नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)
Niti Shataka of Bhartrihari Hindi
महाराज भर्तृहरि द्वारा
स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंनीतिशतकम् १५३
विशेष- १. व्यक्ति को सांसारिक भोगों में आसक्त रहकर अपने मूल्यवान् जीवन को व्यर्थ नहीं गंवाना चाहिए।
२. संसार में जन्म लेकर भी यदि कोई व्यक्ति श्रेष्ठ कर्म नहीं करता है, तो वह अभागा ही माना जाएगा।
३. स्रग्धरा छन्द का प्रयोग हुआ है, लक्षण इस प्रकार है— म्रभ्नैर्यानां त्रयेण त्रिमुनियतियुता स्रग्धरा कीर्तितियम्॥
४. कोदों अत्यन्त सामान्य प्रकार का अन्न जिसे तपस्वी वनों में प्रयोग करते हैं, क्योंकि यह वहाँ स्वतः उग आता है।
५. दीपक तथा काव्यलिंग अलंकार का प्रयोग हुआ है।
व्याकरणात्मक टिप्पणी- १. मन्दं भाग्यं यस्य सः, मन्दभाग्यः (बहुव्रीहि) २. कर्मणः भूमिः, कर्मभूमिः, तम् कर्मभूमिम् (षष्ठी तत्पुरुष) ३. √चर् + तिप् (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) चरति ४. स्थाली + ङि (सप्तमी विभक्ति, एकवचन) स्थाल्याम् ५. √पच् + तिप् (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) पचति ६. सुवर्ण + अण् = सौवर्णम् (नपुं., तृतीया विभक्ति, बहुवचन) सौवर्णैः ७. लाङ्गलानाम् अग्रम् तैः (षष्ठी तत्पुरुष) लाङ्गलाग्रैः ८. अर्कस्य मूलम्, अर्कमूलम्, तस्य अर्कमूलस्य (षष्ठी तत्पुरुष) ९. वि + √लिख् + तिप् = विलिखति (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) १०. कर्पूरस्य खण्डान् = कर्पूरखण्डान् (षष्ठी तत्पुरुष) ११. √वृ + क्तिन् (स्त्रीलिंग, द्वितीया विभक्ति, एकवचन) वृत्तिः
नैवाकृतिः फलति नैव कुलं न शीलं, विद्याऽपि नैव न च यत्नकृताऽपि सेवा। भाग्यानि पूर्वतपसा खलु सञ्चितानि, काले फलन्ति पुरुषस्य यथैव वृक्षाः॥११६॥
अन्वय- न एव आकृतिः फलति, न एव कुलम्, न शीलम्, विद्या अपि फलति न एव, यत्नकृता सेवा अपि न (फलति), च यथा वृक्षाः (तथा) एव पुरुषस्य पूर्वतपसा सञ्चितानि भाग्यानि खलु काले फलन्ति।
अनुवाद- न ही (सुन्दर) आकृति फलती है, न ही कुल, न शील। विद्या भी (फलवती) नहीं होती है और यत्नपूर्वक की गई सेवा भी नहीं (फलती है), (अपितु) जिस प्रकार वृक्ष (फलवान् होते हैं), (वैसे) ही पुरुष के पूर्व (जन्म) के तप के द्वारा सञ्चित भाग्य ही समय (आने) पर फलीभूत होते हैं।