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नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

Niti Shataka of Bhartrihari Hindi

महाराज भर्तृहरि द्वारा

स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished194 पृष्ठ

पृष्ठ 186, कुल 194 में से

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१६४श्रीभर्तृहरिविरचितम्

जिन लोगों के पास विद्या नहीं है, दान नहीं करते, तपस्या का आचरण नहीं करते उन्हें कवि ने मनुष्य रूप में विचरण करते हुए पशु ही बर्ताया है। ठीक इसी प्रकार साहित्य, संगीत और कला से रहित व्यक्ति भी पूँछ और सींग से रहित साक्षात् पशु ही है—

साहित्य-संगीत-कला-विहीनः,
साक्षात् पशुः पुच्छविषाणहीनः।
तृणं न खादन्नपि जीवमानः,
तद् भागधेयं परमं पशूनाम्॥१३॥

इसी प्रकार राजाओं को कभी भी विद्वानों का अपमान नहीं करना चाहिए। लक्ष्मी तो ऐसे पण्डितों के लिए तिनके का समान है। राजा यदि क्रोधित भी होता है तो अधिक से अधिक विद्वान् को अपने राज्य से निष्कासित कर सकता है, किन्तु उसकी योग्यता, क्षमता, विद्वत्ता आदि को तो किसी भी स्थिति में उससे नहीं ले सकता है। रससिद्ध कवियों के यशः शरीर में वृद्धावस्था और मरणादि से उत्पन्न भय नहीं होता है। अतः वे श्लाघनीय हैं।

(घ) शब्दार्थ

अंकितः = चिह्नित, अकरुणत्वम् = निर्दयता, अकारणविग्रहः = बिना कारण झगड़ा, अखिलाः = सम्पूर्ण, अज्ञः = न जानने वाला, अज्ञतायाः = मूर्खता का, अतिरभसा = अत्यन्त वेग से, अत्ति = खाता है, अथ = इसके पश्चात्, और अधः = नीचे, अधिगतपरमार्थान् = प्राप्त कर लिया है परमतत्त्व को जिसने, अनक्षरम् = विद्या रहित, अनवच्छिन्न = आच्छादित न किए जा सकने वाले, अनवद्या = प्रशंसनीय, अन्वेक्षणात् = बिना देखभाल से, अनिशम् = निरन्तर, अनुत्सेकः = अभिमान न होना, अनुपहतविधिः = जिसके विधान का खण्डन नहीं किया जा सकता, अनुयाहि = अनुसरण करो, अनुव्रताः = अनुकूल क्रिया, अनैकान्त्यात् = अनेक अवस्था वाला होने से, अन्तर्धनम् = गुप्तधन, अपहर्तुम् = अपहरण करने के लिए, अपाकरोति = दूर करती है।

अप्रगल्भः = असहासी, अप्रतिहताः = न रुकने वाली, अभिजनः = उत्तम कुल में उत्पन्न, अभिजातः = कुलीन, अभियोगः = परिश्रम, अभ्यर्चनीया = पूजनीय, अभ्युदये = उन्नति में, अम्भोद वर = श्रेष्ठ बादल, अम्भसि = जल में, अम्भोजिनी = कमलिनी, अर्घतः = मूल्य से, अर्थपरा = धन प्रदान करने वाली, अर्थिभ्यः = याचकों को, अर्थिसु = याचकों में, अर्थोष्मणा = धन की गर्मी के द्वारा, अवगतम् = जाना, अवञ्चकः = धोखा न देने वाला, अवदात् = उज्ज्वल, स्वच्छ, अवधार्या = विचार की जानी चाहिए,

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