = छोटी सी नहर के समान हो जाता है।

कृच्छगतः = कष्ट में पड़े हुए, कृत्स्नम् = सम्पूर्ण, कृथाः = करो, कृमिकुलचितम् = कीड़ों के समूह से व्याप्त, कृशानुताप = अग्नि का ताप, केयूराणि = बाजूबन्द, कैतवम् = धूर्तता, कैरवचक्रवालम् = कुमुद समूह, कोद्रवाणाम् = कोदों (अन्न) के, क्रोडाधीनम् = गोद में, क्षयिणी = क्षीणता से युक्त, क्षान्तिः = क्षमा, क्षितिधेनुम् = पृथ्वी रूपी गाय को, क्षुत्क्षामाः = भूख से दुर्बल, क्षीयन्ते = नष्ट हो जाते हैं, खलोपासनात् = दुष्टों की सेवा से, खादन् = खाते हुए, ख्यापयन्तः = प्रकाशित करते हुए, गुर्वी = लम्बी, गुह्यम् = गोपनीय, गोचरगतैः = इन्द्रियों का विषय बने हुए।