भारतकोश
नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

Niti Shataka of Bhartrihari Hindi

महाराज भर्तृहरि द्वारा

स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished194 पृष्ठ

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पृष्ठ 174

१५२ श्रीभर्तृहरिविरचितम्

९. कर्मणाम् जातम् कर्मजातम् (षष्ठी तत्पुरुष)
१०. √जन् + क्त = जातम्
११. पण्डा + इतच् = पण्डितः
१२. √भू + तिप् (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) भवति

स्थाल्यां वैदूर्यमय्यां पचति च लशुनं चन्दनैरिन्धनाद्यैः,
सौवर्णैर्लाङ्गलाग्रैर्विलिखति वसुधामर्क्रमूलस्य हेतोः।
कृत्वा कर्पूरखण्डान् वृत्तिमिह कुरुते कोद्रवाणां समन्तात्
प्राप्येमां कर्मभूमिं न चरति मनुजो यस्तपो मन्दभाग्यः॥११५॥

अन्वय- यः मन्दभाग्यः मनुजः इमाम् कर्मभूमिम् प्राप्य, इह तपः न चरति, सः वैदूर्यमय्याम् स्थाल्याम् चन्दनैः इन्धनाद्यैः लशुनम् पचति, अर्कमूलस्य हेतोः सौवर्णैः लाङ्गलाग्रैः वसुधाम् विलिखति, कर्पूरखण्डान् कृत्वा कोद्रवाणाम् समन्तात् वृत्तिम् कुरुते।

अनुवाद- जो भाग्यविहीन व्यक्ति इस कर्मभूमि को प्राप्त करके यहाँ तपस्या का आचरण नहीं करता है, वह वैदूर्यमणि से निर्मित बटलोई में चन्दन आदि के इन्धनों के द्वारा लहसुन पकाता है, आक की जड़ से लिए सोने के हल के अग्रभागों के द्वारा पृथिवी को खोदता है, कर्पूर के टुकड़े करके कोदों (अन्न) के चारों ओर घेरा बनाता है।

व्याख्या- सामान्य रूप से मनुष्य-जीवन दुर्लभ है, साथ ही यह जीवन ईश्वर ने इस संसार में कर्म करने के लिए प्रदान किया है, इसलिए यह संसार वस्तुतः कर्मभूमि है, किन्तु यदि कोई व्यक्ति इस कर्मभूमि रूपी संसार में आकर कर्म रूपी कठोर तप का आचरण नहीं करता है, अन्यान्य व्यर्थ के कार्य जैसे सोना, खाना, खेलना आदि कार्यों में ही अपना अमूल्य जीवन व्यतीत करता है, तो उसका यह जीवन पूर्णतया निरर्थक है और ये सब कार्य भी ठीक उसी प्रकार मूर्खतापूर्ण और निरर्थक हैं, जैसे—

कोई व्यक्ति बहुमूल्य वैदूर्यमणिजटित बटलोई में चन्दन आदि बहुमूल्य लकड़ी के ईंधन को जलाकर लहसुन जैसी तुच्छ वस्तु को पकाने का कार्य करे अथवा उसका यह कार्य सोने जैसी मूल्यवान् धातु से बने हल के द्वारा आक की जड़ जैसी तुच्छ वस्तु को प्राप्त करने का प्रयास करने जैसा अविवेकपूर्ण होगा।

उस व्यक्ति का यह कार्य, कोदों नामक खाद्यान्न जो जंगल में स्वतः ही उग आता है, की रक्षा के लिए कर्पूर के टुकड़ों से बाढ़ बनाने जैसा होगा।

अतः मनुष्य को इस संसार रूपी कर्मभूमि में आकर, मानवता की सेवा रूप प्रशंसनीय कार्यों में ही लिप्त रहना चाहिए, अपने समय को व्यर्थ नहीं गंवाना चाहिए।


१. पचति तिलकणानिन्धनेश्चन्दनाद्यैः (चन्दन के ईंधन से तिलकणों को पकाता है) इन्धनोत्रै (इन्धनों के समूह से)